दक्षिण एशिया में शक्ति संघर्ष अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। यह लड़ाई अब समाजों, खुफिया नेटवर्क, बंदरगाहों, ड्रोन कॉरिडोर और राजनीतिक नैरेटिव तक फैल चुकी है। दुनिया की बड़ी ताकतें खुले युद्ध से बचते हुए ऐसे मोर्चे बना रही हैं, जहां लड़ाई दिखाई कम देती है, लेकिन असर बहुत गहरा छोड़ती है।
2024 में डोनाल्ड ट्रंप दोबारा व्हाइट हाउस पहुंचे। लेकिन इस बार उनका नजरिया पहले से ज्यादा आक्रामक था। वॉशिंगटन के रणनीतिक हलकों में यह धारणा मजबूत हो चुकी थी कि भारत अमेरिका के लिए उपयोगी साझेदार तो बन सकता है, लेकिन किसी भी कीमत पर उसका रणनीतिक मोहरा नहीं बनेगा।
यहीं से दक्षिण एशिया में एक नए खेल की चर्चा तेज हुई।
Project K और पूर्वोत्तर का समीकरण
रणनीतिक हलकों में "Project K" नाम की एक योजना को लेकर चर्चाएं शुरू हुईं। इस रणनीति का केंद्र भारत का पूर्वोत्तर इलाका और म्यांमार सीमा क्षेत्र बताया गया। खासकर कुकी, चिन और मिज़ो समुदायों के बीच मौजूद जातीय और सांस्कृतिक संबंधों पर फोकस बढ़ा।
मणिपुर हिंसा को आधिकारिक तौर पर आरक्षण और जातीय विवाद से जोड़ा गया, लेकिन सुरक्षा विश्लेषकों के बीच यह चर्चा भी चलती रही कि इसके पीछे सीमापार नेटवर्क, हथियारों की तस्करी और ड्रग कॉरिडोर की बड़ी भूमिका थी।
भारत का पूर्वोत्तर लंबे समय से संवेदनशील क्षेत्र रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान भी यहां अलग पहचान की राजनीति को बढ़ावा मिला। आजादी के बाद कई उग्रवादी संगठनों ने इसी क्षेत्र को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया।
म्यांमार में 2021 में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद हालात और जटिल हो गए।
म्यांमार युद्ध और गोल्डन ट्रायंगल की वापसी
भारत "Act East Policy" के तहत इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे बना रहा था। इसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया से कनेक्टिविटी बढ़ाना था। लेकिन म्यांमार में संघर्ष भड़कते ही यह परियोजना भी प्रभावित हुई।
युद्ध के साथ ही पूरे क्षेत्र में हथियारों और ड्रग्स का नेटवर्क तेजी से फैलने लगा। गोल्डन ट्रायंगल फिर सक्रिय होने लगा। म्यांमार के चिन इलाके में कई समूहों ने हथियार जुटाने शुरू किए। दूसरी तरफ भारत के सीमावर्ती इलाकों में पोपी की खेती बढ़ने लगी।
मणिपुर और मिजोरम की पहाड़ियों में ड्रग नेटवर्क को लेकर सुरक्षा एजेंसियां लगातार कार्रवाई कर रही थीं। इसी दौरान यह दावा भी सामने आया कि कई विदेशी नेटवर्क स्थानीय अस्थिरता का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे थे।
मणिपुर हिंसा के पीछे असली वजह को लेकर कई तरह की चर्चाएं हुईं। कुछ सुरक्षा सूत्रों का मानना था कि पोपी फसलों के खिलाफ कार्रवाई ने कई अवैध नेटवर्क को सीधे प्रभावित किया।
बांग्लादेश में बदलती राजनीति
इसी दौरान बांग्लादेश में भी बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा हो गया।
सेंट मार्टिन द्वीप को लेकर अंतरराष्ट्रीय दिलचस्पी बढ़ने लगी। बंगाल की खाड़ी में इसकी रणनीतिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। अमेरिका क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करना चाहता था, जबकि चीन भी ढाका पर प्रभाव बनाए रखने में जुटा था।
शेख हसीना दोनों पक्षों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन हालात तेजी से बदले।
2025 में बांग्लादेश में बड़े विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। शुरुआत छात्र आंदोलन के रूप में हुई, लेकिन बाद में कट्टरपंथी संगठनों और राजनीतिक समूहों की सक्रियता भी चर्चा में आने लगी। हालात इतने बिगड़े कि शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा।
भारत में इसे सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बड़े रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा गया।
पूर्वोत्तर में विदेशी गतिविधियों पर बढ़ी नजर
इसी समय भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में विदेशी नागरिकों की गतिविधियों पर सुरक्षा एजेंसियों ने निगरानी बढ़ा दी।
अप्रैल 2025 में अमेरिका में रहने वाले Pu Van Uk Cung नाम के व्यक्ति की मिजोरम यात्रा चर्चा में आई। बताया गया कि वह लंबे समय से चिन नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। उसने मणिपुर के संवेदनशील इलाकों का भी दौरा किया।
कुछ दिनों बाद आइजोल के एक होटल में उसकी मौत की खबर सामने आई। आधिकारिक तौर पर इसे हादसा बताया गया, लेकिन सुरक्षा हलकों में कई तरह की अटकलें चलती रहीं।
इसके तुरंत बाद दो अमेरिकी नागरिकों को आइजोल एयरपोर्ट पर आवश्यक परमिट नहीं होने के कारण हिरासत में लिया गया। बाद में उन्हें वापस भेज दिया गया।
नई दिल्ली का संदेश साफ माना गया। भारत अब पूर्वोत्तर में हर विदेशी गतिविधि पर करीबी नजर रख रहा था।
ढाका में तख्तापलट की साजिश
बांग्लादेश में राजनीतिक संकट के बीच सेना के भीतर भी हलचल बढ़ने लगी।
मार्च 2025 में सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान के खिलाफ साजिश की खबरें सामने आईं। कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया कि सेना के भीतर मौजूद एक धड़ा उन्हें हटाने की तैयारी कर रहा था।
रणनीतिक हलकों में यह चर्चा भी हुई कि पाकिस्तान की ISI इस पूरे घटनाक्रम में रुचि ले रही थी। बाद में हालात अचानक बदल गए और योजना विफल हो गई।
भारतीय सुरक्षा तंत्र को लेकर यह दावा भी किया गया कि उसने बांग्लादेशी नेतृत्व को समय रहते चेतावनी दी थी। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया कि बांग्लादेश अब सिर्फ घरेलू राजनीति का मामला नहीं रह गया था। वहां कई वैश्विक और क्षेत्रीय ताकतों की दिलचस्पी बढ़ चुकी थी।
मोदी पर खतरे की चर्चा और ढाका ऑपरेशन
इसी दौरान एक और सनसनीखेज दावा सामने आया।
कुछ रिपोर्टों में कहा गया कि अमेरिकी सैन्य पृष्ठभूमि से जुड़े एक व्यक्ति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने की योजना बनाई थी। यह योजना SCO Summit के दौरान चीन में हमले से जुड़ी बताई गई।
बाद में ढाका के एक होटल में उस व्यक्ति की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की खबर सामने आई। घटना ने खुफिया हलकों में कई सवाल खड़े किए।
दिलचस्प बात यह रही कि चीन से लौटने के अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने एक कार्यक्रम में कहा, "आप लोग ताली इसलिए बजा रहे हैं कि मैं चीन गया था या इसलिए कि वापस आ गया?"
यह बयान लंबे समय तक चर्चा में रहा।
भारत-चीन के रिश्तों का दूसरा चेहरा
भारत और चीन सार्वजनिक तौर पर लगातार टकराव की स्थिति में दिखते हैं। सीमा विवाद, व्यापार तनाव और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार जारी है। लेकिन दूसरी तरफ कुछ मामलों में दोनों देशों के हित एक-दूसरे से टकराने के बजाय मिलते भी दिखाई देते हैं।
दोनों देश कट्टर इस्लामी नेटवर्क और बंगाल की खाड़ी में बाहरी सैन्य प्रभाव को लेकर सतर्क रहते हैं।
म्यांमार में सक्रिय अराकान आर्मी को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं होती रही हैं। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत और चीन दोनों वहां स्थिरता चाहते हैं, क्योंकि अस्थिरता सीधे उनके सीमाई इलाकों को प्रभावित करती है।
इसी दौरान चिटगांव हिल ट्रैक्ट्स और कलादान परियोजना के आसपास भी गतिविधियां बढ़ने लगीं। भारत इन इलाकों को अपनी पूर्वोत्तर सुरक्षा और समुद्री पहुंच के लिए बेहद अहम मानता है।
NIA की कार्रवाई और ड्रोन नेटवर्क का खुलासा
मार्च 2026 में भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी NIA ने कई विदेशी नागरिकों को हिरासत में लिया। इनमें यूक्रेन के नागरिक और अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरन वैनडाइक का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा।
वैनडाइक खुद को युद्ध संवाददाता और सुरक्षा विशेषज्ञ बताते रहे थे। उन्होंने "Sons of Liberty International" नाम का संगठन बनाया था, जो दुनिया के संघर्ष क्षेत्रों में स्थानीय समूहों को प्रशिक्षण देने का काम करता है।
जांच एजेंसियों को शक था कि यह नेटवर्क भारत के पूर्वोत्तर रास्ते का इस्तेमाल करते हुए म्यांमार तक ड्रोन और सैन्य उपकरण पहुंचा रहा था।
बताया गया कि विदेशी नागरिक टूरिस्ट वीजा पर भारत आए और फिर गुवाहाटी से मिजोरम की तरफ बढ़े। वहां से म्यांमार के चिन इलाके तक पहुंचने की योजना थी।
मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा पहले ही सार्वजनिक रूप से चेतावनी दे चुके थे कि विदेशी लड़ाके और पूर्व सैन्य अधिकारी म्यांमार में सक्रिय समूहों को प्रशिक्षण देने के लिए इस इलाके का इस्तेमाल कर रहे हैं।
NIA की कार्रवाई के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।
बंगाल की खाड़ी में बढ़ती अमेरिकी दिलचस्पी
इसी दौरान अमेरिका और बांग्लादेश के बीच रक्षा समझौतों को लेकर भी हलचल बढ़ी।
ACSA और GSOMIA जैसे समझौते चर्चा में आए। इन समझौतों के जरिए अमेरिका बंगाल की खाड़ी में अपनी परिचालन क्षमता बढ़ाना चाहता है।
इसका मतलब पारंपरिक बड़े सैन्य अड्डे बनाना नहीं, बल्कि बंदरगाहों, ईंधन आपूर्ति और लॉजिस्टिक पहुंच हासिल करना है।
चिटगांव और मातारबाड़ी पोर्ट इस पूरी रणनीति के केंद्र में बताए जा रहे हैं।
भारत के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। नई दिल्ली एक तरफ चीन की बढ़ती मौजूदगी से निपटना चाहती है, तो दूसरी तरफ उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि बंगाल की खाड़ी किसी बाहरी शक्ति संघर्ष का स्थायी मैदान न बन जाए।
दक्षिण एशिया अब सिर्फ भूगोल नहीं रहा।
यह दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच चल रही खुफिया, सामरिक और नैरेटिव आधारित जंग का सबसे संवेदनशील मोर्चा बन चुका है।
(जारी रहेगा...)
लेख
प्रियांश पांडेय