नई दिल्ली: लाहौर में 26 अगस्त 1941 को स्थापित जमात-ए-इस्लामी के 85 वर्ष पूरे हुए। विभाजन के बाद गठित भारतीय इकाई ने ‘इक़ामत-ए-दीन’ के लिए देशभर में बहुस्तरीय नेटवर्क खड़ा किया।
“जमात ए इस्लामी हिन्द” भारतीय मुसलमानों के सबसे बड़े संगठनों में से एक है। यूं तो भारत में और भारतीय उपमहाद्वीप में जमात ए इस्लामी नाम से और भी संगठन कार्यरत है। मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी ने 26 अगस्त 1941 को लाहौर में जमात ए इस्लामी की स्थापना की थी।
मौदूदी का जन्म संभाजी नगर (औरंगाबाद) जिले में हुआ था, स्वतंत्रता पूर्व यह हैदराबाद रियासत का भाग था जो मुस्लिम नवाबों के शासन के अंतर्गत संचालित होता था। स्वयं को पैगंबर के वंश से जोड़ने के कारण एवं प्रभावी इस्लामी वातावरण में परवरिश का परिणाम उनकी विचारधारा पर पढ़ा। वे मुस्लिमों को सर्वोच्च शक्ति के रूप मे पुनः स्थापित करना चाहते थे। इस संबंध अपने विचारों को प्रसारित करने के लिए उन्होंने बड़े पैमाने पर साहित्य लेखन भी किया। इस साहित्य को मुस्लिम ब्रदरहुड एवं इस्लामिक कट्टरपंथी जगत में आदर्श माना जाता है।
मौदूदी इस्लाम को सिर्फ पूजा पद्धति तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, बल्कि उनका विचार जीवन के सभी क्षेत्रों में इस्लामिक जीवन पद्धति (इकामत ए दीन) की स्थापना करना था। जिससे व्यक्तिगत जीवन के साथ सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में भी इस्लामी सिद्धांतों की भूमिका बढ़े।
जिस जमात की परिकल्पना मौदूदी ने की थी वह अल्लाह के कानून द्वारा संचालित इस्लामिक राज्य की स्थापना की वकालत करता था और लोकतंत्र एवं धर्मनिरपेक्षता के मानकों पर स्थापित राज्य की खिलाफत करता था। मौदूदी की दृढ़ मान्यता थी कि किसी भी मुस्लिम की सर्वोच्च पहचान उसके देश से नहीं बल्कि उसकी उम्मत से होनी चाहिए। इसलिए "अबुल आला मौदूदी" ने “इक़ामत ए दीन” की जमात का मुख्य उद्देश्य घोषित किया। शुरुवाती दौर में जमात का प्रभाव तेजी से देश के अलग-अलग भागों में फैला लेकिन मात्र छह वर्ष बाद हुए भारत विभाजन पश्चात जमात ए इस्लामी में भी विभाजन हो गया।
विभाजन उपरांत भारत में रह गए जमात के सदस्यों ने मौलाना अबुल लैस इलाही के नेतृत्व में खुद को एकजुट किया और पूर्व संगठन से स्वयं को पृथक दिखाने हेतु जमात ए इस्लामी के साथ हिन्द जोड़ लिया। शुरुआत में जमात का मुख्यालय इलाहाबाद में रखा गया परंतु शीघ्र ही इसे नई दिल्ली में स्थानांतरित कर दिया गया।
इसी के साथ भारत में ही मुस्लिम बाहुल्य राज्य जम्मू कश्मीर में जमात ए इस्लामी का पृथक संगठन भी अस्तित्व में आया। इस संगठन के संस्थापक कश्मीर के भारत में विलय को स्वीकार नहीं करते थे, इसलिए उन्होंने जम्मू कश्मीर हेतु पृथक संगठन की स्थापना की, इसका विस्तार सिर्फ कश्मीर तक सीमित रहा। कालांतर में अवांछित गतिविधियों के परिणामस्वरूप भारत सरकार ने इसे प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल कर दिया।
