छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के बास्तानार ब्लॉक का छोटा सा गांव तिरथुम आज जल संरक्षण के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय उदाहरण बनकर उभरा है। कभी ऐसा समय था जब यहां के ग्रामीण पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करते थे। बारिश का पानी गांव के ऊपर स्थित पथरीली पहाड़ियों से तेजी से बहकर नीचे निकल जाता था और खेतों तक उसका लाभ नहीं पहुंच पाता था। लेकिन ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास और प्रशासन की पहल ने इस स्थिति को बदल दिया।
गांव के लोगों ने करीब 900 कंटूर ट्रेंच बनाकर बारिश के पानी को रोकने की व्यवस्था की और देखते ही देखते इस प्रयास ने पूरे इलाके की खेती और जल स्थिति को बदल दिया। आज तिरथुम को बास्तानार ब्लॉक का सर्वश्रेष्ठ गांव माना जा रहा है और यह बस्तर में जल प्रबंधन का एक मॉडल बन चुका है।
बस्तर का यह क्षेत्र भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण है। यहां के कई गांव पहाड़ियों और पथरीली भूमि से घिरे हुए हैं। तिरथुम गांव की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। गांव के ऊपर फैली पहाड़ियों से हर साल बारिश का पानी तेज ढलान के कारण सीधे बहकर नीचे चला जाता था। पानी जमीन में समाने के बजाय बह जाता था, जिससे गांव में भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा था। इसका सीधा असर खेती पर पड़ता था। अधिकांश किसान केवल एक फसल पर निर्भर रहते थे और गर्मियों के महीनों में पानी का संकट गहराने लगता था।
इसी समस्या को देखते हुए बस्तर जिले में वर्षा के जल का संचयन को बढ़ावा देने के लिए "मोर गांव मोर पानी" अभियान शुरू किया गया। इस अभियान का उद्देश्य ग्रामीणों को जल संरक्षण के लिए प्रेरित करना और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए सामुदायिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना था। तिरथुम गांव ने इस अभियान को गंभीरता से लिया और ग्रामीणों ने मिलकर अपने गांव की जल समस्या का समाधान खोजने का निर्णय किया।
ग्रामीणों ने गांव के ऊपरी हिस्से में स्थित लगभग तीन एकड़ पथरीली और ढलान वाली जमीन को चिन्हित किया। यह वही क्षेत्र था जहां से बारिश का अधिकांश पानी तेजी से बहकर निकल जाता था।
गांव के लोगों ने सामूहिक श्रमदान और मनरेगा योजना के सहयोग से इस इलाके में करीब 900 छोटे छोटे गड्ढे खोदे। इन गड्ढों को तकनीकी भाषा में कंटूर ट्रेंच कहा जाता है। इनका उद्देश्य यह होता है कि बारिश का पानी ढलान से सीधे बहने के बजाय इन गड्ढों में रुक जाए और धीरे धीरे जमीन में समा जाए।
जब यह संरचनाएं तैयार हुईं तो उनका असर अगले ही वर्ष देखने को मिलने लगा। बारिश के दौरान पानी इन कंटूर ट्रेंच में जमा होने लगा और धीरे धीरे जमीन के भीतर रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाने लगा। गांव के आसपास के कुओं और खेतों में पानी की उपलब्धता बढ़ गई। जिन खेतों में पहले पानी की कमी के कारण खेती सीमित थी वहां अब सिंचाई की स्थिति बेहतर होने लगी।
गाँव के किसानों का कहना है कि इस पहल ने उनके जीवन में वास्तविक बदलाव लाया है। पहले वे मुश्किल से एक फसल ले पाते थे, क्योंकि बारिश के बाद खेतों में नमी जल्दी खत्म हो जाती थी। लेकिन अब भूजल स्तर बढ़ने से खेतों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध रहने लगा है। कई किसानों ने अब दो से तीन फसल तक लेना शुरू कर दिया है। इससे उनकी आय में भी बढ़ोतरी हुई है और गांव की आर्थिक स्थिति में सुधार दिखाई देने लगा है।
जिला पंचायत के अधिकारी बताते हैं कि तिरथुम में जल संरक्षण के प्रयासों के परिणाम बेहद सकारात्मक रहे हैं। उनके अनुसार इस मॉडल ने यह साबित किया है कि यदि सही योजना और सामुदायिक भागीदारी के साथ काम किया जाए तो कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में भी जल संकट का समाधान संभव है। उन्होंने बताया कि अब इन कंटूर ट्रेंच के आसपास बड़े पैमाने पर पौधारोपण की योजना बनाई जा रही है ताकि मिट्टी का क्षरण रोका जा सके और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिले।
विशेषज्ञों का मानना है कि कंटूर ट्रेंच जैसी तकनीक पहाड़ी और ढलान वाले क्षेत्रों में जल संरक्षण का बेहद प्रभावी तरीका है। इन संरचनाओं के माध्यम से बारिश का पानी जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाता है और साथ ही मिट्टी के कटाव को भी रोकता है। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में जल प्रबंधन की योजनाओं में इस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।
तिरथुम गांव की सफलता के बाद प्रशासन ने इस मॉडल को जिले के अन्य हिस्सों में भी लागू करने की योजना बनाई है। बस्तर जिले में अब तक करीब 100 अलग अलग स्थानों पर कंटूर ट्रेंच बनाए जा चुके हैं। प्रशासन का मानना है कि यदि इसी तरह सामुदायिक भागीदारी के साथ जल संरक्षण के प्रयास जारी रहे तो आने वाले वर्षों में बस्तर के कई गांव जल संकट से मुक्त हो सकते हैं।
तिरथुम की कहानी यह भी दिखाती है कि जल संरक्षण के लिए यहां किसी बड़े बांध या महंगी परियोजना की जरूरत नहीं पड़ी। ग्रामीणों ने अपने श्रम, स्थानीय संसाधनों और प्रशासनिक योजनाओं के सहयोग से ऐसा समाधान खोज लिया जिसने गांव की तस्वीर बदल दी।
आज तिरथुम गांव केवल जल संरक्षण की एक परियोजना का उदाहरण नहीं है बल्कि यह उस सोच का प्रतीक बन चुका है जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर विकास की राह खोजी जाती है। यहां के ग्रामीणों ने यह साबित कर दिया है कि यदि समुदाय स्वयं आगे आए और अपने संसाधनों की जिम्मेदारी उठाए तो सीमित साधनों में भी बड़े परिवर्तन संभव हैं।
बस्तर के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसे इस छोटे से गांव की कहानी अब पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुकी है। तिरथुम ने दिखा दिया है कि बारिश का वही पानी जो कभी पहाड़ियों से बहकर बेकार चला जाता था, यदि सही तरीके से रोका जाए तो वही पानी गांव की किस्मत बदल सकता है। आज इस गांव के खेतों में हरियाली है और किसान उम्मीद के साथ खेती कर रहे हैं। यही कारण है कि तिरथुम को अब बस्तर के जल संरक्षण मॉडल गांव के रूप में देखा जा रहा है।