एक किताब, दो मोर्चे: जंगल और शहर के बीच माओवादी षड्यंत्र

भारत में माओवादी हिंसा केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। माओवादियों का अपना दस्तावेज Urban Perspective बताता है कि कैसे शहरों, विश्वविद्यालयों और लोकतांत्रिक मंचों का उपयोग वैचारिक युद्ध के लिए किया जाता है।

The Narrative World    10-Feb-2026   
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भारत में माओवादी हिंसा को लंबे समय तक जंगलों और दूरदराज़ इलाकों तक सीमित मानकर देखा गया। आम धारणा यही रही कि यह समस्या कुछ जनजातीय जिलों में चल रहे सशस्त्र माओवाद तक ही सिमटी है। लेकिन पिछले दो दशकों में सामने आए माओवादी दस्तावेज और सुरक्षा एजेंसियों के आकलन इस सोच को चुनौती देते हैं। ये संकेत देते हैं कि माओवादी संगठन की एक समानांतर और उतनी ही अहम कड़ी शहरों के भीतर भी मौजूद है। इस शहरी रणनीति का सबसे ठोस लिखित प्रमाण माओवादियों का ही दस्तावेज़ Urban Perspective है, जिसे CPI (Maoist) की शहरी नीति का मूल आधार माना जाता है।
 
Urban Perspective किसी अकादमिक विमर्श या वैचारिक लेख का रूप नहीं है। यह एक स्पष्ट रणनीतिक दस्तावेज है, जो बताता है कि शहरी समाज, संस्थानों और लोकतांत्रिक मंचों का इस्तेमाल किस तरह माओवादी आतंकी संगठन के दीर्घकालिक उद्देश्यों के लिए किया जाना है। इसकी भाषा और निर्देश संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते। दस्तावेज में साफ कहा गया है, “Party organisation should be secret and underground, while mass organizations should be open and legal.” इस एक पंक्ति में शहरी रणनीति का मूल सूत्र निहित है। असली संगठन ढांचा गुप्त रहेगा, जबकि सामने दिखने वाले संगठन खुले, वैध और लोकतांत्रिक नजर आएंगे।
 
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यह रणनीति क्यों जरूरी समझी गई, इसका जवाब दस्तावेज के अन्य हिस्सों में मिलता है। Urban Perspective मानता है कि शहरी क्षेत्रों में सशस्त्र माओवाद की परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, लेकिन विचारधारात्मक और नैरेटिव आधारित संघर्ष के लिए शहर सबसे प्रभावी मंच हैं। दस्तावेज में लिखा है, “Urban movement has to adopt a defensive posture in the present situation.” यह कथन पहली नजर में संयम और सतर्कता का संकेत देता है, लेकिन इसका आशय कहीं अधिक गहरा है।
 
इसका मतलब है कि शहरी माओवादी अपनी असली पहचान उजागर नहीं करेंगे। वे स्वयं को पीड़ित या दबाव में दिखाएंगे, जबकि असल टकराव जनता की सोच और संस्थागत विश्वास के स्तर पर होगा।
 
भारत के जनजातीय क्षेत्रों, विशेषकर बस्तर जैसे क्षेत्रों में माओवादी हिंसा की बड़ी घटनाओं के बाद शहरी प्रतिक्रिया का एक स्पष्ट पैटर्न बार बार देखा गया है। जंगलों में आईईडी विस्फोट होते हैं, सुरक्षा बलों के जवान बलिदान होते हैं, और गांव भय तथा दबाव के माहौल में जीते हैं। उसी समय शहरों में सेमिनार, प्रेस कॉन्फ्रेंस और तथाकथित फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्टें सामने आती हैं। इन बयानों और रिपोर्टों की भाषा अक्सर एक जैसी होती है, जहां राज्य को आक्रामक और सुरक्षा बलों को दोषी ठहराया जाता है, जबकि माओवादी हिंसा को प्रतिक्रिया या प्रतिरोध के रूप में पेश किया जाता है। Urban Perspective इसी प्रक्रिया को वैचारिक आधार प्रदान करता है।
 
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दस्तावेज यह भी स्पष्ट करता है कि शहरी मंचों पर किन सामाजिक क्षेत्रों में काम केंद्रित किया जाना है। इसमें छात्र, युवा, महिला, मजदूर और सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से जनाधार विस्तार पर जोर दिया गया है। एक स्थान पर कहा गया है, “We must utilize all legal democratic platforms available to mobilize the masses and expand our influence.” इसका सीधा अर्थ है कि लोकतांत्रिक और कानूनी ढांचे का इस्तेमाल उसी ढांचे को भीतर से कमजोर करने के लिए किया जाए। यह कोई आरोप या अनुमान नहीं, बल्कि माओवादियों की अपनी घोषित रणनीति है।
 
इस संदर्भ में विश्वविद्यालय परिसरों की भूमिका पर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। जब किसी माओवादी हमले के बाद जेएनयू जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अचानक सभाएं, पोस्टर और बयान दिखाई देते हैं, तो यह केवल संयोग नहीं लगता। Urban Perspective स्वयं स्वीकार करता है कि शहरी भूमिका एक लंबी प्रक्रिया है। दस्तावेज में लिखा है कि, “Urban work is a long-term process. We sow today and reap tomorrow.” यानी विचार आज बोए जाते हैं और उनका राजनीतिक तथा सामाजिक लाभ भविष्य में लिया जाता है।
 
 
सरकारी रिपोर्टे और सुरक्षा एजेंसियों के आकलन भी इसी दिशा की ओर संकेत करते हैं। गृह मंत्रालय और नक्सलवाद से जुड़े विभागों ने बार-बार चेतावनी दी है कि शहरी फ्रंट संगठनों के माध्यम से माओवादी विचारधारा को वैधता देने का प्रयास किया जाता है। इन आकलनों में यह भी कहा गया है कि मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता की भाषा का इस्तेमाल कर हिंसक विचारधारा को ढकने की कोशिश होती है। Urban Perspective इस प्रक्रिया को वैचारिक औजार देता है और इसे संगठित ढंग से लागू करने की बात करता है।
 
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यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह दस्तावेज शहरी और ग्रामीण मोर्चों को अलग-अलग नहीं देखता। इसमें साफ कहा गया है कि शहरी काम का उद्देश्य ग्रामीण सशस्त्र माओवाद को समर्थन देना है। एक स्थान पर उल्लेख है, “Urban movement should serve the overall strategy of protracted people’s war.” यानी शहरों में तैयार किया गया नैरेटिव अंततः जंगलों में चल रही हिंसा को नैतिक और वैचारिक समर्थन देता है। यही कारण है कि जब सुरक्षा बल माओवादी हिंसा के खिलाफ कार्रवाई करते हैं, तो शहरी विमर्श में उसे दमन या अत्याचार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
 
पत्रकारिता के दृष्टिकोण से सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि वास्तविक पीड़ितों की आवाज कहां खो जाती है? बस्तर के गांवों में मारे गए ग्रामीण, स्कूल से वंचित बच्चे और जबरन भर्ती किए गए किशोर, शहरी बहस का हिस्सा शायद ही बनते हैं। Urban Perspective इस असमानता को रणनीतिक रूप से स्वीकार करता है। दस्तावेज में यह संकेत मिलता है कि शहरी जनमत निर्माण के लिए प्रतीकों और भावनात्मक मुद्दों का चयन किया जाना चाहिए, न कि पूरे यथार्थ का।
 
 
देखिए, लोकतंत्र में सवाल पूछना और सरकार की आलोचना करना नागरिक अधिकार है। लेकिन जब लिखित दस्तावेज यह बताते हों कि कानूनी मंचों का इस्तेमाल गुप्त संगठनात्मक लक्ष्यों के लिए किया जाना है, तब सतर्कता आवश्यक हो जाती है।
 
अंततः यह स्पष्ट है कि Urban Perspective केवल एक सामान्य किताब नहीं है। यह एक लिखित स्वीकारोक्ति है कि शहरी भारत को किस तरह वैचारिक युद्ध का मैदान बनाया गया है। जंगल में चलने वाली बंदूक और शहर में गढ़ा जाने वाला नैरेटिव एक ही रणनीति के दो पक्ष हैं। सवाल अब यह नहीं है कि अर्बन नक्सलिज्म मौजूद है या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम उन दस्तावेज़ों को पढ़ने और समझने के लिए तैयार हैं, जिन्हें खुद माओवादी अपनी योजना के रूप में सामने रखते हैं।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार