रायपुर में 14 अप्रैल को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 को लेकर चल रही बहस को अचानक तीखा बना दिया है। छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल ने इस प्रेस वार्ता में विधेयक को “काला कानून” बताते हुए इसे संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के खिलाफ करार दिया। लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जो घटनाक्रम सामने आया, उसने न केवल उनके तर्कों पर सवाल खड़े किए, बल्कि उनके विवादित नेतृत्व और विश्वसनीयता को भी कठघरे में ला दिया है।
प्रेस क्लब में आयोजित इस वार्ता में पन्नालाल ने अपने लिखित बयान का हवाला देते हुए कहा कि प्रस्तावित कानून न्याय के मूल सिद्धांतों को कमजोर करता है और इसका दुरुपयोग संभव है। उनके द्वारा जारी पत्र में संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार घोषणा का उल्लेख करते हुए यह भी कहा गया कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह का कानून मूल अधिकारों के खिलाफ है। उन्होंने पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून से तुलना करते हुए इसे कठोर और दमनकारी बताया।
हालांकि जैसे ही पत्रकारों ने उनके दावों के आधार, कानूनी प्रावधानों और जमीनी उदाहरणों पर सवाल उठाने शुरू किए, प्रेस कॉन्फ्रेंस का माहौल बदल गया। विवादी ईसाई लीडर पन्नालाल ने कुछ सवालों पर स्पष्ट उत्तर देने के बजाय तीखी प्रतिक्रिया दी और व्यक्तिगत टिप्पणी तक कर दी। पन्नालाल के द्वारा एक महिला पत्रकार की योग्यता पर सवाल उठाने की घटना ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। इस व्यवहार से नाराज होकर कई पत्रकारों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस का बहिष्कार कर दिया।
लोकतांत्रिक विमर्श में इस तरह का घटनाक्रम असामान्य माना जाता है और यह सीधे तौर पर उस व्यक्ति की जवाबदेही पर प्रश्न खड़ा करता है जो सार्वजनिक मुद्दों पर नेतृत्व का दावा कर रहा हो।
इस ताजा विवाद ने पन्नालाल के पहले दिए गए बयानों और उन पर लगे आरोपों को फिर से चर्चा में ला दिया है। इससे पहले डायोसिस ऑफ छत्तीसगढ़, चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया से जुड़े पदाधिकारियों ने एक अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस में पन्नालाल को ईसाइयों का “स्वयंभू नेता” बताया था। डायोसिस के सचिव नितिन लॉरेंस ने उनके दावों को “निराधार” बताते हुए तीखा हमला बोला था। लॉरेंस ने उस दौरान यह तक कहा था कि पन्नालाल का रवैया और उनकी गतिविधियां समाज के हितों के खिलाफ हैं और लारेंस ने उन्हें “देशद्रोही” तक करार दिया था।
यहीं नहीं, उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में लॉरेंस ने पन्नालाल और उनके कुछ सहयोगियों पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप भी लगाए थे। उनके अनुसार, ईसाइयों के शैक्षणिक संस्थानों से जुड़े मामलों में ढाई से तीन करोड़ रुपये तक की राशि के दुरुपयोग की
शिकायतें सामने आई हैं। इस मामले की जांच के लिए एक समिति के गठन की बात भी कही गई थी।
यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है कि यह सवाल किसी राजनीतिक विरोधी या बाहरी समूह ने नहीं, बल्कि उसी मसीही समाज के भीतर से उठाए गए हैं। यही कारण है कि यह विवाद अब केवल धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के विरोध तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि समुदाय के भीतर नेतृत्व की वैधता और पारदर्शिता के प्रश्नों से जुड़ गया है।
पन्नालाल के लिखित पत्र का विश्लेषण भी इस बहस को समझने के लिए जरूरी है। पत्र में जिस तरह अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों और पाकिस्तान के कानून का उल्लेख किया गया है, उसे कई विधि विशेषज्ञ संदर्भ से काटकर प्रस्तुत की गई तुलना मानते हैं।
इस मामले में पूर्व अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल ऑफ़ इंडिया बी गोपाकुमार का कहना है कि "भारत का संवैधानिक ढांचा, न्यायिक प्रक्रिया और मौलिक अधिकारों की व्याख्या इन उदाहरणों से मूल रूप से भिन्न है। ऐसे में इस तरह की तुलना प्रोपेगेंडा फैलाने का प्रयास तो हो सकती है, लेकिन यह ठोस कानूनी तर्क का विकल्प नहीं बन सकती।"
धर्मांतरण को लेकर देश के कई राज्यों में पहले से कानून मौजूद हैं, जिनका उद्देश्य जबरन, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोकना है। छत्तीसगढ़ में लागू धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम भी इसी व्यापक नीति ढांचे का हिस्सा है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है, जो मसीही समाज के भीतर बढ़ती दरार की ओर संकेत करता है। एक ओर विवादित ईसाई लीडर पन्नालाल और उनके समर्थक हैं, जो विधेयक का खुलकर विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समुदाय के भीतर से ही ऐसे संगठन और पदाधिकारी सामने आ रहे हैं जो उनके दावों और तरीकों पर सवाल उठा रहे हैं। यह विभाजन केवल विचारों का नहीं, बल्कि नेतृत्व और प्रतिनिधित्व का भी है।
रायपुर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों के साथ हुआ टकराव इस संदर्भ में एक अहम संकेत है। यह घटना बताती है कि सार्वजनिक मंचों पर किए जा रहे दावों को लेकर सवाल उठ रहे हैं और उन सवालों के जवाब देने की क्षमता और इच्छा दोनों परख के दायरे में हैं।
फिलहाल यह मामला कई स्तरों पर स्पष्टता की मांग करता है। पन्नालाल पर लगे वित्तीय और संस्थागत आरोपों की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है। जब तक इन पहलुओं पर पारदर्शिता नहीं आती, तब तक यह विवाद केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक विश्वास और जवाबदेही के बड़े प्रश्न के रूप में बना रहेगा।