विभाजन पश्चात मुस्लिम बाहुल्य पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी जमात के पृथक संगठनों की स्थापना हुई। पाकिस्तान में यह इस्लाम का सर्वोच्च धार्मिक संगठन बन गया और इसके द्वारा राजनीतिक शक्ति प्राप्ति के असफल प्रयास भी किए गए। विभाजन उपरांत अहमदिया मुसलमानों के विरूद्ध हुए दंगे पाकिस्तानी जमात की ही देन थी। इसी प्रकार बांग्लादेश में भी जमात की पृथक रचना निर्मित हुई लेकिन कट्टरवादी गतिविधियों में सहभागिता के कारण बांग्लादेश की पूर्व सरकार द्वारा इसे प्रतिबंधित कर दिया था। कुछ समय पूर्व हुए शासन परिवर्तन ने इस पर से प्रतिबंध वापस ले लिया जिसके कारण यह पुनः राजनीतिक वर्चस्व प्राप्ति हेतु सक्रिय है।
क्या है इकामत ए दीन
नए रूप में अस्तित्व में आई जमात ए इस्लामी हिन्द ने भी “इकामत ए दीन” की स्थापना को अपना मुख्य उद्देश्य ही घोषित किया। इकामत ए दीन दो अरबी शब्दों से मिलकर बना है जिसमें इकामत का अर्थ है स्थापित करना और दीन का संबंध इस्लाम से है। इसका पूर्ण अर्थ है इस्लाम को स्थापित करना। इसकी स्थापना के क्रमशः निम्न चरण बताए जाते है, व्यक्ति - परिवार – समाज – राज्य है। अर्थात पहले व्यक्तिगत जीवन को पूर्णतः इस्लाम के अनुरूप बनाना उसके बाद परिवार और समाज में इसे स्थापित करना तत्पश्चात राज्य को भी इस्लामी सिद्धांत के अनुसार स्थापित करना। जमात के अनुसार “इकामत ए दीन” स्थापना हर मुसलमान का कर्तव्य है।
जमात ए इस्लामी हिन्द की कार्यपद्धति
जमात अपनी कार्यप्रणाली एवं गतिविधि का मुख्य आधार कुरआन और सुन्नत को ही दर्शाती है। जमात का मुख्य कार्य इस्लामी सिद्धांतों एवं विचारों का प्रसार करना है, यह प्रसार सिर्फ इस्लाम को मानने वालों तक सीमित नहीं है बल्कि गैर मुस्लिमों तक भी इस्लाम के मजहबी विचारों को पहुंचाना उनका उद्देश्य है। इस हेतु गैर मुस्लिमों से संवाद, मस्जिद दर्शन, इस्लामी साहित्य वितरण और ऐसे अन्य कार्य करना जिससे मुस्लिमों में इस्लामिक सिद्धांतों के अनुपालन में वृद्धि हो और गैर मुस्लिमों में इस्लाम के प्रति आकर्षण बढ़े जो आगे चलकर “इकामत ए दीन” की स्थापना में सहयोग कर सके।
इस हेतु जमात द्वारा ‘Interfaith Dialogue’ जैसे संतुलित शब्दों का उपयोग किया जाता है। अपने विभिन्न उद्देश्यों में से जमात ने एक उद्देश्य के रूप में देशवासियों तक इस्लाम का संदेश पहुँचाना भी शामिल किया है, जो इकामत ए दीन का ही स्वरूप है।
जमात ए इस्लामी हिन्द द्वारा अलग-अलग वर्गों और क्षेत्रों में कार्य करने के लिए विविध संगठनों का निर्माण किया। मुस्लिम युवाओं तथा छात्रों को संगठित करने एवं उनके बीच इस्लामिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाइजेशन (SIO), मुस्लिम युवतियों के लिए गर्ल्स इस्लामिक आर्गेनाइजेशन (GIO) नामक संगठन की स्थापना की गई। इसी प्रकार से छोटे मुस्लिम बच्चों हेतु चिल्ड्रन इस्लामिक आर्गेनाइजेशन (CIO) काम करता हे। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ सिविल राइट्स (APCR) जमात ए इस्लामी हिन्द के विधिक संगठन के रूप में कार्यरत है।
इस संगठन कि स्थापना का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों की न्यायिक लड़ाई का हथियार बनना है। अनेक सांप्रदायिक, अवैध गतिविधियों में लिप्त मुस्लिम आरोपियों हेतु APCR द्वारा क़ानूनी सहायता प्रदान की गई है। वर्तमान में APCR की गतिविधियों में काफी वृद्धि देखी गई है।
