बस्तर के जनजातियों ने 2005 में माओवादी आतंक से बचने के लिए 'सलवा जुडूम' नामक जन आंदोलन शुरू किया। कम्युनिस्ट इकोसिस्टम ने 5 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट के जरिए इस आत्मरक्षा अभियान को रुकवा दिया। परिणामस्वरूप जनजाति फिर से नक्सली हिंसा का शिकार बने।
माओवादियों ने भारत की सत्ता हथियाने के लिए एक सोची समझी रणनीति बनाई। इसके तहत उन्होंने बस्तर के घने जंगलों को अपना आधार क्षेत्र चुना। माओवादियों ने पर्याप्त आर्थिक संसाधन वाले दुर्गम क्षेत्रों को चुना और 1980 के दशक में आंध्र प्रदेश से आकर बस्तर में घुसपैठ की। उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा का प्रचार कर अपना संगठन खड़ा किया। लेकिन लोगों के बीच आतंकी संगठन बनाना इतना सरल नहीं था। इसलिए माओवादियों ने भय, आतंक और प्रोपेगेंडा का जमकर इस्तेमाल किया। उन्होंने खुद को जनजातियों का रक्षक बताया, लेकिन असल में वहां के जनजीवन को पूरी तरह तबाह कर दिया।
नक्सलियों ने अपनी क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। माओवादियों ने अपनी 'जनताना अदालतों' में निर्दोष ग्रामीणों, सरपंचों और पटेलों को पुलिस मुखबिर बताकर बेरहमी से मार डाला। उन्होंने जनजातियों की परम्पराओं को नष्ट करने के लिए पुजारियों की हत्याएं कीं। माओवादियों ने बच्चों को पांचवीं कक्षा से आगे पढ़ने पर रोक लगा दी और स्कूल भवनों को विस्फोटकों से उड़ा दिया। नक्सलियों ने हर परिवार से एक बच्चे को माओवादी दलम में अनिवार्य रूप से भर्ती करने का फरमान सुनाया। उन्होंने मासूम बच्चों के हाथों में बंदूकें थमा दीं और पुलिस मुठभेड़ों में उनका 'मानव ढाल' की तरह इस्तेमाल किया।
आर्थिक समानता की बात करने वाले कम्युनिस्टों ने बस्तर में जनजातियों के संसाधनों का भारी शोषण किया। माओवादी बस्तर क्षेत्र से प्रतिवर्ष 1500 करोड़ रुपये से अधिक की जबरन वसूली करते हैं। उन्होंने तेंदूपत्ता संग्रह से हर गांव के प्रत्येक व्यक्ति से प्रतिदिन दो गड्डियों की वसूली तय कर रखी थी। माओवादी महुआ संग्रह और धान की खेती करने वाले किसानों से भी हर साल फसल लूटते थे। माओवादियों ने सड़कें काटीं, बिजली के खंभे उखाड़े और जंगलों में प्रेशर बम बिछाए। इन बमों की चपेट में आकर हजारों ग्रामीणों ने अपने हाथ पैर गंवा दिए।
माओवादियों के इन्हीं दैनिक अत्याचारों से त्रस्त होकर बस्तर के जनजातियों ने अपने बचाव के लिए 'सलवा जुडूम' अभियान शुरू किया। जनजातियों ने इससे पहले 1990 और 1991 में भी जन जागरण अभियान शुरू किया था। लेकिन नक्सलियों ने 70 से अधिक हत्याएं करके उसे कुचल दिया। जून 2005 में बीजापुर के कांकेली गांव के पास नक्सलियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की गाड़ी लूट ली। इसके जवाब में ग्रामीणों ने बैठक बुलाकर नक्सलियों का बहिष्कार करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। अगस्त 2005 में जनजातियों ने आत्मरक्षा के लिए पारम्परिक हथियार उठा लिए। पुलिस थानों में स्टाफ की कमी देखकर सरकार ने इन्हीं ग्रामीणों में से युवाओं को 18 महीने का प्रशिक्षण देकर स्पेशल पुलिस ऑफिसर (एसपीओ) बनाया।
सलवा जुडूम पूरे बस्तर में तेजी से फैला। बस्तर के ग्रामीणों ने जब नक्सलियों को खदेड़ना शुरू किया तो माओवादियों का नैरेटिव ध्वस्त होने लगा। हार देखते हुए कम्युनिस्टों ने अपने पूरे इकोसिस्टम को सक्रिय कर दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, इतिहासकार रामचंद्र गुहा, पूर्व आईएएस ईएएस शर्मा और स्वामी अग्निवेश ने 9 मई 2007 को सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर दी। उन्होंने अदालत से सलवा जुडूम पर प्रतिबंध लगाने और एसपीओ की भर्ती रोकने की मांग की। उन्होंने सलवा जुडूम पर 547 लोगों की हत्या का झूठा आरोप लगाया।
सर्वोच्च न्यायालय ने इन आरोपों की जांच का जिम्मा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंपा। आयोग की टीम ने नक्सली हमलों के बावजूद बस्तर का दौरा किया। मानवाधिकार आयोग ने अदालत में 116 पृष्ठों की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के झूठ को उजागर कर दिया। जांच ने प्रमाणित किया कि याचिकाकर्ताओं ने जिन लोगों की हत्या का आरोप सलवा जुडूम पर लगाया था उन्हें वास्तव में माओवादियों ने मारा था। याचिकाकर्ताओं की सूची में शामिल कई नाम वास्तव में सक्रिय नक्सली थे। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को कड़ी चेतावनी दी कि राहत शिविरों को बंद करना जनजातियों के लिए आत्मघाती साबित होगा।
लेकिन 5 जुलाई 2011 को जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी ने अपना दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय सुनाया। उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार को सलवा जुडूम रोकने का आदेश दिया। जस्टिस रेड्डी ने मानवाधिकार आयोग की तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट की पूरी तरह अनदेखी कर दी। इसके बजाय उन्होंने 2008 की योजना आयोग की उस रिपोर्ट को मुख्य आधार बनाया जिसे उनके पुराने वामपंथी सहयोगियों ने तैयार किया था। योजना आयोग की इस रिपोर्ट को माओवादी समर्थक के. बालगोपाल और बेला भाटिया ने लिखा था। जस्टिस रेड्डी ने वामपंथी प्रोफेसर अमित भादुरी के 'विकासात्मक आतंकवाद' सिद्धांत को भी मान्यता दी।
न्यायालय के इस फैसले ने बस्तर के हजारों जनजातियों से उनका सुरक्षा कवच छीन लिया। सलवा जुडूम शिविरों के टूटते ही ग्रामीण निहत्थे होकर अपने गांवों में लौट गए। इसके बाद माओवादियों ने चुन चुनकर इन जनजातियों का कत्लेआम किया। अर्बन नक्सलियों ने एक पूरी जनजाति पीढ़ी के जनसंहार का रास्ता साफ कर दिया। उन्होंने बस्तर को फिर से लाल आतंक की आग में धकेल दिया।
बस्तरवासी इसी अन्याय को माओवादी आतंक के विरुद्ध अपनी लड़ाई का ईंधन मानते हैं। इसलिए वे हर साल 5 जुलाई को सलवा जुडूम स्मृति दिवस मनाते हैं। बस्तर से सशस्त्र माओवाद का अध्याय पूरी तरह समाप्त हो चुका है, इसलिए लोगों ने इसे प्रखरता से मनाना आरंभ कर दिया है। यह दिन हमें इस ऐतिहासिक जन आंदोलन की याद दिलाता रहेगा। यह माओवादी आतंक का असली चेहरा समाज के सामने लाता है।