इमरजेंसी का काउंटडाउन... आखिर कब और कैसे शुरू हुई इसकी कहानी?

क्या इमरजेंसी अचानक लगाया गया फैसला था, या फिर उसके बीज वर्षों पहले सत्ता के केंद्रीकरण, आर्थिक चुनौतियों और बढ़ते जनाक्रोश के बीच बोए जा चुके थे?

The Narrative World    25-Jun-2026
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25 जून 1975 को घोषित आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय अध्याय माना जाता है। किंतु इतिहास का गंभीर अध्ययन बताता है कि इमरजेंसी कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। इसके पीछे कई वर्षों से बन रहा राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक संकट मौजूद था। यह संकट सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण और तानाशाही प्रवृत्तियों का परिणाम था, जिसने अंततः सत्ता और लोकतंत्र के बीच टकराव को जन्म दिया। 1971 में इंदिरा गांधी की अभूतपूर्व विजय से लेकर 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले तक की घटनाएं इस बात को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं कि आपातकाल की भूमि कैसे तैयार हुई।
 
1971: इंदिरा गांधी का अभूतपूर्व उभार
 
1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने स्वयं को पार्टी के पारंपरिक नेतृत्व से अलग स्थापित किया। 1971 के लोकसभा चुनाव में उनका नारा था, "गरीबी हटाओ"। यह चुनावी नारा इंदिरा गांधी के लिए सत्ता के केंद्रीकरण का राजनीतिक माध्यम भी बना।
 
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1971 के चुनाव में कांग्रेस (आर) को भारी बहुमत मिला। विपक्ष बिखरा हुआ था और इंदिरा गांधी की छवि एक लोकप्रिय जननेता के रूप में स्थापित हो चुकी थी। इसी अवधि में बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्त करने जैसे निर्णयों ने उन्हें गरीबों और मध्यम वर्ग के बीच लोकप्रिय बनाया।
 
इसके बाद दिसंबर 1971 में पाकिस्तान पर भारत की निर्णायक विजय और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इस जीत ने इंदिरा गांधी को अभूतपूर्व राजनीतिक शक्ति प्रदान की। विपक्ष लगभग अप्रासंगिक दिखाई देने लगा था और कांग्रेस के भीतर भी उन्हें चुनौती देने वाला कोई प्रभावशाली नेता नहीं बचा था।
 
यहीं से सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई।
 
"गरीबी हटाओ" से आर्थिक संकट तक
 
1971 की विजय के बाद जनता की अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई थीं। लेकिन अगले कुछ वर्षों में भारत गंभीर आर्थिक संकटों से घिर गया।
 
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1973 के वैश्विक तेल संकट ने भारतीय अर्थव्यवस्था को झकझोर दिया। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ीं, परिवहन महंगा हुआ और महंगाई तेजी से बढ़ने लगी।
 
देश पहले से ही खाद्यान्न संकट, बढ़ती बेरोजगारी और आवश्यक वस्तुओं की कमी जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था। प्रशासनिक अक्षमता और भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता की नाराजगी को और बढ़ा दिया। परिणामस्वरूप सरकार और इंदिरा गांधी के नेतृत्व के प्रति वह विश्वास कमजोर पड़ने लगा, जो 1971 की चुनावी विजय और बांग्लादेश युद्ध के बाद बना था।
 
"गरीबी हटाओ" का वादा करने वाली सरकार अब बढ़ती गरीबी, महंगाई और जन-असंतोष का सामना कर रही थी।
 
गुजरात का नव निर्माण आंदोलन: जनता का पहला बड़ा विद्रोह
 
1973 में गुजरात में एक छात्र आंदोलन शुरू हुआ। इसकी शुरुआत कॉलेज फीस और मेस शुल्क में बढ़ोतरी के विरोध से हुई, लेकिन जल्द ही यह भ्रष्टाचार विरोधी जन आंदोलन में बदल गया।
 
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तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल की सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे थे। छात्रों, मध्यम वर्ग और व्यापारियों ने मिलकर राज्यव्यापी आंदोलन खड़ा कर दिया।
 
आंदोलन इतना व्यापक हुआ कि अंततः केंद्र सरकार को गुजरात विधानसभा भंग करनी पड़ी।
 
यह स्वतंत्र भारत में पहली बार था जब किसी छात्र आंदोलन ने एक निर्वाचित सरकार को हटाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
 
