
राजस्थान के उदयपुर जिले में अवैध कन्वर्ज़न की गतिविधियों के बीच मिशनरी समूह के 11 लोगों की गिरफ्तारी ने एक बार फिर उस बहस को केंद्र में ला दिया है, जो पिछले कई वर्षों से झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य भारत के अन्य जनजातीय क्षेत्रों में चल रही है।
पुलिस कार्रवाई में गिरफ्तार लोगों में झारखंड और छत्तीसगढ़ से आए कुछ ईसाई पादरी भी हैं, जिसके बाद यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या विभिन्न राज्यों में सक्रिय मिशनरी नेटवर्क एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं?
ग्रामीणों का कहना है कि पहले परिवारों की व्यक्तिगत कठिनाइयों की जानकारी जुटाई जाती थी और फिर उन्हीं समस्याओं के समाधान का आश्वासन देकर उन्हें चर्च एवं प्रार्थना सभाओं से जोड़ने का प्रयास किया जाता था।
स्थानीय लोगों के अनुसार आर्थिक संकट, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और पेयजल जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे जनजाति परिवार विशेष रूप से निशाने पर थे। मिशनरी समूहों द्वारा उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता था कि चर्च से जुड़ने और नियमित प्रार्थना सभाओं में भाग लेने से उनकी परेशानियों का समाधान हो सकता है। ईसाइयों ने धीरे-धीरे इस प्रक्रिया के माध्यम से आसपास के कई गांवों में प्रभाव बढ़ाया गया।
6 जून को हुई कार्रवाई के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि इस गतिविधि का दायरा कितना व्यापक था। पुलिस के अनुसार गांव के एक स्थानीय ईसाई व्यक्ति के नेतृत्व में गतिविधियां संचालित हो रही थीं तथा प्रार्थना सभाओं के माध्यम से बड़ी संख्या में परिवारों तक पहुंच बनाई जा रही थी। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पिछले एक दशक से क्षेत्र में आर्थिक प्रलोभन और प्रचार के माध्यम से अवैध कन्वर्ज़न के प्रयास किए जा रहे थे।

ग्रामीणों के अनुसार बाहरी ईसाई मिशनरी समूह पहले ईसाई साहित्य, दवाइयां और सहायता सामग्री वितरित करते थे। इसके बाद स्थानीय स्तर पर कुछ ईसाइयों को जोड़कर गांवों में प्रभावशाली संपर्क तंत्र तैयार किया जाता था। प्रत्येक गांव में तीन से चार स्थानीय समन्वयकों के माध्यम से यह नेटवर्क संचालित किया जा रहा था।
प्रार्थना सभा में शामिल हुए एक ग्रामीण ने बताय कि वहां दो सौ से अधिक की संख्या में लोगों को एकत्र कर धार्मिक प्रचार किया जाता था और ईसा मसीह से जुड़ने पर जीवन में परिवर्तन तथा आर्थिक लाभ होने की बातें कही जाती थीं। इस घटना ने क्षेत्र में सक्रिय मिशनरी नेटवर्कों को लेकर कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
इस प्रकरण पर उदयपुर के सांसद मन्नालाल रावत ने भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि कन्वर्ज़न के लिए प्रलोभन या दबाव का उपयोग किया गया है तो यह न केवल सामाजिक दृष्टि से बल्कि कानूनी रूप से भी गंभीर विषय है। उनका कहना है कि राज्य में इस प्रकार की गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए कानून मौजूद है और उसका पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

व्यापक तरीक़े से देखें तो झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के अनेक जनजातीय क्षेत्रों में लंबे समय से पहचान, संस्कृति और अस्मिता को लेकर विभिन्न प्रकार के विमर्श उभरते रहे हैं। "जनजाति हिन्दू नहीं है", "अलग धर्म कोड" जैसी मांगें भी समय-समय पर चर्चा में रही हैं। यदि कड़ियों को पकड़ा जाए तो यह समझ आता है कि इन विमर्शों के पीछे मिशनरी प्रभाव की भूमिका है, जिसकी गंभीर जांच होनी चाहिए।