वैसे तो “इकामत ए दीन” की अवधारणा लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का समर्थन नहीं करती है परंतु भारत जैसे लोकतांत्रिक राज्य में सत्ता की शक्ति प्राप्ति की राह लोकतांत्रिक राजनीतिक भागीदारी से ही पूर्ण होती है इसलिए जमात ए इस्लामी हिन्द के द्वारा वर्ष 2011 में वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया (WPI) के माध्यम से भारतीय राजनीति में प्रवेश किया था। स्थापना के पश्चात हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 25 सीटों पर भाग्य आजमाया और किसी भी सीट पर जमानत बचाने की स्थिति तक भी नहीं पहुँच पाई।

इस चुनाव में पार्टी का कुल वोट शेयर 0.04 प्रतिशत रहा। वर्तमान में पार्टी का केरल के कुछ क्षेत्रों में प्रभाव है, स्थानीय निकाय कि कुछ सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों ने सफलता प्राप्त की है, और विधानसभा चुनाव में भी कुछ प्रत्याशियों को अपना समर्थन प्रदान किया है। व्यवसायियों और उद्यमियों के संगठन के रूप में महाराष्ट्र से प्रारंभ हुआ रिफ़ाह चेम्बर ऑफ कॉमर्स (RIFAH) वर्तमान में 17 राज्यों मे सक्रिय है। यह मुस्लिम उद्यमियों की नेटवर्किंग करने, नए अवसर निर्मित करने और व्यवसाय को विकसित करने का कार्य करता है। इसी प्रकार से जमात द्वारा समाज सेवा के क्षेत्र में ह्यूमन वेलफेयर फाउंडेशन कार्यरत है। विभिन्न राज्यों में सेवा क्षेत्र में पृथक संगठन भी कार्यरत है, जैसे केरलम में पीपुल्स फाउंडेशन।
इसी के साथ संगठन की विचारधारा को प्रसारित करने एवं दृढ़ करने के लिए साहित्य एवं प्रकाशन से जुड़ी संस्था मरकजी मकतबा इस्लामी की स्थापना की गई है। जिसके माध्यम से विभिन्न पत्रिकाओं, पुस्तकों, इस्लामी साहित्य का प्रकाशन एवं वितरण किया जाता है। जमात द्वारा समाचार प्रकाशन के अनेक राज्यों में स्वतंत्र संस्थान भी निर्मित किए गए है। इस क्रम मे महाराष्ट्र में साप्ताहिक शोधन, उर्दू में साप्ताहिक दावत, केरल मे माध्यमं दैनिक समाचार पत्र, कर्नाटक में अनुपमा, और मीडिया वन टीव्ही चैनल भी इस दिशा में कार्यरत है।
इस्लाम के आर्थिक सिद्धांतों के अनुरूप "सहूलत माइक्रो फाईनेंस" नामक संस्था स्थापित की गई है। इसका नेटवर्क अनेक राज्यों में फैला है और यह मुस्लिमों को शरीयत आधारित ब्याज मुक्त ऋण प्रदान करने के इस्लामी सिद्धांत पर काम करती है। महाराष्ट्र में राहत क्रेडिट सोसायटी जैसी आर्थिक संस्थाएं भी स्थानीय स्तर पर इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्थापित की गई है।
जमात के भीतर ही आंतरिक रूप से दावत, तरर्बियत, मरकजी तालीमी बोर्ड, इस्लामी मुआशरा जैसे विभिन्न विभाग भी कार्यरत है। अकादमिक, साहित्य, इतिहास, विदेश नीति, पब्लिक पॉलिसी इस विषय मे काम करने के लिए भी जमात ए इस्लामी हिन्द द्वारा कुछ समूह कार्यरत है।
जमात ए इस्लामी हिन्द - विवाद और आरोप