दिल्ली में बैठे सत्ता के संचालकों के लिए यह एक स्पष्ट चेतावनी थी कि जनता का धैर्य टूट रहा है।
 
बिहार छात्र आंदोलन: असंतोष की क्रांति
 
गुजरात के बाद बिहार में भी छात्रों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और प्रशासनिक विफलता के खिलाफ आंदोलन शुरू किया।
 
1974 में पटना विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्रों ने "बिहार छात्र संघर्ष समिति" का गठन किया।
 
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शुरुआत में यह एक क्षेत्रीय छात्र आंदोलन था, लेकिन शीघ्र ही यह राष्ट्रीय राजनीतिक चुनौती में बदल गया।
 
यहीं से भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय का आरंभ हुआ और जयप्रकाश नारायण एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ गए।
 
जयप्रकाश नारायण और 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान
 
स्वतंत्रता आंदोलन के वरिष्ठ नेता जयप्रकाश नारायण लंबे समय से सक्रिय राजनीति से दूर थे। लेकिन बिहार के छात्रों के आग्रह पर उन्होंने आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया।
 
जेपी ने सरकार परिवर्तन के साथ-साथ "संपूर्ण क्रांति" का नारा दिया।
 
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उनका तर्क था कि समस्या केवल किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे की है। जेपी के नेतृत्व में आंदोलन ने विशाल जनसमर्थन प्राप्त किया। छात्रों, युवाओं, किसानों, सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने इसे व्यापक समर्थन दिया।
 
1974-75 तक यह आंदोलन इंदिरा गांधी सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुका था।
 
रेलवे हड़ताल और बढ़ती बेचैनी
 
मई 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में रेलवे कर्मचारियों ने देशव्यापी हड़ताल की।
 
यह स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी औद्योगिक हड़तालों में से एक थी।
 
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सरकार ने कठोर कार्रवाई की। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया और पुलिस कार्रवाई लगातार जारी रही।
 
इन कदमों ने यह संकेत दिया कि सरकार विरोध को प्रशासनिक शक्ति के माध्यम से नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ रही थी।
 
इलाहाबाद हाईकोर्ट का 'सब बदल देने वाला' फैसला
 
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली चुनाव मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराया और उनके चुनाव को निरस्त कर दिया।
 
इस फैसले का अर्थ केवल एक सांसद की सदस्यता समाप्त होना नहीं था। इसका सीधा प्रभाव प्रधानमंत्री पद पर पड़ रहा था।
 
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इस निर्णय ने देश में राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया। इससे इंदिरा गांधी के राजनीतिक भविष्य और सत्ता में बने रहने पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो गए।
 
विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी। जयप्रकाश नारायण ने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि प्रधानमंत्री को नैतिक आधार पर पद छोड़ देना चाहिए।
 
25 जून से पहले का राजनीतिक वातावरण
 
जून 1975 तक भारतीय राजनीति एक ऐसे मोड़ पर पहुंच चुकी थी जहां टकराव के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प दिखाई नहीं दे रहा था।
 
एक ओर इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार थी, जो आलोचकों के अनुसार सत्ता के मद में जनता और जनहित से दूर होती जा रही थी तथा अपनी राजनीतिक वैधता और अधिकार को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही थी। दूसरी ओर जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संगठित होता विपक्ष था, जिसने सरकार के विरुद्ध व्यापक जनमत तैयार कर लिया था।
 
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इन दोनों के बीच आम जनता थी, जो महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से त्रस्त होकर परिवर्तन की आकांक्षा रखती थी। देश का राजनीतिक वातावरण दिन-प्रतिदिन अधिक तनावपूर्ण और टकरावपूर्ण होता जा रहा था।
 
 
25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण ने एक विशाल सभा को संबोधित किया। उन्होंने प्रशासन और सुरक्षा बलों से संविधान तथा अपनी अंतरात्मा के अनुसार कार्य करने की अपील की।
 
सत्ता प्रतिष्ठान ने इसे सीधी चुनौती के रूप में देखा।
 
 
उसी रात भारत के इतिहास में एक ऐसे दौर की शुरुआत हुई, जिसे लोकतंत्र के सबसे काले अध्यायों में गिना जाता है। वह समय लोकतांत्रिक अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रताओं और जनमत की अभिव्यक्ति पर अभूतपूर्व नियंत्रण का प्रतीक बन गया।
 
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत लागू किए गए इस प्रावधान को "इमरजेंसी" कहा गया।
 
लेख
 
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केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय