नक्सल पीड़ितों ने दिल्ली पहुंचकर चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ बयान का किया पुरजोर विरोध

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में प्रेस वार्ता कर पूछा, “पूर्व गृहमंत्री को हमारी पीड़ा क्यों नहीं दिखती?” पीड़ितों ने हिंसा, वैचारिक समर्थन और बस्तर के भविष्य को लेकर उठाए सवाल

The Narrative World    18-Aug-2026
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18 अगस्त 2026 को नई दिल्ली पहुंचे बस्तर के नक्सल पीड़ितों ने कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस वार्ता कर पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान का विरोध करते हुए जवाब मांगा।
 
बस्तर शांति समिति के बैनर तले दिल्ली पहुंचे नक्सली हिंसा के पीड़ितों, घायल नागरिकों और शहीद परिवारों ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा स्वयं को “दिमागी नक्सल” कहे जाने पर गर्व व्यक्त करने वाले बयान का पुरजोर विरोध किया। पीड़ितों ने कहा कि नक्सलवाद उनके लिए कोई राजनीतिक विमर्श या वैचारिक बहस नहीं, बल्कि जीवन का ऐसा घाव है जिसकी पीड़ा वे आज भी झेल रहे हैं।
 
प्रेस वार्ता के दौरान पीड़ितों ने सवाल किया, “जो व्यक्ति देश का पूर्व गृहमंत्री रहा हो, वह ऐसे शब्दों को लेकर गर्व कैसे व्यक्त कर सकता है? हमारी पीड़ा क्यों नहीं दिखती? क्या वे नक्सल पीड़ितों के साथ हैं या हम बस्तरवासियों के साथ हैं?”
 
उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने नक्सली हिंसा में अपने परिजनों को खोया, गोलियां खाईं, बारूदी सुरंगों में अपने अंग गंवाए और अपने जीवनभर की आजीविका तथा सामान्य जीवन खो दिया, उनके लिए “दिमागी नक्सल” शब्द किसी गर्व का विषय नहीं हो सकता।
 
‘क्या नक्सलियों की रणनीति बनाने में भी भूमिका थी?’
 
पीड़ितों ने चिदंबरम के बयान पर तीखा सवाल उठाते हुए कहा, “यदि चिदंबरम यह कह रहे हैं कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है, तो क्या वे यह भी स्पष्ट करेंगे कि क्या वे नक्सलियों की रणनीति बनाने वालों में शामिल थे?”
 
उनका कहना था कि नक्सली हिंसा के दौरान बस्तर के ग्रामीणों, जनजातियों, जनप्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों ने जिस भयावहता को झेला है, उसे दिल्ली में बैठकर केवल वैचारिक शब्दों के खेल के रूप में नहीं देखा जा सकता। हिंसा का वास्तविक प्रभाव उन परिवारों के जीवन में आज भी मौजूद है जिन्होंने अपने परिजनों, शरीर, आजीविका और सामान्य जीवन की कीमत चुकाई है।
 
प्रेस वार्ता में सामने आई नक्सल पीड़ितों की व्यथा
 
प्रेस वार्ता में नक्सली हिंसा के कई पीड़ितों ने अपनी आपबीती साझा की। इनमें गौतरिहा राम विश्वकर्मा भी शामिल रहे, जिन्हें वर्ष 2009 में नक्सलियों ने गोलियां मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया था। इसी तरह सियाराम रामटेके को वर्ष 2022 में खेत पर जाते समय गोलियां मारी गई थीं। गंभीर चोटों के कारण आज वे व्हीलचेयर और वॉकर के सहारे जीवन जी रहे हैं।
 
पीड़ितों ने आरक्षक मोहन उईके की शहादत और उनके पीछे छूटे परिवार की पीड़ा का भी उल्लेख किया। इसके साथ ही सालिक राम सिन्हा की शहादत, पुलिस जवान अमर सिंह कुमेटी की स्थायी दिव्यांगता तथा तरुण कलाकार की रीढ़ की गंभीर चोट का जिक्र करते हुए कहा गया कि ये घटनाएं नक्सली हिंसा की भयावह कीमत को सामने रखती हैं।
 
 
सीआरपीएफ कोबरा जवान रुद्रेश सिंह ने भी प्रेस वार्ता में अपनी पीड़ा साझा की। 25 जनवरी 2026 को हुए आईईडी विस्फोट में वे गंभीर रूप से घायल हुए और उन्हें अपना एक पैर गंवाना पड़ा। उन्होंने कहा कि नक्सली हिंसा की कीमत केवल आंकड़ों में नहीं मापी जा सकती। इसके पीछे किसी का शरीर, किसी का परिवार और किसी का पूरा भविष्य टूटता है।
 
