25 जून 1975 को आपातकाल लागू होने के साथ ही राजनीतिक प्रतिरोध को निष्क्रिय करने की एक व्यापक सरकारी कार्रवाई भी शुरू हो गई। राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आंतरिक आपातकाल की घोषणा होते ही प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय हो गई। रातोंरात विपक्ष के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के आदेश जारी हुए, समाचार पत्रों की बिजली काट दी गई, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और देशभर में पुलिस तथा खुफिया एजेंसियों ने पूर्व निर्धारित सूची के आधार पर धरपकड़ शुरू कर दी।
इंदिरा सरकार का उद्देश्य स्पष्ट था कि किसी भी प्रतिरोध को संभावना मात्र के रूप में भी जन्म न लेने दिया जाए। कुछ ही घंटों में समाजवादी नेता, जनसंघ के वरिष्ठ पदाधिकारी, गांधीवादी कार्यकर्ता, छात्र नेता, ट्रेड यूनियन प्रतिनिधि और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमे और बिना न्यायिक सुनवाई के लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता था। यही कानून इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक असहमति को नियंत्रित करने का सबसे प्रभावी औजार बना।
सरकार की यह रणनीति इस धारणा पर आधारित थी कि यदि नेतृत्व को जेल में डाल दिया जाए, तो आंदोलन स्वतः समाप्त हो जाएगा। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का अनुभव कुछ और ही साबित होने वाला था। जेलों में बंद नेताओं के समानांतर एक दूसरा नेतृत्व तेजी से उभर रहा था, जो माइक, माला और मंच के प्रपंच से नहीं, बल्कि भूमिगत संपर्कों, गुप्त बैठकों और वैकल्पिक संचार तंत्र के माध्यम से इंदिरा की तानाशाही के विरुद्ध डटकर खड़ा हुआ।
जेपी: जेल की सलाखों के पीछे भी आंदोलन का नैतिक नेतृत्व
इमरजेंसी लागू होने के तुरंत बाद जिन नेताओं को सबसे पहले गिरफ्तार किया गया, उनमें जयप्रकाश नारायण भी शामिल थे। उस समय उनकी आयु अधिक थी और उनका स्वास्थ्य भी लगातार गिर रहा था। इसके बावजूद सरकार ने उन्हें जेल में बंद रखा।
जेपी ने "संपूर्ण क्रांति" का आह्वान करते हुए राजनीतिक परिवर्तन के साथ-साथ प्रशासनिक, सामाजिक, शैक्षणिक और नैतिक सुधार की बात की। गिरफ्तारी के बाद उन्हें विभिन्न स्थानों पर रखा गया। जेल में उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती गई और बाद में स्वास्थ्य कारणों से उन्हें चिकित्सकीय देखरेख में स्थानांतरित करना पड़ा। भूमिगत कार्यकर्ता उनके संदेशों, पूर्व वक्तव्यों और "संपूर्ण क्रांति" की अवधारणा को जनता तक पहुंचाते रहे। इस प्रकार जेपी जेल के भीतर रहते हुए भी प्रतिरोध के प्रतीक बने रहे।
नानाजी देशमुख: भूमिगत संघर्ष के रणनीतिकार
जहां अनेक बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, वहीं कुछ ऐसे भी थे जो पुलिस की गिरफ्त से बच निकले और भूमिगत आंदोलन के संचालन में जुट गए। इनमें नानाजी देशमुख का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
इमरजेंसी की घोषणा के तुरंत बाद उन्हें गिरफ्तार करने के प्रयास हुए, किंतु वे पुलिस को चकमा देकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचने में सफल रहे। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग पूरी तरह स्वयं को अलग कर भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से विपक्षी दलों, स्वयंसेवकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करने का कार्य किया। उनका विश्वास था कि यदि संचार व्यवस्था और संगठनात्मक संपर्क बनाए रखे गए, तो व्यापक दमन के बावजूद प्रतिरोध को समाप्त नहीं किया जा सकेगा।
