दक्षिण कोरिया के सियोंगनाम में 24 सितंबर को ‘शी जिनपिंग’ नामक रेस्टोरेंट में चार चीनी नागरिकों ने तोड़फोड़ की। पुलिस जाँच जारी है, जबकि नाम पर विवाद के बीच मालिक ने उसका नाम बदल दिया।
सियोंगनाम के बुंदांग जिले में हुई इस घटना ने चीन के राष्ट्रपति के नाम से जुड़े विवाद को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। पुलिस के अनुसार, चार चीनी पुरुषों पर बंद रेस्टोरेंट में घुसकर नुकसान पहुँचाने का आरोप है। संदिग्ध घटना वाले दिन ही चीन लौट गए। दक्षिण कोरियाई अधिकारियों ने उनकी पहचान करके गिरफ्तारी वारंट के लिए आवेदन किया है।
बंद रेस्टोरेंट में घुसकर तोड़फोड़
घटना चुसोक अवकाश के पहले दिन, सुबह लगभग 2:40 बजे हुई। आरोप है कि संदिग्धों ने रेस्टोरेंट के भीतर पेंट और लैकर छिड़का, कुर्सियों तथा भुगतान मशीन को नुकसान पहुँचाया। बाहर लगे ‘शी जिनपिंग’ नाम वाले बोर्ड को भी पेंट से ढक दिया गया। खाद्य सामग्री पर कीटनाशक जैसा पदार्थ छिड़कने का आरोप घटना को और गंभीर बनाता है। हालाँकि, उस पदार्थ की पहचान को लेकर फोरेंसिक जाँच लंबित थी।
पुलिस के मुताबिक, संदिग्धों की उम्र 20 से 40 वर्ष के बीच है। घटना के बाद वे सियोल स्थित अपने ठहरने की जगह पहुँचे और फिर इंचियोन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से चीन चले गए। अधिकारी चीनी पक्ष के साथ सहयोग करके उन्हें जाँच के दायरे में लाने की कोशिश कर रहे हैं। वारंट जारी होने पर इंटरपोल रेड नोटिस की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
इस मामले में तथ्य यह है कि हमलावरों का वास्तविक मकसद अभी स्थापित नहीं हुआ है।
रेस्टोरेंट मालिक का संदेह इसके विपरीत है। उनका कहना है कि चीन के सर्वोच्च नेता का नाम व्यावसायिक प्रतिष्ठान के लिए इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताई जा रही थी।
मालिक ने आठ वर्षों तक इसी नाम से कारोबार किया था। लेकिन आगे नुकसान होने की आशंका के कारण नाम बदल दिया। रेस्टोरेंट 29 सितंबर को फिर वापस खुला।
ह्यूमन राइट्स वॉच की विश्व रिपोर्ट 2026 के अनुसार, चीनी अधिकारी अभिव्यक्ति, संगठन बनाने, सभा करने और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों को व्यवस्थित रूप से सीमित करते हैं तथा सरकारी आलोचकों का उत्पीड़न करते हैं। संगठन ने तिब्बतियों और उइगरों पर कठोर आत्मसातीकरण नीतियों और हांगकांग में दमनकारी राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की भी आलोचना की है। ये निष्कर्ष चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की अधिकार-केंद्रित शासन शैली पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं।
सूचना पर नियंत्रण भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। ह्यूमन राइट्स वॉच की 2025 की रिपोर्ट बताती है कि चीनी सरकार प्रमुख सूचना माध्यमों को नियंत्रित करती है। ‘ग्रेट फायरवॉल’ इंटरनेट पर बाहर की अनेक सूचनाओं तक पहुँच रोकता है, जबकि शिक्षा व्यवस्था पर वैचारिक नियंत्रण लगाया जाता है। जब नागरिकों को स्वतंत्र जानकारी और खुली आलोचना के अवसर सीमित मिलते हैं, तब शासन की सार्वजनिक छवि वास्तविक जवाबदेही का विकल्प बन सकती है।
नाम की संवेदनशीलता और राजनीतिक असहिष्णुता
बुंदांग की घटना पर हांकुक यूनिवर्सिटी के राजनीतिक विज्ञान विशेषज्ञ ली जे-मूक ने कहा कि चीन में सर्वोच्च नेता का नाम रेस्तराँ के लिए इस्तेमाल करना अपमान समझा जा सकता है। यह विशेषज्ञ की व्याख्या है, संदिग्धों के मकसद की पुलिस पुष्टि नहीं। फिर भी इससे नेता के नाम और प्रतिष्ठा के आसपास बनी संवेदनशीलता पर महत्वपूर्ण सवाल उठता है।
चीन के शासन ने अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध, निगरानी और आलोचकों के उत्पीड़न के जरिए नागरिकों के लिए अपनी नाराजगी खुलकर व्यक्त करने की जगह सीमित कर दी है। जब लोगों की आवाज दबाई जाती है और असहमति जताने पर प्रताड़ना का डर रहता है, तो भीतर आक्रोश और बेबसी बढ़ सकती है। ऐसे में सवाल चीनी शासन से भी है: उसने अपने नागरिकों को कैसी परिस्थितियों में पहुँचा दिया है, जहाँ वे अपनी बात स्वतंत्र रूप से नहीं कह सकते?
हालाँकि, इस रेस्तराँ पर हमले को उसी दमन की प्रतिक्रिया या हमलावरों की मजबूरी कहना अभी प्रमाणित नहीं है। उनका मकसद जाँच से स्पष्ट होगा।
लेख
मोक्षी जैन
उप-संपादक