‘नक्सली हिंसा केवल गोलियों और बारूदी सुरंगों की आवाज नहीं’
 
बस्तर शांति समिति ने कहा कि नक्सली हिंसा का वास्तविक चेहरा उन हजारों परिवारों की पीड़ा में दिखाई देता है जिन्होंने अपने लोगों को खोया है। समिति के अनुसार, यही कारण है कि “दिमागी नक्सलवाद” किसी के लिए गर्व करने का विषय नहीं हो सकता।
 
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पीड़ितों ने कहा कि नक्सली विचारधारा या “दिमागी नक्सली” के नाम पर निर्दोष नागरिकों और सुरक्षा बलों को निशाना बनाना किसी भी रूप में लोकतांत्रिक संघर्ष नहीं हो सकता। उनके अनुसार, बंदूक के बल पर भय पैदा किया जा सकता है, लेकिन विश्वास नहीं; रास्ते में बारूदी सुरंग बिछाई जा सकती है, लेकिन विकास की आकांक्षा को हमेशा के लिए नहीं रोका जा सकता।
 
उन्होंने कहा कि नक्सली हिंसा केवल गोलियों और विस्फोटों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने बस्तर के सामान्य जनजीवन, आजीविका और विकास की प्रक्रिया को भी लंबे समय तक प्रभावित किया है। इसलिए नक्सलवाद पर होने वाली किसी भी राजनीतिक या वैचारिक चर्चा में उन लोगों की आवाज को स्थान मिलना चाहिए जिन्होंने इस हिंसा को प्रत्यक्ष रूप से झेला है।
  
पीड़ितों का संदेश: ‘बस्तर को दिमागी नक्सल नहीं, शांति चाहिए
 
बस्तर शांति समिति के माध्यम से नक्सल पीड़ितों ने कहा कि बस्तर को “दिमागी नक्सल” नहीं, शांति चाहिए; भय नहीं, विश्वास चाहिए और हिंसा नहीं, विकास चाहिए।
 
उन्होंने राजनीतिक दलों और देश के बुद्धिजीवी वर्ग से अपील की - नक्सली विचारधारा और “दिमागी नक्सल” जैसे विषयों को केवल राजनीतिक विमर्श के चश्मे से न देखा जाए, बल्कि उन परिवारों की आंखों से भी देखा जाए जिन्होंने इस हिंसा की वास्तविक कीमत चुकाई है।
 
पीड़ितों ने कहा -
 
“जिस बस्तर ने दशकों तक हिंसा झेली है, उसकी आवाज देश को सुननी होगी।”
 
बस्तर की मांग: बंदूक नहीं, शांति और विकास
 
बस्तर शांति समिति ने कहा कि बस्तर की धरती अब “दिमागी नक्सली” विचार और नक्सली हिंसा की छाया से बाहर निकलकर शांति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, सुरक्षा और विकास की ओर आगे बढ़ना चाहती है।
 
समिति ने कहा कि बस्तर की जनता ने चार दशकों से नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई लड़कर इसके आतंक को समाप्त करने की दिशा में संघर्ष किया है और अब “दिमागी नक्सल” के नाम पर इसे दोबारा पनपने नहीं दिया जाएगा।
 
पीड़ितों ने कहा - 
 
जैसे नक्सलवाद को खत्म किया है, वैसे ही दिमागी नक्सल को भी खत्म कर देंगे।” 
 
नई दिल्ली में हुई इस प्रेस वार्ता के जरिए बस्तर के नक्सल पीड़ितों ने राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के बीच अपनी पीड़ा और अनुभव को सामने रखा।
 
उनका कहना था कि नक्सलवाद को केवल विचारधारा या राजनीतिक बहस के रूप में देखने के बजाय उन परिवारों के अनुभव से भी समझना होगा जिन्होंने गोलियों, आईईडी विस्फोटों, शहादत, स्थायी दिव्यांगता और उजड़े जीवन के रूप में इसकी कीमत चुकाई है।
 
 
बस्तर शांति समिति ने स्पष्ट किया कि क्षेत्र अब हिंसा और भय से आगे बढ़कर शांति, विश्वास, सुरक्षा और विकास की दिशा में अपना भविष्य देखना चाहता है।