जमात ए इस्लामी हिन्द की लगभग आठ दशकों की यात्रा में कई विवादित अध्याय भी सामने आए है। जिसमें कट्टरवाद की भावना फैलाने, आतंकवादी संगठनों से संबंध जैसे आरोप भी संगठन पर लगे है। जमात की छात्र विंग के रूप में 1977 में अलीगढ़ से स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) की शुरुआत हुई, अपने आरंभिक दौर में सिमी ने भी “इकामत ए दीन” को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत माना परंतु इस उद्देश्य को प्राप्त करने हेतु सिमी ने चरमपंथी गतिविधियों का सहारा लेना शुरू कर दिया। इस संबंध में उपजे वैचारिक अंतर के कारण सिमी शीघ्र ही जमात से अलग हो गया। इसकी शुरुआत तब देखने को मिली जब यासिर अराफात की भारत यात्रा के दौरान दोनों ही संगठनों की प्रतिक्रिया में विरोधाभास देखने को मिला।
एक ओर जहां जमात ने यासिर की भारत यात्रा का स्वागत किया वहीं दूसरी ओर सिमी ने यासिर की भारत यात्रा का विरोध किया। ऐसा ही मतभेद ईरानी इस्लामी क्रांति के प्रश्न पर भी देखने को मिला। कालांतर में सिमी की अनेक आतंकवादी घटनाओं और देशविरोधी गतिविधियों में भी भूमिका सामने आई जिसके बाद गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून के तहत सिमी को प्रतिबंधित कर दिया गया।
CAA कानून के विरोध में देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने, उन्हें संबोधित करने और उन्हें विस्तारित करने में भी जमात की भूमिका देखने को मिली है।
जमात और मुस्लिम उम्मत में मतभेद
जमात मुसलमानों का धार्मिक संगठन है फिर भी मुस्लिम उम्मत में इसे पूर्ण स्वीकार्यता प्राप्त नहीं है। अनेक अवसरों पर मुस्लिम संगठनों और व्यक्तियों द्वारा जमात के कार्यों की आलोचना भी की गई है। फरवरी 2026 में केरल के सुन्नी मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल उलेमा ने जमात ए इस्लामी हिन्द की थियोक्रेटिक एवं कट्टरवादी विचारधारा के विरोध में एक प्रस्ताव पारित कर उसकी निंदा की थी। कुछ उलेमाओं एवं जमात के विचारों में मतभेद उजागर हुआ। भारत के कई सूफी संगठनो ने मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा पर काम करने के कारण भी जमात की कई बार आलोचना की है।
आठ दशक की यात्रा और “इकामत ए दीन” उद्देश्य की पूर्ति में जमात द्वारा कई कदम उठाए है और इस दिशा में गंभीर प्रयास भी किए है। इस दौरान जमात द्वारा अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त करना, मुस्लिम उम्मत में अपना प्रभाव स्थापित करना, अपने विचारों को विभिन्न वर्गों में फैलाने हेतु संगठन निर्मित किए गए, राजनीतिक मुद्दों पर समर्थन, विरोध और प्रदर्शनों के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति प्रकट की, CAA के विरोध मे हुए प्रदर्शनों में अपनी प्रभावी भूमिका निर्वहन की।
परंतु इन प्रयासों के बावजूद जमात अपनी मंजिल से कौसो दूर दिखाई देता है, फिर भी उद्देश्य को प्राप्त करने की जमात की यात्रा आज भी जारी है। इस साल 26 अगस्त 2026 में जमात की यात्रा में एक वर्ष और बढ़ जायेगा। ऐसे “इकामत ए दीन” का विचार संवैधानिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था और भारत की एकता अखंडता को किस प्रकार से प्रभावित कर रहा है, इस बारे में भी पर्याप्त विमर्श होना आशान्वित है।
लेख
अमित गजकेश्वर