पास्टर-पादरी के "एंट्री बैन" से मिशनरी नेटवर्क पर कानूनी शिकंजा?

कांकेर में ग्रामसभाओं द्वारा लगाए गए होर्डिंग्स पर उठा विवाद आखिरकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा! अदालतों ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता और ग्रामसभा के सांस्कृतिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे साधा जाएगा। क्या यह ‘एंट्री बैन’ था या कानून के दायरे में लिया गया कदम?

The Narrative World    20-Feb-2026   
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कांकेर जिले की कुछ ग्रामसभाओं द्वारा लगाए गए होर्डिंग्स पर उठा विवाद अंततः न्यायालयों तक पहुँचा और वहाँ से जो संदेश निकला, उसने स्थानीय मुद्दे को व्यापक संवैधानिक संदर्भ दे दिया। अगस्त 2025 में कांकेर जिले की आठ ग्रामसभाओं ने ऐसे बोर्ड लगाए जिनमें कहा गया था कि गांव की सीमा के भीतर बल, प्रलोभन या भ्रम के आधार पर धर्मांतरण स्वीकार्य नहीं होगा। इस कदम को ईसाई समूहों ने धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला बताया और इसे अदालत में चुनौती दी।
 
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए रिकॉर्ड, कानून और उपलब्ध वैकल्पिक प्रक्रियाओं के आधार पर यह स्पष्ट किया कि ग्रामसभा की कार्रवाई को स्वतः असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। इस निर्णय को अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय स्वायत्तता की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
 
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विवाद की पृष्ठभूमि स्थानीय शिकायतों और ग्रामसभा प्रस्तावों से जुड़ी है। होर्डिंग्स में पाँचवीं अनुसूची और पंचायतों का अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम, 1996 यानी PESA का उल्लेख करते हुए यह कहा गया था कि ग्रामसभा अपनी सांस्कृतिक संरचना और परंपराओं की रक्षा के अधिकार का उपयोग कर रही है।
 
स्थानीय स्तर पर कहा गया कि बाहरी नेटवर्क और कुछ धार्मिक गतिविधियों के चलते पारंपरिक सामाजिक ढांचे में दरारें पड़ रही हैं और इससे सामुदायिक जीवन प्रभावित हो रहा है। दूसरी ओर, ईसाई याचिकाकर्ताओं का कहना था कि ऐसे बोर्ड धार्मिक स्वतंत्रता और आवागमन के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।
 
उच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या ये होर्डिंग्स वास्तव में अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। न्यायालय ने सबसे पहले होर्डिंग्स की भाषा का परीक्षण किया। उसने पाया कि बोर्ड किसी समुदाय के सदस्यों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाते, बल्कि बल, प्रलोभन और कपट के आधार पर होने वाले धर्मांतरण का विरोध दर्ज करते हैं। इस अंतर को अदालत ने महत्वपूर्ण माना।
 
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न्यायालय ने यह भी दोहराया कि अनुच्छेद 25 पूर्ण अधिकार नहीं है और यह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। सर्वोच्च न्यायालय के "Rev. Stainislaus बनाम मध्यप्रदेश राज्य" फैसले का हवाला देते हुए यह रेखांकित किया गया कि धर्म का प्रचार और बलपूर्वक या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना अलग बातें हैं। छत्तीसगढ़ धर्मस्वातंत्र्य अधिनियम, 1968 भी इसी सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है।
 
 
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि PESA नियमों के तहत ग्रामसभा के निर्णयों के विरुद्ध वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं। अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर याचिका खारिज करते हुए कहा कि होर्डिंग्स को सीधे असंवैधानिक नहीं माना जा सकता और उपलब्ध वैकल्पिक प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाना चाहिए।
 
मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा तो वहाँ भी हस्तक्षेप से इनकार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय के आदेश में ऐसी कोई गंभीर कानूनी त्रुटि नहीं है जो हस्तक्षेप की मांग करे। साथ ही यह भी कहा गया कि अपील के स्तर पर नए तथ्यात्मक विवाद जोड़कर मूल प्रश्न का स्वरूप बदला नहीं जा सकता। इस प्रकार उच्च न्यायालय का आदेश यथावत रहा।
 
 
इस निर्णय का महत्व केवल विवाद के निपटारे तक सीमित नहीं है। अदालतों ने पाँचवीं अनुसूची और PESA के तहत ग्रामसभा को दिए गए सांस्कृतिक संरक्षण के अधिकार को स्वीकार किया।
 
बस्तर जैसे क्षेत्रों में, जहाँ सामाजिक जीवन सामूहिक परंपराओं और साझा आस्थाओं पर आधारित है, वहां कन्वर्ज़न के कारण हो रहे नकारात्मक सामाजिक बदलाव को लेकर संवेदनशीलता स्वाभाविक है। न्यायालयों ने यह माना कि यदि कुछ गतिविधियों से सामुदायिक तनाव पैदा हो रहा है, तो ग्रामसभा की चिंता को एकदम खारिज नहीं किया जा सकता।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार