साल 1949 में चीन में कम्युनिस्ट सत्ता स्थापित होने के बाद माओ ज़ेडोंग ने केवल सरकार नहीं बनाई, बल्कि पूरे समाज को अपनी विचारधारा के अनुरूप ढालने का अभियान भी शुरू किया। सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए उसने लगातार ऐसे राजनीतिक अभियान चलाए, जिनका लक्ष्य केवल विरोधियों को हराना नहीं था, बल्कि लोगों के मन में डर बैठाना भी था। इन्हीं अभियानों में साल 1955 में शुरू हुआ सुफान अभियान सबसे चर्चित अभियानों में शामिल रहा। "सुफान" का अर्थ था छिपे हुए प्रतिक्रांतिकारियों का सफाया। सुनने में यह अभियान राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रयास लगता था, लेकिन व्यवहार में इसने लाखों लोगों को संदेह, पूछताछ और दमन के दायरे में ला दिया।
माओ और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) का दावा था कि सरकार, सेना, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों के भीतर पुराने राष्ट्रवादी, जासूस और प्रतिक्रांतिकारी तत्व छिपे बैठे हैं। पार्टी नेतृत्व ने अधिकारियों को ऐसे लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इसके बाद पूरे चीन में भय का माहौल बन गया। अधिकारियों ने अपने अधीन काम करने वाले कर्मचारियों की जांच शुरू कर दी। सहकर्मी एक दूसरे पर शक करने लगे। कई जगह लोगों ने खुद को बचाने के लिए दूसरों पर आरोप लगाए।
सुफान अभियान का सबसे बड़ा असर सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और तकनीकी विशेषज्ञों पर पड़ा। किसी व्यक्ति के पुराने संबंध, पारिवारिक पृष्ठभूमि या राजनीतिक विचार उसके खिलाफ संदेह का आधार बन गए। कई लोगों ने वर्षों पहले राष्ट्रवादी सरकार के अधीन काम किया था। माओ की सरकार ने ऐसे लोगों को भी शक की नजर से देखना शुरू कर दिया। परिणाम यह हुआ कि हजारों निर्दोष नागरिक जांच और पूछताछ में फंस गए।
इस अभियान के दौरान लाखों लोगों की जांच हुई। बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया, जबकि अनेक लोगों को जेल, श्रम शिविर या कठोर दंड का सामना करना पड़ा। कई लोगों ने लगातार पूछताछ, सार्वजनिक अपमान और मानसिक दबाव के कारण आत्महत्या तक कर ली। अलग-अलग शोधों में प्रभावित लोगों की संख्या अलग बताई गई है, लेकिन अधिकांश विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि इस अभियान ने पूरे समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया।
माओ ने इस अभियान को केवल सुरक्षा का मामला नहीं रहने दिया। उसने इसे राजनीतिक वफ़ादारी की परीक्षा बना दिया। पार्टी के प्रत्येक सदस्य से अपेक्षा की गई कि वह पूरी तरह नेतृत्व के प्रति वफादार रहे। किसी अधिकारी ने यदि किसी संदिग्ध व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, तो उस अधिकारी पर भी संदेह होने लगा। इस व्यवस्था ने सरकारी तंत्र को भय के आधार पर चलने वाली मशीन में बदल दिया। लोग स्वतंत्र निर्णय लेने के बजाय केवल आदेशों का पालन करने लगे।
सुफान अभियान ने चीन के बौद्धिक वर्ग को भी गहरा नुकसान पहुंचाया। विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों में काम करने वाले अनेक विद्वानों ने खुलकर अपनी राय देना बंद कर दिया। वैज्ञानिकों, लेखकों और शिक्षकों ने यह समझ लिया कि सरकार से असहमति उन्हें गंभीर संकट में डाल सकती है। परिणामस्वरूप स्वतंत्र विचार और आलोचनात्मक चर्चा कमजोर पड़ गई। किसी भी समाज में नए विचार प्रगति का आधार बनते हैं, लेकिन भय के वातावरण ने चीन में इस प्रक्रिया को बड़ा झटका दिया।
इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि CCP ने जनता को लगातार यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि देश हर समय आंतरिक दुश्मनों से घिरा हुआ है। इस सोच ने समाज में अविश्वास को बढ़ावा दिया। मित्र, पड़ोसी और सहकर्मी भी एक दूसरे पर संदेह करने लगे। जब सरकार नागरिकों को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देती है, तब सामाजिक विश्वास तेजी से कमजोर पड़ता है। सुफान अभियान ने यही स्थिति पैदा की।
सुफान अभियान ने आगे आने वाले और भी कठोर अभियानों की जमीन तैयार की। इसके बाद चीन में कई राजनीतिक अभियान चले, जिनमें लाखों लोगों ने दमन झेला। माओ ने बार बार राजनीतिक शुद्धिकरण के नाम पर ऐसे अभियान चलाए, जिनसे पार्टी का नियंत्रण मजबूत हुआ, लेकिन आम नागरिकों की स्वतंत्रता लगातार कमजोर होती गई। यही कारण है कि सुफान अभियान को केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि सत्ता को हर कीमत पर सुरक्षित रखने की राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जाता है।
अनेक लोगों का करियर खत्म हो गया, परिवार टूट गए और समाज में भय की ऐसी संस्कृति विकसित हुई, जिसने वर्षों तक लोगों के व्यवहार को प्रभावित किया। माओ ज़ेडोंग और CCP ने इस अभियान के माध्यम से अपने विरोधियों पर नियंत्रण तो मजबूत किया, लेकिन इसके बदले चीन के समाज को गहरे भय, अविश्वास और दमन की कीमत चुकानी पड़ी।