बैलाडीला में बंदूक की राजनीति

सुरक्षा दबाव से कमजोर माओवादी अब जन आंदोलनों और राजनीतिक मंचों के जरिए फिर पकड़ बनाने की कोशिश में।

    13-Jan-2026
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दंतेवाड़ा का बैलाडीला क्षेत्र एक बार फिर अस्थिरता और टकराव की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। केंद्र सरकार ने बैलाडीला रिजर्व फॉरेस्ट में लौह अयस्क खनन के विस्तार के लिए पर्यावरणीय मंजूरी की सिफारिश की है। इसके तहत 874.924 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग का रास्ता साफ हुआ है। राज्य की सरकारी कंपनी NMDC इस क्षेत्र में खनन गतिविधियों को आगे बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसी फैसले के बाद इलाके में विरोध की सियासत तेज हो गई है।
 
दंतेवाड़ा में हाल ही में हुई एक सार्वजनिक बैठक ने हालात की गंभीरता को उजागर कर दिया। इस बैठक में पूर्व विधायक मनीष कुंजाम मंच पर मौजूद थे। उनके ठीक बगल में बैठे एक व्यक्ति ने खुले मंच से भड़काऊ और धमकी भरा बयान दिया। उसने साफ शब्दों में कहा कि अगर बैलाडीला के पहाड़ को छेड़ा गया तो लोग बंदूक उठाने में एक दिन भी नहीं लगाएंगे। उसने यह भी कहा कि जिन माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, उन्होंने केवल नाम के लिए समर्पण किया है। इतना ही नहीं, उसने नेपाल जैसे विद्रोह की बात कहकर खुले तौर पर हिंसा का आह्वान किया। मंच पर मनीष कुंजाम की मौजूदगी और उनके पास बैठकर दिया गया यह बयान कई सवाल खड़े करता है।
 
 
यह घटनाक्रम साफ दिखाता है कि दंतेवाड़ा और बस्तर में माओवादी अब सीधे जंगल से नहीं, बल्कि राजनीतिक मंचों के सहारे अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रहे हैं। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई ने माओवादी संगठन की कमर तोड़ दी है। कई बड़े माओवादी ढेर हुए हैं और बड़ी संख्या में कैडर ने आत्मसमर्पण किया है। इसी दबाव ने माओवादियों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। अब वे वैकल्पिक राजनीति और तथाकथित जन आंदोलनों के जरिए अपनी खोई हुई ताकत, प्रभाव और नियंत्रण फिर से हासिल करना चाहते हैं।
 
बैलाडीला में खनन, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी विकास योजनाएं आगे बढ़ती हैं तो माओवादियों का पूरा ढांचा टूट जाएगा। विकास से जनजाति मुख्यधारा से जुड़ेंगे और माओवादी प्रभाव अपने आप खत्म हो जाएगा। यही वजह है कि माओवादी और उनका शहरी नेटवर्क जनजातियों को डराने और भड़काने में जुटा है। हालिया बैठक में बंदूक उठाने की खुली धमकी इसी साजिश का हिस्सा नजर आती है।
 
 
इस पूरे घटनाक्रम में बस्तरिया राज मोर्चा की भूमिका भी संदेह के घेरे में आती है। इस संगठन का नेतृत्व मनीष कुंजाम कर रहे हैं। कुंजाम पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) से विधायक रह चुके हैं और 1990 से 1998 तक कोंटा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वर्ष 2024 में उन्होंने पार्टी छोड़कर बस्तर के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर नया मंच खड़ा किया। यह मंच जनजाति हितों की बात करता है, लेकिन इसके तेवर लगातार विकास विरोधी रहे हैं।
 
बस्तरिया राज मोर्चा राज्य हस्तक्षेप का विरोध करता है और स्वायत्तता की मांग करता है। संगठन स्कूलों में बंगाली भाषा लागू करने को सांस्कृतिक दबाव बताकर विरोध करता है। इन मुद्दों की आड़ में यह मंच सरकार की विकास योजनाओं को लगातार निशाना बनाता है। मनीष कुंजाम तेंदूपत्ता घोटाले जैसे मामलों में बयानबाजी करते रहे हैं और माओवादी गतिविधियों पर भी खुलकर बोलते रहे हैं। मौजूदा हालात में उनका राजनीतिक मंच माओवादी सोच को वैधता देने की कोशिश करता दिखता है।
 
बैलाडीला क्षेत्र में खनन से रोजगार, बुनियादी ढांचा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। यही कारण है कि माओवादी और उनसे जुड़े राजनीतिक चेहरे विकास को रोकने के लिए डर और धमकी का सहारा ले रहे हैं।
 
फिलहाल बैलाडीला रिजर्व फॉरेस्ट और आसपास के गांवों में तनाव का माहौल बना हुआ है। सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। दंतेवाड़ा में जो कुछ हो रहा है, वह साफ तौर पर माओवादी राजनीति का नया चेहरा दिखाता है, जहां बंदूक की धमकी अब मंच से दी जा रही है और विकास को रोकने की पूरी कोशिश की जा रही है।
 
रिपोर्ट
शोमेन चंद्र