गांधी के अंतिम संस्कार पर पश्चिमी मोह : नेहरू की सोच, संघ की भूमिका और इतिहास का दबाया गया सच

30 Jan 2026 23:17:42

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30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत पर गहरे आघात की घटना थी। देश शोक में डूबा था। दिल्ली की सड़कों से लेकर गांवों की चौपाल तक एक ही प्रश्न था कि ऐसे कैसे हो गया? इसी ऐतिहासिक क्षण में गांधी के अंतिम संस्कार को लेकर जो निर्णय प्रक्रिया चली, वह आज भी भारत की वैचारिक दिशा, राजनीतिक प्राथमिकताओं और सांस्कृतिक आत्मबोध पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।


हाल के वर्षों में सामने आए दस्तावेजों और शोध आधारित पुस्तकों से यह तथ्य उभरकर आता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गांधी के अंतिम संस्कार के लिए एक ईसाई शैली के प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का सुझाव दिया था, जबकि अंततः जो अंतिम संस्कार हुआ वह पूर्णतः वैदिक और हिंदू परंपरा के अनुरूप था। यह परिवर्तन संयोग नहीं था, बल्कि एक वैचारिक संघर्ष का परिणाम था।


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यह तथ्य विस्तार से दर्ज है पुस्तक Vajpayee and the Ascent of the Hindu Right में, जिसके लेखक अभिषेक चौधरी हैं। पुस्तक के अनुसार गांधी के अंतिम संस्कार की व्यवस्थाओं में निर्णायक भूमिका निभाने वाले मौली चंद्र शर्मा थे, जिन्हें एम सी शर्मा के नाम से जाना जाता है। उस समय वे कांग्रेस से जुड़े एक अपेक्षाकृत कम चर्चित नेता थे, लेकिन संगठनात्मक क्षमता और सांस्कृतिक समझ में वे कई वरिष्ठ नेताओं से आगे थे।


यही एम सी शर्मा आगे चलकर भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने। यह वही जनसंघ था, जिसने आगे चलकर भारतीय राजनीति में राष्ट्रवादी वैचारिकी को संगठित स्वर दिया और जो आज भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक नींव माना जाता है।


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घटना का समय और संदर्भ महत्वपूर्ण है। गांधी जी की हत्या के बाद देश में सांप्रदायिक तनाव था। सरकार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी था। नेहरू उस दौर में पश्चिमी लोकतंत्रों की दृष्टि में भारत की छवि को लेकर अत्यधिक संवेदनशील थे। उनका जीवन और शिक्षा ब्रिटेन में हुई थी और स्वतंत्र भारत की शासन प्रणाली को वे यूरोपीय आधुनिकता के चश्मे से देखने के अभ्यस्त थे।


इसी पृष्ठभूमि में पुस्तक के अनुसार नेहरू ने यह सुझाव दिया कि गांधी जी का अंतिम संस्कार किसी धार्मिक अनुष्ठान से मुक्त, सरल और तथाकथित सार्वभौमिक शैली में हो। पुस्तक इसे स्पष्ट रूप से Christian-style minimalist funeral कहती है।


यहां प्रश्न उठता है कि जिस व्यक्ति ने अपने पूरे जीवन में भारतीय परंपरा, गीता, रामनाम और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों को सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया, उसके अंतिम संस्कार में भारतीय विधि से परहेज क्यों।


“यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि उस पश्चिमी यूफोरिया का प्रतीक था, जिसमें नेहरू भारतीय परंपराओं को आधुनिकता के मार्ग में बाधा मानने लगे थे। स्वतंत्रता के तुरंत बाद भी उनके लिए पश्चिम की स्वीकृति और प्रशंसा भारतीय आत्मा से अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होती है।”


इसके विपरीत एम सी शर्मा ने न केवल वैदिक पद्धति से अंतिम संस्कार की व्यवस्था की, बल्कि हर उस तत्व को सुनिश्चित किया जो हिंदू समाज में किसी महापुरुष के अंतिम संस्कार को सार्थक बनाता है। पंडित का चयन और वैदिक मंत्रोच्चार यह सभी उस संस्कार का हिस्सा बने। यह व्यवस्था किसी उग्र धार्मिक आग्रह का परिणाम नहीं थी, बल्कि उस सांस्कृतिक यथार्थ की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी, जिसमें गांधी का जीवन रचा बसा था।


पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि एम सी शर्मा को कांग्रेस के भीतर उन लोगों का समर्थन मिला जो मानते थे कि गांधी का अंतिम संस्कार यदि भारतीय परंपरा से कटकर किया गया तो यह जनता के साथ एक मानसिक विश्वासघात होगा। यह अपने आप में उस दौर की राजनीतिक वास्तविकता को दर्शाता है, जहां वैचारिक मतभेदों के बावजूद राष्ट्र और समाज की भावनाओं को प्राथमिकता दी गई।


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पुस्तक आगे बताती है कि गांधी हत्या के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा और उसे सार्वजनिक रूप से कटघरे में खड़ा किया गया। लेकिन इसी दौरान संघ ने अपनी एक संगठित प्रयास किया। एम सी शर्मा की अगुवाई में नागरिक स्वतंत्रता परिषद का गठन हुआ, जिसे जनाधिकार समिति के नाम से भी जाना गया। संघ के स्वयंसेवकों ने इस मंच के माध्यम से देश के प्रमुख नेताओं से संवाद किया और संघ की भूमिका को स्पष्ट किया। यह प्रयास किसी छिपे हुए षड्यंत्र का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का हिस्सा था।


इसी संदर्भ में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की भूमिका भी उल्लेखनीय है। पुस्तक के अनुसार शर्मा और उनके साथियों ने पटेल से मुलाकात की। उस समय कश्मीर और हैदराबाद की स्थिति गंभीर थी। देश के भीतर सुरक्षा चुनौतियां थीं। पटेल ने स्पष्ट कहा कि सरकार हैदराबाद के प्रश्न को स्वयं संभालेगी, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने अंग्रेजी में यह भी कहा कि अपने लड़कों को जरूरत के समय तैयार रखें। यह कथन इस बात का संकेत है कि सार्वजनिक बयानबाजी से अलग, सरकार संघ की संगठनात्मक क्षमता और अनुशासन को नकार नहीं सकती थी।


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गांधी के अंतिम संस्कार की वास्तविक व्यवस्था और उसमें संघ से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका यह दिखाती है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की रक्षा उस समय भी वही लोग कर रहे थे, जिन्हें बाद में सांप्रदायिक कहकर हाशिये पर धकेल दिया गया।


एक प्रधानमंत्री का यह दायित्व होता है कि वह राष्ट्र की आत्मा को समझे। गांधी का जीवन भारतीयता का प्रतीक था। ऐसे में उनके अंतिम संस्कार को पश्चिमी नजरिए से ढालने का प्रयास उस मानसिक गुलामी को दर्शाता है, जिससे स्वतंत्र भारत को बाहर निकलना था। यह वही मानसिकता थी जिसने आगे चलकर शिक्षा नीति से लेकर सांस्कृतिक विमर्श तक भारतीय परंपराओं को हाशिये पर रखा।


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इसके विपरीत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ से जुड़े लोगों ने उस समय भी और बाद में भी भारतीय संस्कृति को सार्वजनिक जीवन में सम्मान दिलाने का प्रयास किया। एम सी शर्मा का उदाहरण बताता है कि यह केवल विचारधारा नहीं, बल्कि व्यवहार में किया गया कार्य था। गांधी जी के अंतिम संस्कार से लेकर राष्ट्र की सुरक्षा तक, इन संगठनों ने बार बार यह सिद्ध किया कि वे भारत की जड़ों से जुड़े हैं।


आज जब स्वतंत्रता के सात दशक बाद भारत अपने इतिहास को नए सिरे से देख रहा है, तो यह आवश्यक है कि ऐसे प्रसंगों को भी सामने रखा जाए। गांधी जी के अंतिम संस्कार का यह अध्याय केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि यह समझने की कुंजी है कि किस प्रकार पश्चिमी मोह और भारतीय आत्मबोध के बीच संघर्ष चलता रहा। यह भी स्पष्ट होता है कि जिन शक्तियों को लंबे समय तक बदनाम किया गया, वे कई निर्णायक क्षणों में राष्ट्र के साथ खड़ी रहीं।

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