
केरल के कन्नूर में 2011 के बम हमले मामले में 2026 में आया अदालत का फैसला केवल एक आपराधिक मुकदमे का अंत नहीं है, बल्कि उस लंबे समय से चल रहे राजनीतिक नैरेटिव पर भी सवाल खड़ा करता है, जिसमें हिंसा की चर्चा होते ही एकतरफा तस्वीर पेश की जाती रही है।
इस मामले में CPI(M) अर्थात मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े 10 कार्यकर्ताओं को दोषी ठहराया गया, मुख्य आरोपी को 25 साल की सजा और अन्य को लंबी कैद दी गई। न्यायालय ने साफ कहा कि यह संगठित हमला था, जिसमें बमों का इस्तेमाल किया गया और हत्या के प्रयास जैसी गंभीर धाराएं सिद्ध हुईं। यह फैसला अपने आप में बहुत कुछ कहता है, लेकिन उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है वह खामोशी, जो इसके बाद देखने को मिली।

कन्नूर कोई सामान्य जिला नहीं है। यह वह जगह है जहां दशकों से कम्युनिस्ट समूहों द्वारा की जाने वाली राजनीतिक हिंसा एक वास्तविकता रही है। लेकिन इस हिंसा को लेकर देशभर में जो नैरेटिव गढ़ा गया, उसमें अक्सर कम्युनिस्ट समूहों को ही “पीड़ित” के रूप में पेश किया गया, जबकि दूसरी ओर की घटनाओं को या तो कम करके दिखाया गया या पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। यही वह विरोधाभास है, जिसे इस फैसले ने फिर से उजागर किया है।
हाल ही में जिस मामले में फ़ैसला आया है, वह भी कोई अचानक हुई घटना नहीं थी। यह उस कम्युनिस्ट राजनीतिक का हिस्सा था, जिसमें विचारधारा के नाम पर हिंसा को साधन बनाया गया। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं द्वारा बमों का इस्तेमाल, योजनाबद्ध हमला और गंभीर रूप से घायल हुए लोग, ये सब न्यायालय में साबित हुआ। लेकिन जब इस तरह की घटनाएं सामने आती हैं, तो क्या उन्हें उसी तीव्रता से उठाया जाता है, जिस तीव्रता से अन्य मामलों को उठाया जाता है? यही वह सवाल है, जो इस पूरे मामले के केंद्र में है।

वामपंथी राजनीति की एक बड़ी पहचान यह रही है कि वह खुद को नैतिक उच्चता के स्थान पर स्थापित करने की कोशिश करती है। “संघर्ष”, “जनता”, “विचारधारा”, इन शब्दों के माध्यम से एक ऐसी छवि बनाई जाती है, जिसमें हिंसा को या तो वैचारिक संघर्ष का हिस्सा बताकर हल्का किया जाता है, या फिर उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन जब अदालतें इन मामलों में ठोस सजा सुनाती हैं, तो यह साफ हो जाता है कि यह केवल विचारधारा का संघर्ष नहीं, बल्कि कानून और व्यवस्था के खिलाफ गंभीर अपराध हैं। कन्नूर का यह मामला वामपंथी विचारधारा की उसी वास्तविकता को सामने लाता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस तरह के मामलों में अक्सर “दोनों तरफ से हिंसा” का तर्क सामने रखा जाता है। लेकिन यह तर्क कई बार उस विशिष्ट घटना की गंभीरता को कम करने का माध्यम बन जाता है। जब एक खास मामले में अदालत ने ठोस साक्ष्यों के आधार पर सजा दी है, तो उस पर सीधा सवाल उठाना या उसे व्यापक बहस में उलझाना भी एक प्रकार का नैरेटिव निर्माण ही है।

यहां मुद्दा केवल एक पार्टी या एक घटना का नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या हम राजनीतिक हिंसा को एक समान दृष्टि से देखने के लिए तैयार हैं, या फिर उसे विचारधारा के आधार पर अलग-अलग मानकों में बांटते रहेंगे?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल मीडिया और बौद्धिक वर्ग की भूमिका को लेकर भी उठता है। जब कुछ घटनाएं राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन जाती हैं और कुछ घटनाएं सीमित दायरे में ही रह जाती हैं, तो यह चयन भी अपने आप में एक संदेश देता है। कन्नूर जैसे मामलों पर व्यापक राष्ट्रीय चर्चा क्यों नहीं होती? क्यों इन घटनाओं को उस स्तर पर नहीं उठाया जाता, जहां उनकी गंभीरता समझी जा सके? यह चयनात्मकता ही वह जगह है, जहां “नैरेटिव” और “सच्चाई” के बीच का अंतर स्पष्ट होता है।

राजनीतिक हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती। लेकिन उससे भी ज्यादा खतरनाक है उस हिंसा का चयनात्मक चित्रण। जब संघ के सामान्य प्रशिक्षण शिविर को भी "हिंसा की ट्रेनिंग" कहकर बार-बार दिखाया जाता है और वामपंथी पक्ष की हिंसक घटनाओं को भी नजरअंदाज किया जाता है, तो यह केवल सूचना का अंतर नहीं होता, बल्कि यह धारणा का निर्माण होता है। कन्नूर का यह फैसला इसी धारणा को चुनौती देता है।
यह याद रखना जरूरी है कि न्यायालय भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देती हैं। और जब साक्ष्य यह साबित करते हैं कि एक संगठित हमला हुआ, जिसमें बमों का इस्तेमाल हुआ और लोगों की जान लेने की कोशिश की गई, तो उसे किसी भी वैचारिक बहस के पीछे छुपाया नहीं जा सकता।
अंततः यह सवाल हर उस व्यक्ति के सामने है, जो लोकतांत्रिक विमर्श में भाग लेता है। क्या हम हर प्रकार की राजनीतिक हिंसा को समान रूप से स्वीकार करेंगे कि वह गलत है? या फिर हम उसे अपने-अपने नजरिये से सही या गलत ठहराते रहेंगे? कन्नूर का यह मामला केवल अतीत की एक घटना नहीं है। यह वर्तमान के उस नैरेटिव पर सवाल है, जो सच्चाई को पूरी तरह नहीं, बल्कि चयनित रूप में सामने लाता है।