बस्तर का नया मोड़: माओवाद का पतन और उभरती अदृश्य शक्तियाँ

चार दशकों के माओवादी आतंक के कमजोर पड़ने के बाद बस्तर नए संक्रमणकाल में प्रवेश कर चुका है, जहां सामाजिक और वैचारिक चुनौतियां उभर रही हैं।

The Narrative World    16-Dec-2025
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भारत की आंतरिक सुरक्षा परिदृश्य में एक निर्णायक मोड़ स्पष्ट दिखाई दे रहा है। चार दशकों तक जंगलों, पहाड़ियों और दूरदराज़ जनजातीय बाहुल्य गांवों में हिंसा, भय और समानांतर सत्ता कायम रखने वाला माओवादी आतंक अब बस्तर सहित मध्य भारत के बड़े हिस्सों में तेज़ी से सिकुड़ रहा है।
 
सुरक्षा बलों की निरंतर कार्रवाइयों, सड़क और कैंप नेटवर्क के विस्तार, शीर्ष नेतृत्व के सफ़ाए और बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण के बाद अब सवाल केवल माओवाद के पतन का नहीं रह गया है।
 
असली प्रश्न यह है कि माओवाद के खत्म होने के बाद बस्तर में क्या होगा और क्या निकट भविष्य में आने वाली परिस्थिति नई, अधिक सूक्ष्म लेकिन कम दिखाई देने वाली शक्तियों के लिए अवसर तो नहीं बन रहा है?
 
माओवादी प्रभाव के कमजोर पड़ने के साथ बस्तर एक ऐसे संक्रमणकाल में प्रवेश कर चुका है, जहां हिंसा की तीव्रता भले कम हुई हो, लेकिन डेमोग्राफी, पहचान और साजिशों को लेकर प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं हुई है।
 
इतिहास बताता है कि जब कोई उग्रवादी आंदोलन ढहता है, तो उसके पीछे छोड़ा गया शून्य अपने आप नहीं भरता; वहां नए प्रभाव-केंद्र उभरते हैं।
 
गृह मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़े इस बदलाव को रेखांकित करते हैं। 2010 के आसपास जिन 35 जिलों को माओवादी आतंक से ‘सर्वाधिक प्रभावित’ माना जाता था, उनकी संख्या हाल के वर्षों में घटकर एकल अंक में सिमट गई है।
 
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2000 के दशक के आरंभ में जहां सक्रिय माओवादी कैडर की संख्या हज़ारों में आंकी जाती थी, वहीं 2016 के बाद से नेतृत्व-स्तर पर लगातार चोट, तकनीक आधारित अभियानों और राज्य-केंद्र समन्वय ने संगठन की रीढ़ तोड़ दी।
 
छत्तीसगढ़ में सड़क और सुरक्षा कैंपों का वह विस्तार, जिसे माओवादी वर्षों तक बलपूर्वक रोकते रहे, अब जमीनी सच्चाई बन चुका है। आत्मसमर्पण नीति के तहत बड़ी संख्या में पूर्व कैडर मुख्यधारा में लौटे हैं।
 
यह गिरावट केवल सैन्य नहीं रही; वैचारिक स्तर पर भी माओवाद की पकड़ कमजोर पड़ी है। ‘जल-जंगल-जमीन’ का नारा, जिसे लंबे समय तक माओवादियों द्वारा प्रसारित कर जनजातीय अधिकारों की आवाज़ के रूप में पेश किया गया, लेकिन वास्तव में जबरन वसूली, समानांतर न्याय, विकास अवरोध और हिंसा का औज़ार मात्र था। इसके परिणामस्वरूप स्थानीय समाज में भरोसे का क्षरण भी हुआ।
 
 
दुनिया के अन्य संघर्ष क्षेत्रों का अनुभव बताता है कि उग्रवाद का अंत अक्सर किसी स्थायी शांति की गारंटी नहीं होता। कोलंबिया में एफएआरसी के पतन के बाद आपराधिक गिरोहों का उभार, पेरू में शाइनिंग पाथ के कमजोर पड़ने के बाद नशा-तस्करी नेटवर्कों की मजबूती और श्रीलंका में एलटीटीई के बाद प्रवासी-आधारित राजनीतिक दबाव तंत्र इसका उदाहरण हैं।
 
बस्तर के संदर्भ में भी यही आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि राज्य की मौजूदगी केवल सुरक्षा तक सीमित रही और सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्निर्माण पीछे छूट गया, तो नए प्रभाव-केंद्र पनप सकते हैं।
 
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इस उभरते परिदृश्य में पहला संभावित खिलाड़ी स्थानीय अलगाववादी समूह हैं। हाल के वर्षों में बस्तर के कुछ क्षेत्रों में "समुदाय-आधारित" प्रतिरोध सामने आया है। कई गांवों में अलग राज्य, ऑटोनोमस रीजन से लेकर अलग धर्म-कोड तक के मामले में विरोध किया है।
 
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि ऐसे समूहों को लोकतांत्रिक और संवैधानिक ढांचे के भीतर संस्थागत रूप से निष्क्रिय नहीं किया गया, तो वे अनजाने में समानांतर शक्ति संरचनाओं का रूप ले सकते हैं।
 
