
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इस बार के बजट सत्र ने एक ऐसा दृश्य देखा, जो ना केवल एक अकल्पनीय संसदीय क्षण था, बल्कि वह जीवित दस्तावेज भी था, जो यह बताता है कि वैचारिक असहिष्णुता जब सत्ता और संगठन का संरक्षण पा लेती है, तो वह मनुष्य की देह ही नहीं, लोकतंत्र की आत्मा को भी अपंग करने की कोशिश करती है।
राज्यसभा सांसद सदानंदन मास्टर ने जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान अपने कृत्रिम पैरों को सदन की मेज पर रखा, तब इस घटना ने वामपंथी राजनीतिक हिंसा और उसकी वैचारिक असहिष्णुता को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।

सदन में मौजूद सदस्य, दर्शक दीर्घा और देशभर में प्रसारण देख रहे नागरिकों के सामने एक शिक्षक, एक स्वयंसेवक और अब एक सांसद सदानंदन मास्टर ने अपने शरीर पर झेले गए वामपंथी अत्याचार का प्रमाण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वह यह दिखाना चाहते हैं कि “लोकतंत्र क्या होता है” और अप्रत्यक्ष रूप से यह भी कि लोकतंत्र क्या नहीं होता।
दरअसल सदानंदन मास्टर केरल के उस कन्नूर जिले से आते हैं, जो दशकों से वामपंथी राजनीतिक हिंसा का पर्याय रहा है। 25 जनवरी 1994 की रात, कन्नूर ज़िले के पेरिंचेरी गांव में यही हुआ। तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और संघ के सहकार्यवाह के रूप में कार्य कर रहे सदानंदन मास्टर घर लौट रहे थे। रास्ते में वामपंथी संगठन के हमलावरों ने उन पर बम फेंके, उन्हें जमीन पर गिराया और “इंक़लाब ज़िंदाबाद” के नारे लगाते हुए कुल्हाड़ी से उनके दोनों पैर घुटनों के नीचे से काट दिए।

यह हमला आकस्मिक नहीं था। यह सुनियोजित, क्रूर और प्रतीकात्मक था, ताकि संदेश साफ रहे कि जो भी वामपंथी प्रभुत्व वाले क्षेत्र में किसी अन्य विचारधारा के साथ खड़ा होगा, उसका यही अंजाम होगा। स्थानीय दुकानों के शटर गिरा दिए गए। कोई मदद को आगे नहीं आया। घंटों तक वह शिक्षक सड़क पर लहूलुहान पड़ा रहा। अंततः उन्हें अस्पताल ले जाया गया। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उनके बचने की उम्मीद बेहद कम थी।
लेकिन आज जब सदानंदन मास्टर संसद में खड़े हुए, या यूं कहें, खड़े न हो पाने की विवशता को शब्दों में ढालते हुए बोले, तो वह केवल अपना दर्द नहीं सुना रहे थे। वह केरल की उस वामपंथी राजनीति की सच्चाई को उजागर कर रहे थे, जहां हिंसा को “क्रांति” और हत्याओं को “वर्ग संघर्ष” का नाम दिया जाता रहा है।
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सदानंदन मास्टर ने सदन में स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन पर हमला करने वाले CPIM से जुड़े कार्यकर्ता थे। देखा जाए तो यह आरोप नया नहीं है। केरल में राजनीतिक हिंसा से जुड़े दर्जनों मामलों में वामपंथी कैडरों की भूमिका पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर विभिन्न न्यायिक मंचों तक, केरल की हिंसा पर रिपोर्टें आती रही हैं। फिर भी, इन घटनाओं को अक्सर “दो पक्षों की झड़प” कहकर बराबरी पर रख दिया जाता है, मानो वामपंथियों की कुल्हाड़ी और निहत्थे शिक्षक के बीच भी कोई नैतिक संतुलन हो।
ग़ौरतलब है कि सदानंदन मास्टर का जन्म केरल के एक वामपंथी समर्थक परिवार में ही हुआ था। कॉलेज के दिनों में वे एबीवीपी के माध्यम से संघ से जुड़े और धीरे-धीरे संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बने। यही वैचारिक ‘अपराध’ उनके लिए मृत्यु-दंड जैसा सिद्ध हुआ।
कई महीनों के इलाज के बाद, कृत्रिम पैर लगवाकर उन्होंने फिर वही किया, जो एक शिक्षक का धर्म होता है। उन्होंने बच्चों को पढ़ाना पुनः आरम्भ किया। उन्होंने न तो विचार बदले, न ही सार्वजनिक जीवन से किनारा किया। बाद में वे केरल भाजपा के मुखपत्र ‘जनभूमि’ से जुड़े, फिर शिक्षण कार्य में लौटे और अंततः राजनीति में सक्रिय हुए। वर्ष 2016 में विधानसभा चुनाव भले न जीत पाए हों, लेकिन उनका नाम केरल की राजनीतिक हिंसा के पीड़ितों की सूची में एक जीवित प्रतीक बन चुका था।
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इस पूरे घटनाक्रम में सबसे उल्लेखनीय रही अन्य विपक्षी दलों की चुप्पी। संसद के भीतर और बाहर, जहां वामपंथी दलों ने इसका विरोध करने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने न तो हिंसा की स्पष्ट निंदा की, न ही पीड़ित के पक्ष में मुखर समर्थन किया। यह वही कांग्रेस है जो स्वयं को लोकतंत्र का संरक्षक बताती है, लेकिन व्यवहार में अक्सर वामपंथी दलों के साथ वैचारिक सहयात्री के रूप में खड़ी दिखती है। केरल हो या दिल्ली, कांग्रेस की यह दुविधा (या सुविधा) बार-बार सामने आती रही है।
राज्यसभा में सदानंदन मास्टर का भाषण कोई सामान्य संबोधन नहीं था। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि CPIM द्वारा की गई यातना के कारण वे अपना पहला भाषण खड़े होकर नहीं दे सके। यह वाक्य केवल व्यक्तिगत पीड़ा का बयान नहीं, बल्कि उस वामपंथी व्यवस्था पर आरोप था जिसने राजनीतिक हिंसा को लंबे समय तक “स्थानीय समस्या” कहकर टाल दिया।
आज जब भारत में लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिशें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर होती हैं, तब सदानंदन मास्टर का शरीर उन आलोचनाओं का उत्तर भी है और देश के भीतर मौजूद उस विचारधारा को भी उजागर करता है, जो असहमति को कुचलने में विश्वास रखती है।