संसद सत्र के दौरान संसद भवन में राहुल गांधी की किसान संगठनों के साथ हुई बैठक केवल एक औपचारिक संवाद नहीं थी, यह एक सुविचारित राजनीतिक कदम था, जिसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से भारत–अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर व्यापक असंतोष खड़ा करना है। बैठक के बाद जिस तरह से इस मुद्दे को संभावित राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप देने की घोषणा की गई, उसने यह संकेत दे दिया कि विपक्ष इसे केवल नीति बहस तक सीमित नहीं रखना चाहता।
राहुल गांधी ने किसानों की आय, आजीविका और भविष्य पर खतरे की बात करते हुए समझौते को सीधे तौर पर किसान विरोधी करार दिया। यह बयानबाज़ी उस समय आई है जब समझौते की विस्तृत शर्तें सार्वजनिक पटल में पूरी तरह सामने नहीं आई हैं। बिना पूर्ण दस्तावेज और ठोस आंकड़ों के किसी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते को ‘किसान विरोधी’ बताना राजनीतिक आक्रामकता तो हो सकती है, पर जिम्मेदार विपक्षी नेतृत्व का उदाहरण नहीं है। यह रेखांकित करना जरूरी है कि सरकार ने स्पष्ट कहा है कि किसानों के हितों से समझौता नहीं किया जाएगा और पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। ऐसे में भय की राजनीति खड़ी करना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है।
वहीं राहुल गांधी के साथ बैठक में शामिल संगठनों की पृष्ठभूमि भी इस रणनीति को समझने में मदद करती है। इनमें से कुछ संगठन सीधे तौर पर कांग्रेस से जुड़े किसान मंचों का हिस्सा हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस के किसान प्रकोष्ठ लंबे समय से कृषि मुद्दों को राजनीतिक लामबंदी के साधन के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं।
इसके साथ ही कुछ ऐसे "आंदोलनजीवी" गुट भी मौजूद थे, जिनका इतिहास टकराव और सड़क पर दबाव बनाने की राजनीति से जुड़ा रहा है। इन दोनों धाराओं का एक मंच पर आना संयोग नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रयोग का संकेत है।
राहुल गांधी का राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड भी इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। चाहे वह कृषि कानूनों का मुद्दा रहा हो, रक्षा सौदे का विषय या अन्य आर्थिक फैसले, हर बड़े नीति निर्णय को सरकार विरोधी जन-अभियान में बदलने की कोशिश कांग्रेस नेतृत्व की स्थापित शैली रही है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वर्तमान बैठक उसी क्रम की अगली कड़ी है। किसान असंतोष एक संवेदनशील विषय है और ग्रामीण भारत की भावनाओं को आंदोलित करना चुनावी राजनीति में असरदार हथियार साबित होता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह वास्तविक आर्थिक चिंता है या सुनियोजित राजनीतिक अवसरवाद?
2020–21 के किसान आंदोलन का अनुभव देश देख चुका है, जब लंबे समय तक चले विरोध ने राष्ट्रीय राजमार्गों, आपूर्ति शृंखलाओं और सामाजिक वातावरण पर असर डाला। उस दौर में भी विपक्ष ने खुलकर आंदोलन का समर्थन किया था। वर्तमान घटनाक्रम उसी मॉडल की पुनरावृत्ति की आशंका को जन्म दे रहा है। यदि बिना विस्तृत तथ्यों के व्यापक जनांदोलन की तैयारी की जाती है, तो उसका असर केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक भी होता है। निवेश, व्यापार और अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि बैठक के बाद जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया, उसमें ‘प्रतिरोध’ और ‘राष्ट्रव्यापी आंदोलन’ जैसे शब्द प्रमुख थे। एक जिम्मेदार विपक्ष से अपेक्षा होती है कि वह पहले तथ्यों की मांग करे, संसदीय बहस करे और विशेषज्ञ विमर्श को प्राथमिकता दे। सीधे आंदोलन की राह चुनना बताता है कि लक्ष्य दबाव बनाना है, समाधान खोजना नहीं। यदि समझौते में खामियां हैं, तो उन्हें बिंदुवार सार्वजनिक किया जाना चाहिए। केवल आशंका के आधार पर किसानों में असुरक्षा की भावना फैलाना दीर्घकालिक समाधान नहीं है।
यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि इस बैठक में शामिल संगठनों एवं व्यक्तियों के राजनीतिक गठजोड़ और वैचारिक समीकरण स्पष्ट दिखते हैं। कांग्रेस से जुड़े किसान संगठनों और आंदोलनजीवी गुटों का समन्वय यह संकेत देता है कि यह विरोध स्वतःस्फूर्त नहीं बल्कि योजनापूर्वक है। राहुल गांधी की भूमिका इसमें केंद्रीय है और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को इस संदर्भ से अलग नहीं देखा जा सकता।
अंततः यह प्रश्न केवल व्यापार समझौते का नहीं है, बल्कि राजनीतिक जिम्मेदारी का है। विपक्ष का काम सरकार को कठघरे में खड़ा करना है, परंतु हर नीति को भय और अविश्वास के चश्मे से देखना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। यदि राहुल गांधी वास्तव में किसानों के हितों के प्रति गंभीर हैं, तो उन्हें तथ्यों, आंकड़ों और ठोस वैकल्पिक प्रस्तावों के साथ सामने आना चाहिए। आंदोलन की घोषणा करना आसान है, लेकिन उसके सामाजिक और आर्थिक परिणामों की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीर होती है।