नानाजी देशमुख ने विभिन्न राज्यों में सक्रिय कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क सूत्र विकसित किए। सुरक्षित ठिकानों, विश्वसनीय संदेशवाहकों और सीमित जानकारी साझा करने की पद्धति के माध्यम से भूमिगत आंदोलन को व्यवस्थित रूप दिया गया। इस नेटवर्क की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं था। यदि कोई कार्यकर्ता गिरफ्तार हो जाता, तो दूसरे स्तर का संपर्क तंत्र तत्काल सक्रिय हो जाता। यही कारण था कि हजारों गिरफ्तारियों के बावजूद प्रतिरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
अटल और आडवाणी: जेल की दीवारों के भीतर का संघर्ष
इमरजेंसी की घोषणा के समय जनसंघ के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी बेंगलुरु में संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने पहुंचे थे। 26 जून की सुबह दोनों को गिरफ्तार कर वहीं की जेल में भेज दिया गया। बाद के महीनों में उन्होंने लंबी अवधि तक कारावास का सामना किया।
जेल केवल बंदीगृह नहीं था, बल्कि वह लोकतांत्रिक संवाद का भी एक नया केंद्र बन गया। विभिन्न विचारधाराओं के नेता पहली बार इतने लंबे समय तक एक साथ रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने संस्मरणों और वक्तव्यों में उस दौर को भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा बताया, जबकि लालकृष्ण आडवाणी ने बाद में यह टिप्पणी की, "When asked to bend, they crawled." यह टिप्पणी विशेष रूप से उस दौर में मीडिया और संस्थागत समर्पण पर केंद्रित थी, लेकिन इसके माध्यम से उन्होंने यह भी संकेत दिया कि लोकतंत्र केवल संविधान से नहीं, बल्कि उसे संचालित करने वाली संस्थाओं के नैतिक साहस से सुरक्षित रहता है।
प्रतिबंध के बाद भी सक्रिय: संघ का भूमिगत संगठन
आपातकाल लागू होने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पदाधिकारियों और प्रचारकों की देशभर में गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। इसके साथ ही 4 जुलाई 1975 को केंद्र सरकार ने संघ पर औपचारिक प्रतिबंध लगा दिया। प्रतिबंध के बाद संघ के कार्यालय सील कर दिए गए और उसकी गतिविधियों पर रोक लगा दी गई।
26 जून को संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस को नागपुर से गिरफ्तार कर पुणे की यरवडा जेल भेज दिया गया। इसके साथ ही विभिन्न राज्यों में हजारों स्वयंसेवकों और प्रचारकों के विरुद्ध कार्रवाई की गई। अनेक वरिष्ठ पदाधिकारी, जिनमें सरकार्यवाह माधवराव मुले सहित कई प्रचारक शामिल थे, गिरफ्तारी से बचकर भूमिगत हो गए और विपक्षी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करने में सक्रिय रहे।
प्रतिबंध के बाद संघ ने सार्वजनिक गतिविधियों के स्थान पर गुप्त संपर्क व्यवस्था अपनाई। छोटे समूहों, सुरक्षित ठिकानों और व्यक्तिगत संपर्कों के माध्यम से संगठनात्मक गतिविधियां जारी रखी गईं। भूमिगत स्वयंसेवकों ने विभिन्न राज्यों में लोकतंत्र समर्थक समूहों, छात्र संगठनों और विपक्षी कार्यकर्ताओं के बीच संदेश पहुंचाने, साहित्य का वितरण करने तथा संपर्क बनाए रखने का कार्य किया।
इमरजेंसी के दौरान बड़ी संख्या में संघ के स्वयंसेवकों को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) और अन्य कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया। विभिन्न स्रोतों के अनुसार प्रारंभिक महीनों में ही लगभग 45,000 से 50,000 स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया, जबकि बाद में यह संख्या और बढ़ी।
लेख
केवली कबीर जैन
पत्रकारिता छात्र, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय