
बीते 8 मार्च, 2026 को वामपंथी समाचार प्लेटफ़ॉर्म The Print पर प्रकाशित एक लेख ने जनजातीय आंदोलन, नक्सलवाद और राज्य की भूमिका को लेकर एक पुराना और परिचित वैचारिक नैरेटिव दोहराया है।
यह लेख वीर भारत तलवार का है, जिसकी पृष्ठभूमि उनके हाल में प्रकाशित पुस्तक “उत्पीड़ितों के विमर्श” से भी जुड़ी दिखाई देती है। यह पुस्तक राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है और उसी वैचारिक ढांचे को आगे बढ़ाती है जिसमें राज्य को लगभग पूरी तरह दोषी और माओवादी आतंकवाद को लगभग सामाजिक प्रतिक्रिया की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
पहली नजर में द प्रिंट का यह लेख जनजातीय समाज की समस्याओं के प्रति संवेदनशील प्रतीत होता है, लेकिन गहराई से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह एक वैचारिक ढांचा खड़ा करता है जिसमें तथ्यों की जटिलता को नजरअंदाज कर एकतरफा निष्कर्ष पेश किए जाते हैं। यह वही पुरानी बहस है जिसमें जनजातीय समाज की वास्तविक समस्याओं को माओवादी राजनीति के औचित्य से जोड़ने की कोशिश की जाती है।

इस लेख में सबसे पहले यह तर्क दिया गया है कि ऐतिहासिक रूप से जनजातीय विद्रोह इसलिए सशस्त्र रहे क्योंकि उनके पास संघर्ष का कोई दूसरा तरीका नहीं था। यह तर्क आधा सच है और आधा भ्रम। उन्नीसवीं सदी के संथाल विद्रोह, बिरसा मुंडा का आंदोलन और अन्य जनजातीय प्रतिरोध औपनिवेशिक शासन के खिलाफ थे। उनका लक्ष्य ब्रिटिश सत्ता और उसके आर्थिक शोषण के विरुद्ध संघर्ष करना था। आज की स्थिति पूरी तरह भिन्न है।
आज जनजातीय क्षेत्र भारतीय संविधान के अंतर्गत आते हैं और अनुसूचित जनजातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व, शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण, वन अधिकार कानून और पंचायत विस्तार अधिनियम जैसे संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। औपनिवेशिक विद्रोहों को आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़कर प्रस्तुत करना इतिहास की संदर्भहीन व्याख्या है।
द प्रिंट के उक्त लेख में यह भी कहा गया है कि मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां जनजातीय सवालों को नहीं उठातीं। यह दावा भी वास्तविकता से मेल नहीं खाता। पिछले तीन दशकों में जनजातीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है। वन अधिकार अधिनियम 2006, जनजातीय उपयोजना और पेसा कानून जैसी व्यवस्थाएं इसी उद्देश्य से बनाई गईं। यह कहना कि लोकतांत्रिक राजनीति जनजातीय समाज को कोई मंच नहीं देती, तथ्यों की अनदेखी है।

इस लेख का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक पक्ष माओवादी आतंकवाद को लगभग सामाजिक प्रतिक्रिया के रूप में प्रस्तुत करना है। लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। भारत में माओवादी हिंसा ने पिछले तीन दशकों में हजारों लोगों की जान ली है। इसमें बड़ी संख्या में जनजातीय नागरिक भी शामिल हैं।
माओवादी संगठन जिन ग्रामीणों को पुलिस का मुखबिर मान लेते हैं उन्हें जन अदालतों में मार दिया जाता है। स्कूल भवनों को उड़ाना, सड़क निर्माण को रोकना और युवाओं को जबरन संगठन में शामिल करना उनकी रणनीति का हिस्सा रहा है। इन कार्रवाइयों का सबसे बड़ा नुकसान उसी जनजातीय समाज को हुआ है जिसके नाम पर यह आंदोलन चलाया जाता है।
द प्रिंट के लेख में राज्य की कार्रवाई को भी माओवादी आतंक के बराबर ठहराने की कोशिश की गई है। यह तुलना तथ्यों के आधार पर टिकती नहीं है। सुरक्षा बल संवैधानिक ढांचे के भीतर काम करते हैं और उनका उद्देश्य कानून व्यवस्था बनाए रखना है। यदि किसी कार्रवाई में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप सामने आते हैं तो उनकी जांच की व्यवस्था मौजूद है। इसके विपरीत माओवादी संगठन किसी लोकतांत्रिक जवाबदेही के तहत काम नहीं करते और उनकी राजनीति भय और हिंसा के सहारे चलती है।

इसी संदर्भ में द प्रिंट के लेख में कथित अर्बन नक्सल हिमांशु कुमार का नाम भी सामने लाया गया है और उन्हें गांधीवादी कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन हिमांशु कुमार के दावों और अभियानों को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
छत्तीसगढ़ में कथित फर्जी मुठभेड़ों के आरोपों को लेकर उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। वर्ष 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि प्रस्तुत आरोप प्रमाणित नहीं हैं और याचिकाकर्ता पर ही जुर्माना लगाया गया। साथ ही हिमांशु कुमार की नीयत पर भी संदेह जताया था।
दरअसल माओवादी आतंकवाद की वास्तविकता को समझने के लिए यह भी देखना जरूरी है कि माओवादी संगठन ने जनजातीय समाज के साथ कैसा व्यवहार किया है। अनेक क्षेत्रों में उन्होंने स्थानीय युवाओं को जबरन भर्ती किया, ग्राम सभाओं और स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया और विकास कार्यों का विरोध किया। सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र जैसी परियोजनाओं पर हमले इनकी रणनीति का हिस्सा रहे हैं। इन सबका सीधा नुकसान स्थानीय जनजातीय समाज को उठाना पड़ा है।

द प्रिंट के लेख में यह भी कहा गया है कि विकास की सरकारी नीतियां केवल कॉर्पोरेट हितों के लिए बनाई जाती हैं। लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। पिछले वर्षों में जनजातीय बाहुल्य क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क, मोबाइल कनेक्टिविटी, शिक्षा संस्थानों और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है। बड़ी संख्या में जनजातीय विद्यार्थी आवासीय विद्यालयों और छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से उच्च शिक्षा तक पहुंचे हैं। यह परिवर्तन धीरे धीरे ही सही लेकिन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि जनजातीय प्रश्न को माओवादी हिंसा के साथ जोड़ना स्वयं जनजातीय समाज के साथ अन्याय है। भारत के अधिकांश जनजातीय समुदाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में विश्वास रखते हैं और अपने अधिकारों के लिए संवैधानिक रास्तों का उपयोग करते हैं। शिक्षा, स्थानीय स्वशासन और आर्थिक अवसरों का विस्तार ही उनके जीवन में स्थायी परिवर्तन ला सकता है।