
महात्मा गांधी का धर्मांतरण पर एक चर्चित और तीखा कथन है, जिसमें उन्होंने ईसाई मिशनरियों के तरीकों पर सीधा सवाल उठाया था। गांधी ने कहा था कि यदि ईसाई मिशनरियों को यह विश्वास है कि केवल ईसाई धर्म अपनाने से ही आध्यात्मिक उद्धार संभव है, तो वे इस प्रक्रिया की शुरुआत उनसे या उनके निजी सचिव महादेव देसाई से क्यों नहीं करते।
उन्होंने यह भी पूछा था कि फिर गरीब, अशिक्षित, भोले-भाले अनुसूचित जातियों और वनवासियों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है, जो न तो विभिन्न धर्मों के बीच का अंतर समझ सकते हैं और न ही जटिल धार्मिक उपदेशों को। गांधी के शब्दों में, ऐसे धर्मांतरण आस्था से नहीं, बल्कि पेट की मजबूरी से होते हैं।
आज जब देश के विभिन्न हिस्सों में कन्वर्ज़न को लेकर बहस तेज है और ईसाई मिशनरियों द्वारा किए जा रहे षड्यंत्रकारी प्रयास लगातार सामने आ रहे हैं, विशेषकर जनजाति बहुल क्षेत्रों में, तब गांधी के विचारों को समझना और उन पर चर्चा करना और भी प्रासंगिक हो जाता है। अक्सर जिन बुद्धिजीवियों द्वारा गांधी का नाम लिया जाता है, उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि गांधी स्वयं कन्वर्ज़न के स्पष्ट विरोधी थे।

1916 में क्रिश्चियन एसोसिएशन ऑफ मद्रास को संबोधित करते हुए गांधी ने साफ कहा था कि “धर्मांतरण राष्ट्रांतरण है।” जीवन भर उन्होंने इस विचार से समझौता नहीं किया। विदेशों में लंबे समय तक रहने के बावजूद उन्होंने कभी धर्म परिवर्तन नहीं किया।
22 मार्च 1935 को प्रकाशित एक लेख में उन्होंने धर्मांतरण के प्रश्न पर विस्तार से अपने विचार रखे और कहा कि धर्म व्यक्ति का निजी विषय है, जिसे किसी पर थोपा नहीं जाना चाहिए। उनके अनुसार, एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति का धर्म बदलने का प्रयास न केवल अनुचित है, बल्कि यह विभिन्न धर्मों के प्रति असम्मान भी दर्शाता है।

गांधी ने लिखा था कि धर्मांतरण विश्व शांति की स्थापना में सबसे बड़े अवरोधों में से एक है। उनका प्रश्न सीधा था कि एक ईसाई किसी हिंदू को ईसाई क्यों बनाना चाहता है, जबकि वह हिंदू एक अच्छा इंसान भी है और अपने धर्म का पालन भी करता है। उनके अनुसार, व्यक्ति और उसके ईश्वर के बीच का संबंध पूर्णतः व्यक्तिगत है और उसमें बाहरी हस्तक्षेप का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
इसके विपरीत, आज ईसाई मिशनरियों पर देश के विभिन्न राज्यों में इलाज, शिक्षा, कानूनी सहायता या आर्थिक प्रलोभन के माध्यम से कन्वर्ज़न कराने के आरोप लगते रहे हैं। अधिकांश मामले जनजातीय बहुल क्षेत्रों से जुड़े बताए जाते हैं, जहां गरीबी और असुरक्षा का लाभ उठाने के आरोप बार-बार सामने आते हैं।

कन्वर्ज़न का मुद्दा भारत में लंबे समय से विवादास्पद रहा है। धर्म को मानना या न मानना व्यक्ति की स्वतंत्रता का विषय है, लेकिन जब धर्म परिवर्तन दबाव, लालच या भय के माध्यम से किया जाता है, तो वह सामाजिक और नैतिक प्रश्न बन जाता है।
इसी पृष्ठभूमि में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के उत्तरी सेंटिनल द्वीप की घटना भी अक्सर उद्धृत की जाती है, जहां प्रतिबंध के बावजूद एक ईसाई धर्म प्रचारक वहां पहुंचा और स्थानीय सेंटिनेलिस जनजाति द्वारा मारा गया। यह घटना इस तथ्य की ओर इशारा करती है कि कुछ मिशनरी समूह उन क्षेत्रों तक भी पहुंचने का प्रयास करते हैं, जहां सामान्य प्रशासनिक पहुंच भी नहीं है।

विभिन्न एजेंसियों और मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा जाता रहा है कि विदेशों से आने वाले फंड का एक बड़ा हिस्सा धर्मांतरण गतिविधियों से जुड़ा है। इंटेलिजेंस ब्यूरो से जुड़ी रिपोर्टों से भी यह पता चलता है कि पूर्व की सरकारों ने इस विषय को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया और अनेक गैर-सरकारी संगठनों को देश-विदेश से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त होता रहा।
इन परिस्थितियों में गांधी के शब्दों की प्रासंगिकता एक बार फिर सामने आती है। उनका यह कथन कि “धर्मांतरण ही राष्ट्रांतरण है,” आज भी नीति, समाज और कानून से जुड़े विमर्श में एक चुनौतीपूर्ण प्रश्न के रूप में खड़ा है।
उनका मानना था कि किसी भी समाज की एकता और शांति तभी संभव है, जब आस्था को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में सम्मान दिया जाए, न कि उसे किसी रणनीति या उद्देश्य का साधन बनाया जाए।
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