
22 मई की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी टिप्पणी कर दी, जिसने फिर से बस्तर, नक्सलवाद और “अर्बन नक्सल नेटवर्क” की बहस को तेज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि “जंगल वॉरफेयर में कट्टर नक्सलियों का सामना गुलदस्तों से नहीं होता।”
यह टिप्पणी कट्टा रामचंद्र रेड्डी की मौत से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की गई। वही कट्टा रामचंद्र रेड्डी, जिसे सुरक्षा एजेंसियां दंडकारण्य क्षेत्र में माओवादी संगठन का बड़ा रणनीतिक चेहरा मानती थीं। पिछले साल सितंबर में वह नारायणपुर के अबूझमाड़ क्षेत्र में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था।

दरअसल कट्टा रामचंद्र के बेटे की ओर से अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने कोर्ट में कहा कि मौत के बाद कट्टा रामचंद्र रेड्डी के शरीर पर कई चोटें थीं, जो कथित तौर पर हिरासत में यातना की ओर इशारा करती हैं। इस पर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने सीधे पूछा कि क्या हर मुठभेड़ सिर्फ गोलियों से होती है? जंगल में हाथापाई भी होती है। गिरना-पड़ना भी होता है। ऐसे में हर चोट को कस्टोडियल टॉर्चर कैसे मान लिया जाए?
फिर न्यायालय ने वह टिप्पणी की, जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा हुई। जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने कहा कि जंगल वॉरफेयर बेहद कठिन स्थिति होती है। वहां सुरक्षाबल हर वक्त खतरे में रहते हैं। ऐसे में “कट्टर नक्सलियों का स्वागत गुलदस्तों से नहीं किया जा सकता।” कोर्ट ने आखिरकार दोबारा पोस्टमॉर्टम और SIT जांच की मांग खारिज कर दी।

लेकिन कट्टा रामचंद्र रेड्डी की कहानी सिर्फ एक माओवादी आतंकी की कहानी नहीं है। शायद यही वजह है कि उसकी मौत के महीनों बाद भी उसका नाम लगातार खबरों में बना हुआ है।
तेलंगाना के करीमनगर जिले के तिगलागुट्टा पल्ली में पैदा हुआ रेड्डी पढ़ा-लिखा था। उसने कानून की पढ़ाई की थी। कुछ समय तक पढ़ाने का काम भी किया। शुरूआती जीवन देखकर शायद कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था कि यही आदमी आगे चलकर बस्तर के सबसे ख़ूँख़ार माओवादी आतंकियों में गिना जाएगा।

महाराष्ट्र के नांदेड़ में पढ़ाई के दौरान वह माओवादी विचारधारा के संपर्क में आया। बाद में उसने माओवादी संगठन के लिए कानूनी सलाहकार के रूप में काम करना शुरू किया। भिलाई और रायपुर में उसने अपना शहरी नेटवर्क मजबूत किया। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, वह उन लोगों में से था जो माओवाद की जंगल और शहर, दोनों दुनिया को समझते थे।
2007 में उसकी पत्नी मालती की गिरफ्तारी हुई। उसके बाद वह पूरी तरह भूमिगत हो गया। कुछ साल तक उसका कोई सुराग नहीं मिला। फिर उसका नाम बस्तर के जंगलों से सामने आने लगा। धीरे-धीरे वह दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी में ऊपर पहुंचा। 2019 में राउला श्रीनिवास उर्फ़ रमन्ना की मौत के बाद उसे दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी का सेक्रेटरी बना दिया गया।
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि बस्तर में हुए कई बड़े माओवादी आतंकी हमलों और रणनीतियों के पीछे उसकी भूमिका थी। यही वजह थी कि सितंबर 2025 में उसकी मौत को सुरक्षाबलों के लिए बड़ी सफलता माना गया। लेकिन असली विवाद उसकी मौत के बाद शुरू हुआ।
अक्टूबर 2025 में तेलंगाना के सिद्धिपेट जिले में उसका अंतिम संस्कार कार्यक्रम हुआ। शुरुआत में यह एक सामान्य श्रद्धांजलि सभा जैसा लगा। बाद में एनआईए की नजर इस कार्यक्रम पर गई। एजेंसी ने पाया कि कार्यक्रम में शामिल कई लोग लंबे समय से माओवादी समर्थक वैचारिक नेटवर्क से जुड़े रहे हैं।
इसके बाद ऐसे लोगों को नोटिस जारी किए गए। कुछ ऐसे नाम भी सामने आए जिनका संबंध वामपंथी संगठनों से था। जांच एजेंसियों का मानना है कि यही वह “अर्बन नेटवर्क” है जो सीधे जंगल में नहीं लड़ता, लेकिन विचारधारा, प्रचार और संपर्क के स्तर पर माओवादी संगठन को बढ़ावा देता है।
यहीं सवाल उठता है कि क्या शहरों में अब भी ऐसा वैचारिक ढांचा मौजूद है जो माओवादी हिंसा को सीधे नहीं, लेकिन परोक्ष रूप से वैधता देने की कोशिश करता है? एनआईए ने इसी मामले में गाडे इनैया नाम के एक माओवादी विचारक को भी गिरफ्तार किया। उसने श्रद्धांजलि सभा में प्रतिबंधित संगठन के समर्थन में भाषण दिया था।

बस्तर में काम करने वाले अधिकारी लंबे समय से एक बात कहते रहे हैं कि जंगल में मौजूद हथियारबंद माओवादी जितने खतरनाक हैं, उतना ही महत्वपूर्ण उनका शहरों में मौजूद सपोर्ट सिस्टम भी है। यही नेटवर्क भर्ती में मदद करता है, नैरेटिव बनाता है, कानूनी सहायता जुटाता है और कई बार “मानवाधिकार” की भाषा में पूरी लड़ाई को पेश करता है।
यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सिर्फ एक लाइन नहीं थी। वह सीधे उस जमीनी वास्तविकता की तरफ इशारा कर रही थी, जिसे बस्तर में तैनात जवान रोज झेलते हैं।