पश्चिम बंगाल की राजनीति में 27 जुलाई 2000 का दिन कभी नहीं भुलाया जा सकता। उस दिन बीरभूम जिले के नानूर ब्लॉक के सुचपुर गांव में दिनदहाड़े 11 निर्दोष मजदूरों की निर्मम हत्या कर दी गई।
यह हत्या किसी हादसे का नतीजा नहीं थी, बल्कि यह उस वक्त सत्ता में रही सीपीएम की हिंसा पर आधारित राजनीति की भयानक तस्वीर थी।
ये मजदूर गरीब थे, भूमिहीन थे, लेकिन हिम्मती थे। उन्होंने सीपीएम की जबरन जमीन कब्जाने की कोशिश का विरोध किया।
इसी ‘गुनाह’ की सजा उन्हें मौत देकर दी गई। ये सभी मजदूर तृणमूल कांग्रेस के समर्थक थे और गांव की जमीन को बचाने के लिए इकट्ठा हुए थे।
लेकिन CPI(M) के हथियारबंद कार्यकर्ताओं ने उन पर हमला कर दिया। धारदार हथियारों से उन्हें बेरहमी से काट डाला गया।
यह घटना कोई एक दिन की बात नहीं थी। बंगाल में उस समय तक CPI(M) की सत्ता 23 सालों से मजबूत थी।
मुख्यमंत्री ज्योति बसु के राज में विरोधियों को दबाने का तरीका हिंसा और डर बन चुका था।
'हरमद वाहिनी' जैसे शब्द आम हो चुके थे, जो उन हथियारबंद गुंडों के लिए इस्तेमाल होता था जो CPI(M) के इशारे पर काम करते थे।
नानूर की घटना इस बात का सबूत बन गई कि कैसे सत्ता में बने रहने के लिए राजनीतिक दल आम लोगों की जान भी ले सकते हैं।
मारे गए मजदूर सिर्फ इसलिए निशाना बने क्योंकि वे विरोध करने की हिम्मत रखते थे।
CPI(M) के लिए वे गरीब होना ही काफी था ताकि उन्हें कुचला जा सके।
सरकार की ओर से शुरुआत में इस हत्याकांड को दबाने की कोशिश हुई। पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे। न्याय की राह लंबी और तकलीफदेह रही।
लेकिन एक दशक बाद, 2010 में अदालत ने इस मामले में 44 CPI(M) कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा सुनाई। इनमें पार्टी के चार सीनियर नेता भी शामिल थे।
यह फैसला एक अहम मोड़ था, जिसने यह दिखाया कि चाहे देर से सही, न्याय मिल सकता है।
इस नरसंहार ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में मौजूद जाति, धर्म और गरीबी के शोषण की सच्चाई को उजागर किया।
मारे गए मजदूर सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंदी नहीं थे, वे समाज के सबसे कमजोर तबके से आते थे।
नानूर में जो हुआ, वह सिर्फ CPI(M) की बर्बरता नहीं थी, वह बंगाल की उस राजनीति की भी पहचान थी, जहां सत्ता के लिए इंसानियत को कुचलना आम हो गया था।
ज्योति बसु जैसे बड़े नेता की छवि पर भी इस घटना ने गहरा दाग छोड़ा।
आलोचकों का कहना है कि उनके लंबे कार्यकाल में CPI(M) एक तानाशाही संगठन बन गया था, जहां विरोध को कुचलना एक रणनीति बन चुकी थी।
नानूर का नरसंहार आज भी एक चेतावनी है कि जब राजनीति में जवाबदेही नहीं होती, जब कानून का डर खत्म हो जाता है, तब सत्ताधारी दल किसी भी हद तक जा सकते हैं।
यह घटना हमें यह भी याद दिलाती है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब जनता की जान की कीमत होगी और न्याय समय पर मिलेगा।
लेख
शोमेन चंद्र
तिल्दा, छत्तीसगढ़