29 जून 2008... यह तारीख भारत के सुरक्षा इतिहास के सबसे दर्दनाक दिनों में दर्ज है। इसी दिन ओडिशा और आंध्र प्रदेश की सीमा पर स्थित बालीमेला जलाशय में माओवादियों ने ऐसा खूनी हमला किया, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हमले में आंध्र प्रदेश पुलिस की प्रतिष्ठित ग्रेहाउंड कमांडो फोर्स के 32 जांबाज जवानों समेत कुल 38 लोगों ने अपनी जान गंवाई। इस कायराना हमले ने एक बार फिर साबित कर दिया कि माओवादी न तो लोकतंत्र का सम्मान करते हैं और न ही किसी मानवीय मर्यादा का।
ग्रेहाउंड कमांडो उस दिन एक बेहद गोपनीय अभियान पूरा करके नाव से लौट रहे थे। उन्हें इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि आसपास की पहाड़ियों में भारी हथियारों से लैस माओवादी पहले से घात लगाकर बैठे हैं। जैसे ही नाव बालीमेला जलाशय के बीच पहुंची, माओवादियों ने विस्फोटकों और आधुनिक हथियारों से ताबड़तोड़ हमला शुरू कर दिया। कुछ ही पलों में नाव बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई और पानी में डूब गई। जवानों को संभलने तक का मौका नहीं मिला।
इस हमले में 32 प्रशिक्षित ग्रेहाउंड कमांडो, पांच अन्य सुरक्षाकर्मी और नाविक की मौत हो गई। कई जवानों ने पानी में तैरकर अपनी जान बचाने की कोशिश की, लेकिन माओवादियों ने उन पर भी गोलियां बरसाईं। इस निर्मम हमले ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। हर भारतीय ने उन बहादुर जवानों के सर्वोच्च बलिदान को नम आंखों से याद किया।
घटना के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश और ओडिशा सरकारों ने संयुक्त जांच शुरू की। प्रशासन ने राहत और बचाव अभियान के लिए हेलीकॉप्टर, गोताखोर और अतिरिक्त सुरक्षा बलों को मौके पर भेजा। कई दिनों तक जलाशय में शवों और लापता जवानों की तलाश चलती रही। इस दौरान पूरे देश ने जवानों के परिवारों का दर्द महसूस किया।
केंद्र सरकार ने इस घटना को राष्ट्र विरोधी आतंकवादी हमला बताया और माओवादियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया। इसके बाद व्यापक स्तर पर सुरक्षा रणनीति तैयार हुई। इसी पृष्ठभूमि में बहुचर्चित "ऑपरेशन ग्रीन हंट" शुरू हुआ। इस अभियान के तहत सुरक्षा बलों ने कई राज्यों में माओवादी नेटवर्क को कमजोर करने के लिए लगातार कार्रवाई की। सरकार ने साफ संदेश दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला करने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
जांच एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि यह हमला किसी अचानक हुई मुठभेड़ का परिणाम नहीं था। माओवादियों ने पूरी योजना के साथ इस घातक हमले को अंजाम दिया था। बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने बेशर्मी से इसकी जिम्मेदारी भी ली। संगठन ने इसे आत्मरक्षा की कार्रवाई बताने की कोशिश की और दावा किया कि सुरक्षा बल उनके क्षेत्र में घुसकर ग्रामीणों पर अत्याचार कर रहे थे।
हालांकि जांच में इन दावों का कोई प्रमाण नहीं मिला। अधिकारियों ने पुष्टि की कि ग्रेहाउंड कमांडो अपना अभियान पूरा करके लौट रहे थे। किसी ग्रामीण पर अत्याचार या कथित दमन की बात सामने नहीं आई। इसके बावजूद माओवादियों ने झूठे प्रचार के सहारे अपनी हिंसा को सही ठहराने की कोशिश की। उनके इस रवैये ने यह भी दिखाया कि वे अपनी हर बर्बर कार्रवाई को वैचारिक संघर्ष का नाम देकर छिपाना चाहते हैं।
इस हमले से बच निकले कई जवान आज भी उस भयावह दिन की यादों से उबर नहीं पाए हैं। उन्होंने अपने साथियों को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देखा। कई जवान दोबारा ड्यूटी पर लौटे, लेकिन अपने साथियों को खोने का दर्द आज भी उनके भीतर जिंदा है। उनके परिवारों ने भी अपनों की कमी के साथ जीना सीखा, लेकिन वह खालीपन कभी नहीं भर सका।
हर वर्ष 29 जून को ग्रेहाउंड फोर्स अपने वीर साथियों की स्मृति में श्रद्धांजलि दिवस मनाती है। जवान स्मारकों पर पुष्पांजलि अर्पित करते हैं और दो मिनट का मौन रखकर अपने साथियों को श्रद्धांजलि देते हैं। पुलिस अकादमियां भी इन वीर कमांडो के अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को सम्मानपूर्वक याद करती हैं। यह दिन केवल शोक का नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले वीरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी बनता है।
आज बालीमेला का शांत जलाशय सामान्य दिखाई देता है, लेकिन उसकी लहरें उस खूनी दिन की कहानी आज भी अपने भीतर समेटे हुए हैं। जिन परिवारों ने अपने बेटे, पति या पिता खोए, उनके लिए 29 जून कभी सामान्य तारीख नहीं बन सकी। हर वर्ष यह दिन उनके पुराने जख्म फिर हरे कर देता है।
माओवादियों ने उस दिन यह साबित कर दिया कि सत्ता हासिल करने के लिए वे निर्दोष लोगों और सुरक्षाकर्मियों की जान लेने से कभी भी पीछे नहीं हटते।
लेख
शोमेन चंद्र
एसोसिएट एडिटर, द नैरेटिव