छत्तीसगढ़ के सुकमा और आसपास के इलाकों में 1 जनवरी से
17 फरवरी 2026 के बीच 226 नक्सलियों ने हथियार छोड़े, जिनमें 17 फरवरी को 22 नक्सलियो ने आत्मसमर्पण कर 'पूना मार्गम' पुनर्वास नीति के तहत मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया।
17 फरवरी 2026, मंगलवार के दिन सुकमा और उसके आसपास के गाँवों में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला। 22 नक्सलियों ने पुलिस और सुरक्षा बलों के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इनमें महिला कैडर, स्थानीय मिलिशिया सदस्य और संगठन से जुड़े विभिन्न स्तरों के कार्यकर्ता शामिल थे। कई वर्षों से जंगलों और दूरदराज इलाकों में सक्रिय रहे इन लोगों ने अंततः हिंसक रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन की ओर लौटने का निर्णय लिया।
सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और लगातार चल रहे अभियानों के बीच इन नक्सलियों ने अपनी स्वेक्षा से आत्मसमर्पण किया। यह प्रक्रिया सुकमा के पुलिस अधीक्षक कार्यालय में संपन्न हुई, जो राज्य सरकार के विश्वसनीयता ढांचे और पुनर्वास प्रयासों का हिस्सा है। अधिकारियों ने इसे जमीनी स्तर पर हो रहे धीरे-धीरे लेकिन स्थायी बदलाव का संकेत बताया।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी से 17 फरवरी 2026 के बीच राज्य में कुल 226 माओवादियों ने हथियार डाल दिए। इसी अवधि में 22 माओवादी मुठभेड़ों में मारे गए, जबकि 72 को गिरफ्तार किया गया। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि एक ओर सुरक्षा अभियान तेज हुए हैं, वहीं दूसरी ओर संगठन के भीतर से टूटन भी सामने आ रही है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि आत्मसमर्पण करने वाले कई लोग लंबे समय से संगठन से जुड़े थे, लेकिन अब वे मुख्यधारा में लौटकर सामान्य जीवन जीना चाहते हैं। आत्मसमर्पण की इस प्रक्रिया को केवल सुरक्षा दबाव का परिणाम नहीं माना जा सकता, बल्कि क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ रहे विकास कार्यों और सुरक्षा बलों की विस्तृत होती पहुँच ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
नए सुरक्षा शिविरों की स्थापना, अंदरूनी इलाकों तक सड़कों का निर्माण, संचार सुविधाओं का विस्तार और सरकारी योजनाओं का सीधे ग्रामीणों तक पहुँचना संगठन के प्रभाव क्षेत्र को सीमित कर रहा है।
यह आत्मसमर्पण "पूना मार्गम" पहल के अंतर्गत हुआ, जो छत्तीसगढ़ की नक्सली आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति 2025 का हिस्सा है। इस नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को तत्काल 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसके साथ ही उन्हें कौशल प्रशिक्षण, आजीविका के साधन, रोजगार मार्गदर्शन और विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाता है, ताकि वे समाज में सम्मानजनक ढंग से पुनर्स्थापित हो सकें।
अधिकारियों का मानना है कि जब जंगलों के भीतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार जैसी मूलभूत सुविधाएँ पहुँचती हैं, तो लोगों के सामने वैकल्पिक जीवन की वास्तविक तस्वीर उभरती है। ऐसे में बंदूक की जगह कलम और रोजगार को चुनने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
समग्र रूप से यह घटनाक्रम छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। लगातार सुरक्षा दबाव और प्रभावी पुनर्वास नीति के संयोजन ने जमीन पर बदलाव की प्रक्रिया को गति दी है। यदि यही रफ्तार बनी रहती है, तो आने वाले समय में हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति और विकास की संभावनाएँ और मजबूत हो सकती हैं।
रिपोर्ट
मोक्षी जैन
उपसंपादक, द नैरेटिव