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू धार्मिक नेटवर्कों की भूमिका को लेकर उभरती बहस है। बस्तर सहित जनजातीय पट्टी में ईसाई मिशनरी गतिविधियां दशकों से मौजूद रही हैं, लेकिन माओवादी प्रभुत्व के कमजोर पड़ने के साथ इनकी पहुंच और गति पर नई निगाहें टिकी हैं।
 
प्रशासनिक और शोध स्तर पर यह तर्क दिया जा रहा है कि कुछ क्षेत्रों में सेवा-आधारित गतिविधियों, डिजिटल माध्यमों और विदेशी चर्च नेटवर्कों के सहयोग से धार्मिक प्रभाव बढ़ा है।
 
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यह विषय अत्यंत संवेदनशील है और इसमें संतुलन अनिवार्य है। जहां एक ओर स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सेवाएं इनका मुख्य मुखौटा हैं, वहीं इसका षड्यंत्र पहचान-परिवर्तन और स्थानीय सांस्कृतिक प्रथाओं का क्षरण दीर्घकालिक सामाजिक विभाजन की जमीन तैयार कर सकता है। इसी पृष्ठभूमि में राज्य सरकारें अवैध या प्रलोभन-आधारित धर्मांतरण पर कानूनी निगरानी की बात करती हैं।
 
तीसरा और सबसे जटिल आयाम विदेशी-वित्तपोषित एनजीओ की भूमिका से जुड़ा है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम के तहत भारत में हर वर्ष बड़ी मात्रा में धनराशि आती है।
 
2017 से 2023 के बीच नियम उल्लंघन के आधार पर बड़ी संख्या में एनजीओ के पंजीकरण रद्द किए जाना सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है। सरकार इसे पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में कदम बताती है।
 
बस्तर के संदर्भ में मूल सवाल यह है कि क्या कुछ संगठन अधिकार-विमर्श के नाम पर स्थानीय प्राथमिकताओं से कटे एजेंडे आगे बढ़ाते हैं। रिपोर्टिंग, मुकदमेबाज़ी और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नैरेटिव निर्माण वैध उपकरण हैं, लेकिन जब ये सुरक्षा और विकास के संतुलन को प्रभावित करने लगते हैं, तो टकराव स्वाभाविक हो जाता है।
 
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इसी संदर्भ में माओवादी-ईसाई-एनजीओ ‘नेटवर्क’ के आरोप सामने आते रहे हैं। कुछ सुरक्षा विश्लेषक और राजनीतिक समूह इसे एक ढीले-ढाले प्रभाव-तंत्र के रूप में देखते हैं, जिसमें माओवादी हिंसा के बाद खाली हुई जगह में वैचारिक, धार्मिक और एनजीओ-आधारित गतिविधियां समानांतर चलती हैं।
 
यह आरोप गंभीर है और इसकी जांच केवल सार्वजनिक साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकती है। यह तथ्य है कि माओवादी दस्तावेजों में ‘ओवरग्राउंड’ समर्थन की रणनीति का उल्लेख मिलता रहा है।
माओवादी हिंसा के कमजोर होने के साथ नैरेटिव की लड़ाई और तेज़ हो गई है। अब बंदूक की जगह रिपोर्ट, याचिका, डॉक्यूमेंट्री और सोशल मीडिया पोस्ट प्रभाव डालते हैं। बस्तर की जटिलता को केवल ‘सरकार बनाम जनजाति’ के फ्रेम में देखना जमीनी सच्चाई को अधूरा प्रस्तुत करता है।
 
जनजातीय समाज स्वयं विविध है, उसकी आकांक्षाएं बदली हैं और वह सुरक्षा, विकास और सांस्कृतिक संरक्षण, तीनों पर एक साथ संवाद चाहता है।
 
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विशेषज्ञ मानते हैं कि पोस्ट-इंसर्जेंसी चरण में राज्य की भूमिका सबसे निर्णायक होती है। केवल सुरक्षा ढांचे का विस्तार पर्याप्त नहीं है। स्थानीय परंपरा, संस्कृति संरक्षण, रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य में ठोस परिणाम दिखाने होंगे। आत्मसमर्पित कैडर का पुनर्वास यदि अधूरा रहा, तो उनके आपराधिक नेटवर्कों में फिसलने का जोखिम बना रहेगा।
 
बस्तर में स्थायी शांति के लिए तीन बुनियादी स्तंभों पर काम ज़रूरी है। पहला, जनजातीय समाज का वास्तविक सशक्तिकरण, जिसमें ग्राम सभाएं, परंपरागत संस्थाएं और स्थानीय नेतृत्व केंद्र में हों।
 
 
दूसरा, कानूनी और पारदर्शी नागरिक समाज, जहां एनजीओ और धार्मिक संस्थाएं स्थानीय सहमति और कानून के दायरे में काम करें। तीसरा, संतुलित नैरेटिव, जिसमें उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों को ईमानदारी से सामने रखा जाए।
 
माओवाद का पतन भारत के लिए एक बड़ी सुरक्षा उपलब्धि है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है। बस्तर का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि इस बस्तर का नेतृत्व स्थानीय स्वाभिमान और लोकतांत्रिक विकास करता है या नई, अदृश्य शक्तियां। इतिहास यही बताता है कि खाली जगहें कभी खाली नहीं रहतीं। सवाल यह नहीं कि कौन आएगा, बल्कि यह है कि किसके नियमों पर और किसके हित में।