FCRA संशोधन 2026 के खिलाफ देशव्यापी मोर्चा: कैसे Joint Action Forum on Minorities (JAFM) ने खड़ा किया राष्ट्रीय विरोध अभियान

कैसे JAFM ने FCRA संशोधन 2026 के खिलाफ चर्च नेटवर्क, विदेशी सहायता प्राप्त संस्थाओं और विपक्षी दलों को एक साझा विरोध मंच पर संगठित किया?

The Narrative World    04-Jul-2026   
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विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन 2026 ने केवल एक कानूनी बहस को जन्म नहीं दिया है, बल्कि इसने देशभर के अल्पसंख्यक संगठनों, चर्च संस्थाओं और नागरिक समाज के एक वर्ग को एक साझा मंच पर ला खड़ा किया है। इस विरोध की अगुवाई कर रहा है Joint Action Forum on Minorities (JAFM), एक ऐसा मंच जिसने कुछ ही महीनों में राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित अभियान खड़ा कर दिया।
 
मई 2026 में गठित JAFM ने संसद से लेकर चर्चों, नागरिक समाज, सोशल मीडिया और सार्वजनिक सभाओं तक बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। इसके सार्वजनिक अभियान का नेतृत्व DMK के राज्यसभा सांसद P. Wilson कर रहे हैं। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों का दौरा कर चर्च नेताओं, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और विपक्षी दलों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया।
 
विरोध का केंद्र क्या है?
 
JAFM का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन केवल वित्तीय नियमन का विषय नहीं है। मंच का दावा है कि नए प्रावधान धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और विदेशी सहायता प्राप्त गैर-सरकारी संस्थाओं के संचालन पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य विदेशी अंशदान व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है।
 
उपलब्ध दस्तावेज़ के अनुसार, JAFM विशेष रूप से निम्न प्रावधानों पर आपत्ति जता रहा है। इनमें पंजीकरण रद्द होने की स्थिति में संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़े प्रावधान, ₹10 लाख विदेशी अंशदान सीमा, "Proselytisation" शब्द का उपयोग तथा सोशल मीडिया और वेबसाइटों के अनिवार्य प्रकटीकरण से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
 
P. Wilson: अभियान का चेहरा
 
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JAFM के अभियान का सबसे प्रमुख चेहरा राज्यसभा सांसद P. Wilson हैं। मंच के गठन के बाद उन्होंने विभिन्न राज्यों में परामर्श बैठकों, प्रेस वार्ताओं और संवाद कार्यक्रमों की श्रृंखला प्रारंभ की। चेन्नई इस अभियान का रणनीतिक केंद्र बनकर उभरा, जहां कई महत्वपूर्ण बैठकें और प्रेस कॉन्फ़्रेंस आयोजित की गईं। उपलब्ध दस्तावेज़ में भी चेन्नई में आयोजित प्रेस सम्मेलन तथा JAFM की सक्रिय भूमिका का उल्लेख है।
 
चर्चों से डिजिटल नेटवर्क तक
 
JAFM ने विरोध को केवल ज्ञापनों तक सीमित नहीं रखा। मंच ने चर्च संस्थाओं, शिक्षा संस्थानों, विधि विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और डिजिटल स्वयंसेवकों का एक व्यापक नेटवर्क विकसित किया। 28 जून 2026 को देशभर में राष्ट्रीय प्रार्थना एवं उपवास दिवस आयोजित किया गया। इसके बाद आगामी चरणों में राष्ट्रीय विरोध दिवस, राज्य एवं जिला समितियों के गठन, हस्ताक्षर अभियान और सोशल मीडिया अभियान की योजना बनाई गई।
 
विरोध की रणनीति
 
JAFM के विरोध अभियान में विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। राष्ट्रीय प्रार्थना एवं उपवास अभियान के माध्यम से धार्मिक समुदायों के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। राज्य एवं जिला समितियों का गठन कर धार्मिक संगठनों को संगठित और तैयार किया जा रहा है। हस्ताक्षर अभियान के जरिए व्यापक जनसमर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है। याचिकाओं और ज्ञापनों के माध्यम से सरकार तक विरोध और मांगों को पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके साथ ही डिजिटल और सोशल मीडिया अभियान के जरिए व्यापक स्तर पर जनजागरूकता फैलाई जा रही है। वहीं, विपक्षी सांसदों से समन्वय स्थापित कर संसदीय स्तर पर भी इस मुद्दे को उठाने की रणनीति अपनाई जा रही है।
 
किन प्रावधानों पर सबसे अधिक विवाद?
 
JAFM का विरोध मुख्य रूप से कुछ प्रमुख प्रावधानों पर केंद्रित है। संपत्ति प्रबंधन संबंधी प्रावधानों को लेकर आरोप लगाया जा रहा है कि इनसे संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। ₹10 लाख की विदेशी अंशदान सीमा को लेकर आशंका जताई गई है कि इससे छोटे संगठनों के अस्तित्व पर प्रभाव पड़ सकता है। "Proselytisation" संबंधी प्रावधानों को कानूनी अस्पष्टता का कारण बताया जा रहा है। सोशल मीडिया गतिविधियों से जुड़े प्रावधानों पर व्यापक निगरानी की आशंका व्यक्त की जा रही है। वहीं, अतिरिक्त प्रशासनिक शक्तियों को अनुपालन का बढ़ता बोझ माना जा रहा है।
 
 
कहाँ सबसे अधिक सक्रिय है अभियान?
 
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दस्तावेज़ के अनुसार, केरल और तमिलनाडु इस अभियान के प्रमुख केंद्र बनकर उभरे हैं। चेन्नई में रणनीतिक बैठकों के माध्यम से आंदोलन को दिशा दी गई, जबकि केरल में चर्चों और सामाजिक संगठनों ने सक्रिय भागीदारी दिखाई। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से सतर्कता बरतने की आवश्यकता दर्ज की है।
 
आगे क्या?
 
JAFM ने 5 जुलाई 2026 को राष्ट्रीय विरोध दिवस आयोजित करने की घोषणा की है। मंच की रणनीति राज्य और जिला स्तर तक संगठनात्मक विस्तार, जनसंपर्क अभियान और संसदीय संवाद को आगे बढ़ाने की है।
 
FCRA संशोधन 2026 पर चल रही बहस केवल कानून तक सीमित नहीं है। यह नागरिक समाज की भूमिका, धार्मिक स्वतंत्रता, विदेशी वित्तपोषण के नियमन और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन पर भी व्यापक विमर्श का विषय बन चुकी है। Joint Action Forum on Minorities (JAFM) ने इस बहस में एक संगठित अभियान खड़ा किया है और स्वयं को प्रस्तावित संशोधनों के प्रमुख विरोधी मंच के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। वहीं, सरकार का पक्ष है कि प्रस्तावित संशोधन विदेशी अंशदान व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से लाए गए हैं।
 
 
आने वाले संसदीय और सार्वजनिक विमर्श में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संवाद, विधायी प्रक्रिया और संभावित संशोधनों के माध्यम से इन भिन्न दृष्टिकोणों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित होता है।
 
लेख
डॉ. रत्ना त्रिवेदी
मार्गदर्शक एवं वाली, मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ ट्राइबल एंड रूरल एडवांसमेंट्स (मित्र ), गुजरात