तेल, सत्ता और तख्तापलट: वेनेजुएला में अमेरिकी दखल के मायने?

वेनेजुएला संकट केवल एक देश की राजनीतिक उथल-पुथल नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का आईना है। यह कहानी सिर्फ वेनेजुएला की नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की सच्चाई है।

The Narrative World    04-Jan-2026   
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वेनेजुएला को लेकर सामने आई घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की तथाकथित
"नियम आधारित व्यवस्था" को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई, राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण कर अमेरिका ले जाना, वहीं साथ में मादुरो की पत्नी (जिसका तथाकथित "युद्ध अपराध" से कोई लेना-देना नहीं है) को भी वेनेजुएला से अपहृत कर ले जाना, साथ ही वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन की अटकलें और वैश्विक प्रतिक्रियाओं ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं है।


यह एक ऐसी घटना बन चुकी है, जो यह सवाल उठाती है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांत सभी देशों पर समान रूप से लागू होते हैं, या फिर अमेरिका जैसे राष्ट्रों के लिए इनके मायने अलग हैं।


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वेनेजुएला में हालिया घटनाक्रम को अमेरिका ने लोकतंत्र और कानून व्यवस्था के नाम पर उचित ठहराने की कोशिश की है। लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में इसे एक संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ खुला हस्तक्षेप माना जा रहा है। यह पहली बार नहीं है जब किसी देश के नेतृत्व को हटाने या कमजोर करने के लिए ऐसे कदम उठाए गए हों। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार यह सब उस दौर में हो रहा है, जब वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है और एकध्रुवीय व्यवस्था पर पहले से अधिक सवाल खड़े हो रहे हैं।


इस ताजा घटनाक्रम को समझने के लिए वेनेजुएला की पृष्ठभूमि में जाना जरूरी है। वेनेजुएला कभी लैटिन अमेरिका के सबसे समृद्ध देशों में गिना जाता था। विशाल तेल भंडार, मजबूत मुद्रा और अपेक्षाकृत स्थिर अर्थव्यवस्था ने इसे लंबे समय तक क्षेत्रीय शक्ति बनाए रखा।


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बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक इसकी प्रति व्यक्ति आय कई पड़ोसी देशों के लिए ईर्ष्या का विषय थी। लेकिन यह समृद्धि अत्यधिक रूप से तेल पर निर्भर थी, और यही निर्भरता बाद में इसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।


ह्यूगो चावेज के सत्ता में आने के बाद वेनेजुएला की राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने लगी। सामाजिक न्याय, समानता और गरीबी उन्मूलन के नाम पर अपनाई गई नीतियों ने शुरुआती दौर में लोकप्रियता जरूर दिलाई, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक संतुलन को कमजोर कर दिया।


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तेल से होने वाली आय को उत्पादन बढ़ाने और विविधीकरण में लगाने के बजाय व्यापक सब्सिडी और लोकलुभावन योजनाओं में खर्च किया गया। उद्योगों का राष्ट्रीयकरण बिना पर्याप्त प्रबंधन और पूंजी के किया गया, जिससे उत्पादन क्षमता गिरती चली गई।


कृषि क्षेत्र में भूमि सुधार और मूल्य नियंत्रण जैसी नीतियों का असर भी नकारात्मक रहा। जमीन के पुनर्वितरण और सरकारी हस्तक्षेप से उत्पादन घटा और खाद्य आत्मनिर्भरता कमजोर हुई। जब बाजार की वास्तविकताओं की अनदेखी कर कीमतें तय की गईं, तो व्यापार और आपूर्ति दोनों प्रभावित हुए।


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धीरे धीरे आवश्यक वस्तुएं दुर्लभ होती चली गईं और आम जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में गिरावट आई, तो वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था के पास झटके को सहने की क्षमता नहीं बची थी। राजस्व घटा, सरकारी खर्च जारी रहा और घाटा बढ़ता गया। इस स्थिति से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर मुद्रा छापी गई, जिससे महंगाई नियंत्रण से बाहर हो गई।


अत्यधिक महंगाई ने लोगों की जीवन भर की बचत को लगभग बेकार कर दिया और व्यापक गरीबी फैल गई। लेकिन इस आंतरिक आर्थिक विफलता की कहानी तब अधूरी रह जाती है, जब इसमें बाहरी दबावों की भूमिका को नजरअंदाज किया जाता है।


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अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने संकट को कई गुना बढ़ा दिया। तेल निर्यात पर रोक, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली से अलगाव और निवेश पर अनिश्चितता ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था की सांस घोंट दी। इन प्रतिबंधों का असर सत्ता में बैठे लोगों से अधिक आम नागरिकों पर पड़ा, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी पहले ही संकट में थी।


अब वर्तमान की स्थिति देखें तो भी तेल इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, जो वैश्विक ऊर्जा राजनीति में उसे रणनीतिक महत्व देता है। अमेरिका, जो लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में प्रभाव बनाए रखना चाहता है, वेनेजुएला के चीन और रूस जैसे देशों के साथ बढ़ते सहयोग को अपने हितों के खिलाफ मानता रहा है।


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जैसे-जैसे वेनेजुएला ने वैकल्पिक साझेदारों की ओर रुख किया, वैसे वैसे उस पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव तेज होता गया। यह संघर्ष केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था और डॉलर आधारित प्रणाली से भी जुड़ा है। जिन देशों ने अमेरिकी नीति से अलग रास्ता अपनाने की कोशिश की, उन्हें आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए कमजोर किया गया। वेनेजुएला इसका स्पष्ट उदाहरण है, जहां वित्तीय पहुंच सीमित होते ही पूरी आर्थिक संरचना चरमरा गई।


इस पूरे घटनाक्रम में नैरेटिव अर्थात विमर्श की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों और मीडिया में वेनेजुएला की छवि को लंबे समय से एक विशेष ढांचे में पेश किया गया। विपक्ष को लोकतांत्रिक पीड़ित और सरकार को निरंकुश के रूप में दिखाया गया। इसके बाद हस्तक्षेप को लोकतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर उचित ठहराया गया। यह रणनीति नई नहीं है, लेकिन बदलते वैश्विक माहौल में इसके प्रति संदेह बढ़ रहा है।


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आज दुनिया की प्रतिक्रिया पहले जैसी एकतरफा नहीं रही। रूस और चीन ने अमेरिकी कदमों की खुली आलोचना की है। लैटिन अमेरिका के कई देशों ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। ग्लोबल साउथ के देशों में यह चिंता गहरी हो रही है कि अगर इस तरह के हस्तक्षेप को सामान्य मान लिया गया, तो कोई भी देश भविष्य में सुरक्षित नहीं रहेगा। वहीं फ्रांस की प्रतिक्रिया दिलचस्प रही है, जहाँ हर बात में अमेरिका का समर्थन करने वाले फ्रांस ने अमेरिकी कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। फ़्रांसीसी विदेश मंत्री ने कहा कि "किसी संप्रभु राष्ट्र पर बाहर से सत्ता परिवर्तन थोपना वैश्विक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है।"


इसी संदर्भ में भारत की भूमिका और दृष्टिकोण भी विशेष महत्व रखते हैं। भारत ने लंबे समय से संप्रभुता के सम्मान और हस्तक्षेप से दूरी की नीति अपनाई है। वह किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय संतुलित और स्वतंत्र रुख बनाए रखता है। यही कारण है कि भारत को कई विकासशील देश भरोसेमंद साझेदार के रूप में देखते हैं, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीति अनिश्चितता से भरी हुई है।


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वेनेजुएला का संकट अंततः एक चेतावनी के रूप में सामने आता है। यह दिखाता है कि दुनिया अब केवल लोकतंत्र और तानाशाही की बहस में नहीं बंटी है, बल्कि हस्तक्षेप और संप्रभुता के सवाल पर खड़ी है। यह याद दिलाता है कि नैतिकता के दावे अक्सर शक्ति राजनीति के औजार बन जाते हैं। अगर बहुध्रुवीय संतुलन विकसित नहीं हुआ, तो आने वाले वर्षों में ऐसे संकट और गहरे हो सकते हैं।


वेनेजुएला आज एक ऐसे प्रयोग का केंद्र बन चुका है, जिसका असर केवल उसी देश तक सीमित नहीं रहेगा। यह तय करेगा कि भविष्य में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था किस दिशा में जाएगी। असली सवाल यही है कि क्या दुनिया अब ताकत को बिना सवाल किए स्वीकार करेगी, या फिर नियमों और संप्रभुता की वास्तविक रक्षा की मांग करेगी।


शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार