भारत की समुद्री शक्ति का विस्तार

नीलगिरि, संध्यायक और अर्नाला जैसी परियोजनाएं बताती हैं कि भारत समुद्री शक्ति को केवल हथियारों नहीं, बल्कि तकनीक, स्वदेशी निर्माण और रणनीतिक तैयारी से भी जोड़ रहा है।

The Narrative World    14-Jul-2026   
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भारत की समुद्री सुरक्षा केवल बड़े युद्धपोतों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि ऐसी संतुलित नौसैनिक क्षमता पर टिकी है जो समुद्र की हर चुनौती का सामना कर सके। इसी सोच के तहत भारतीय नौसेना ने नीलगिरि, संध्यायक और अर्नाला श्रेणी के स्वदेशी युद्धपोतों को विकसित किया है। हाल ही में INS दुनागिरि, INS संशोधक, INS अग्रय और INS महेंद्रगिरि के शामिल होने से नौसेना की ताकत कई गुना बढ़ी है। इन युद्धपोतों का निर्माण भारत में हुआ है और इनमें स्वदेशी तकनीक का व्यापक उपयोग किया गया है। इससे आत्मनिर्भर भारत अभियान को नई मजबूती मिली है और देश की रक्षा निर्माण क्षमता भी मजबूत हुई है।
 
भारत हिंद महासागर क्षेत्र में प्रमुख सुरक्षा प्रदाता की भूमिका निभाता है। देश की लगभग 11,098 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा, करीब 24 लाख वर्ग किलोमीटर का विशेष आर्थिक क्षेत्र और समुद्री मार्गों से होने वाला लगभग 90 प्रतिशत व्यापार नौसेना की जिम्मेदारी है। इस विशाल दायित्व को निभाने के लिए भारतीय नौसेना ने बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था तैयार की है। पिछले एक महीने में चार नई स्वदेशी नौसैनिक परियोजनाओं के शामिल होने से यह व्यवस्था और प्रभावी हुई है।
 
सबसे आगे नीलगिरि श्रेणी के स्टेल्थ फ्रिगेट समुद्री युद्ध क्षमता को मजबूत करते हैं। ये युद्धपोत प्रोजेक्ट 17A के तहत तैयार हुए हैं और आधुनिक युद्ध के लिए विकसित किए गए हैं। इनके बाद संध्यायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत समुद्र की गहराई, समुद्री तल और जलक्षेत्र का सटीक नक्शा तैयार करते हैं। वहीं तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए अर्नाला श्रेणी के एंटी सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट तैनात रहते हैं, जो उथले समुद्री इलाकों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करने की क्षमता रखते हैं। जरूरत पड़ने पर ये तीनों श्रेणियां राहत एवं बचाव अभियान और मानवीय सहायता कार्यों में भी हिस्सा लेती हैं।
 
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21 जून 2026 को कोलकाता में भारतीय नौसेना ने एक साथ तीन स्वदेशी युद्धपोतों को शामिल किया। इनमें नीलगिरि श्रेणी का INS दुनागिरि, संध्यायक श्रेणी का INS संशोधक और अर्नाला श्रेणी का INS अग्रय शामिल हैं। इन तीनों को नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया और गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड ने बनाया। इसके बाद 11 जुलाई 2026 को विशाखापत्तनम में नीलगिरि श्रेणी के छठे युद्धपोत INS महेंद्रगिरि को भी नौसेना में शामिल किया गया।
 
नीलगिरि श्रेणी के स्टेल्थ फ्रिगेट भारतीय नौसेना की सतही युद्ध क्षमता की रीढ़ माने जाते हैं। ये विमानवाहक पोतों की सुरक्षा करते हैं, समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा करते हैं और दूरदराज के समुद्री क्षेत्रों में भारत की मौजूदगी मजबूत बनाते हैं। आधुनिक हथियारों, उन्नत सेंसर और हेलीकॉप्टर संचालन की सुविधा से लैस ये युद्धपोत दुश्मन की नजर से बचने के लिए विशेष तकनीक अपनाते हैं। इनकी रडार, तापीय और ध्वनि पहचान बहुत कम होती है, जिससे दुश्मन इन्हें आसानी से नहीं खोज पाता।
 
प्रोजेक्ट 17A के तहत सात नीलगिरि श्रेणी के स्टेल्थ फ्रिगेट बनाए जा रहे हैं। इनमें INS नीलगिरि, हिमगिरि, तारागिरि, उदयगिरि, दुनागिरि, महेंद्रगिरि और निर्माणाधीन विंध्यगिरि शामिल हैं। मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड ने चार और कोलकाता स्थित GRSE तीन युद्धपोतों का निर्माण किया है। लगभग 149 मीटर लंबे और 6,670 टन विस्थापन वाले इन युद्धपोतों में ब्रह्मोस मिसाइल, मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली, क्लोज इन वेपन सिस्टम, उन्नत रडार, सोनार और हेलीकॉप्टर संचालन की सुविधा मौजूद है। ये अधिकतम 28 नॉट की गति से चल सकते हैं।
 
स्टेल्थ तकनीक का उद्देश्य युद्धपोत को अदृश्य बनाना नहीं बल्कि उसकी पहचान को कठिन बनाना है। युद्धपोत की ढलानदार सतहें रडार तरंगों को दूसरी दिशा में मोड़ देती हैं, जबकि विशेष कोटिंग रडार संकेतों को अवशोषित कर लेती है। इससे दुश्मन के लिए उसकी सही स्थिति का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।
 
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दूसरी ओर संध्यायक श्रेणी के सर्वेक्षण पोत भारतीय नौसेना की हाइड्रोग्राफिक क्षमता को मजबूत करते हैं। ये समुद्र की गहराई मापते हैं, समुद्री तल का विस्तृत अध्ययन करते हैं और सुरक्षित नौवहन के लिए सटीक समुद्री चार्ट तैयार करते हैं। इनकी मदद से नौसेना, व्यापारी जहाज और ब्लू इकोनॉमी से जुड़े सभी क्षेत्र लाभ उठाते हैं। भारतीय नौसेना ने इस श्रेणी में INS संध्यायक, निर्देशाक, ईक्षक और संशोधक को शामिल किया है। हाल ही में INS संशोधक चौथे और अंतिम पोत के रूप में नौसेना का हिस्सा बना।
 
 
करीब 110 मीटर लंबे और 3,400 टन विस्थापन वाले ये पोत 18 नॉट से अधिक गति हासिल कर सकते हैं तथा 6,500 समुद्री मील तक लगातार अभियान चला सकते हैं। इनमें मल्टी बीम इको साउंडर, साइड स्कैन सोनार और स्वायत्त अंडरवाटर वाहन जैसे आधुनिक उपकरण लगे हैं। ये हेलीकॉप्टर संचालन के साथ आपातकालीन स्थिति में अस्पताल पोत की भूमिका भी निभा सकते हैं। वर्ष 2019 से 2024 के बीच भारतीय हाइड्रोग्राफरों ने 89 हजार वर्ग किलोमीटर समुद्री क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और 96 समुद्री चार्ट तैयार किए, जिनसे कई मित्र देशों को भी लाभ मिला।
 
तटीय सुरक्षा के लिए अर्नाला श्रेणी के एंटी सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट अहम भूमिका निभाते हैं। बड़े युद्धपोत उथले समुद्री क्षेत्रों में आसानी से संचालन नहीं कर पाते, इसलिए ये छोटे और तेज पोत वहां पनडुब्बियों का पता लगाकर उन्हें निशाना बनाते हैं। आठ पोतों वाली इस श्रेणी में अर्नाला, अंड्रोथ, अंजादीप, अमिनी, अभय, अग्रय, अक्षय और अजय शामिल हैं। GRSE और L&T शिपबिल्डिंग ने मिलकर इनका निर्माण किया है। समानांतर रूप से कोचीन शिपयार्ड में माहे श्रेणी के आठ और पोत तैयार हो रहे हैं, जिससे कुल संख्या 16 हो जाएगी।
 
 
करीब 77.6 मीटर लंबे और 900 टन विस्थापन वाले इन पोतों में वॉटरजेट प्रणोदन प्रणाली लगी है, जो उथले समुद्री क्षेत्रों में तेज और फुर्तीला संचालन सुनिश्चित करती है। ये 25 नॉट की गति से चल सकते हैं और हल्के टॉरपीडो, एंटी सबमरीन रॉकेट, शैलो वॉटर सोनार तथा आधुनिक कॉम्बैट मैनेजमेंट सिस्टम से लैस हैं।
 
नीलगिरि, संध्यायक और अर्नाला श्रेणी के युद्धपोत केवल नौसेना की ताकत नहीं बढ़ाते, बल्कि भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता, रोजगार, समुद्री कूटनीति और ब्लू इकोनॉमी को भी नई दिशा देते हैं। इन परियोजनाओं से भारतीय शिपयार्ड मजबूत हुए हैं, सैकड़ों MSME को काम मिला है और हजारों कुशल रोजगार सृजित हुए हैं। साथ ही सागर और महासागर जैसी समुद्री सुरक्षा पहलों को भी गति मिली है। भारत जैसे-जैसे हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है, वैसे-वैसे ये स्वदेशी युद्धपोत देश के समुद्री हितों की रक्षा करते हुए भारत को एक प्रमुख समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।