वर्षों तक वामपंथी खेमे ने दफली बजाने वाले तथाकथित छात्र नेता की छवि को रोमांटिक रंग दिया। उन्होंने उसे संघर्ष का प्रतीक बताया और युवाओं के सामने आदर्श के रूप में पेश किया। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे कड़वी सच्चाई छिपी रही। कैंपस की शांति को तोड़ने और ब्राह्मण समाज के खिलाफ जहर घोलने का अभियान लगातार आकार लेता रहा। इस पूरी सोच के केंद्र में जेएनयू से निकले आंदोलनजीवी से नेता बने कन्हैया कुमार खड़े नजर आते हैं।
जेएनयू में उनके दौर ने एक ऐसी टोली को जन्म दिया, जिसे लोग दफली गैंग के नाम से जानते हैं। यह समूह खुले तौर पर सवर्ण समुदाय को निशाना बनाता है। ये लोग सनातन परंपरा की एकता को तोड़ने की कोशिश करते हैं और समाज को जाति के आधार पर बांटने की राजनीति करते हैं।
दफली केवल एक वाद्य यंत्र नहीं रही। इसने विचारधारा का औजार बनकर काम किया। कन्हैया कुमार और उनके साथियों ने इसे नारों और भाषणों के जरिए एक मंच बनाया। उन्होंने देश विरोधी सोच को अभिव्यक्ति की आजादी का नाम दिया। उसी माहौल में "भारत तेरे टुकड़े होंगे" जैसे नारे गूंजे और कुछ समूहों ने उन्हें वैचारिक आंदोलन का हिस्सा बताया।
अब वही तंत्र नया मोर्चा खोलता दिखता है। इस बार निशाना ब्राह्मण समाज पर साधा गया। जेएनयू के कुछ वामपंथी छात्र संगठन सामान्य वर्ग के छात्रों के खिलाफ आक्रामक नारे लगाते हैं। वे परिसर को वैचारिक टकराव का मैदान बनाते हैं। इस माहौल में सवर्ण छात्रों को असुरक्षा का अनुभव होता है और पढ़ाई का वातावरण प्रभावित होता है।
आंदोलन की आड़ में पनपी यह सोच कई बार दीवारों पर लिखे नारों में भी दिखती है। परिसर की दीवारों पर "ब्राह्मण कैंपस छोड़ो" जैसे संदेश लिखे गए। कुछ जगहों पर हिंसा की धमकी तक दी गई। ऐसे शब्द केवल असहमति नहीं दिखाते, बल्कि वे समाज के एक वर्ग को डराने की कोशिश करते हैं।
जब दफली गैंग नारे लगाता है, तो वे सामाजिक बराबरी की बात नहीं करते। वे सवर्ण समाज को कटघरे में खड़ा करते हैं और उसे हर समस्या का कारण बताने की कोशिश करते हैं। वे सामाजिक न्याय की आड़ लेते हैं, लेकिन उनके शब्दों में विभाजन की झलक साफ दिखती है। इस रणनीति से वे अपनी राजनीतिक असफलताओं से ध्यान हटाना चाहते हैं।
कांग्रेस ने कन्हैया कुमार को अपने साथ जोड़कर साफ संदेश दिया। पार्टी ने एक विवादित छात्र नेता को मुख्यधारा की राजनीति में जगह दी। इस फैसले ने उस कैंपस संस्कृति को मान्यता दी, जिसने वर्षों तक वैचारिक टकराव को बढ़ावा दिया।
आज कन्हैया कुमार सधे हुए राजनेता की छवि पेश करते हैं, लेकिन उनके समर्थक जमीनी स्तर पर वही पुरानी लाइन दोहराते हैं। वे राष्ट्रवादी पत्रकारों से भिड़ते हैं, सवर्ण छात्रों को धमकाते हैं और धार्मिक आस्थाओं पर कटाक्ष करते हैं। इन घटनाओं पर कांग्रेस की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। यह चुप्पी उन तत्वों को संरक्षण देती दिखती है, जो समाज में दरार पैदा करते हैं।
देश को अब इस दफली गैंग को मासूम छात्र समूह समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह एक संगठित राजनीतिक सोच का हिस्सा है। यदि शैक्षणिक संस्थानों में जाति आधारित घृणा को खुली छूट मिलेगी, तो समाज की एकता पर गहरा असर पड़ेगा।
लेख
शोमेन चंद्र