अबूझमाड़ में बारूद से रंग तक का सफर: लाल आतंक से मुक्ति की ओर बस्तर

दशकों तक नक्सल हिंसा के साए में रहने वाला अबूझमाड़ अब धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है। अबूझमाड़ के भीतर इस वर्ष पहली बार ग्रामीणों ने खुले तौर पर होली मनाई। सुरक्षा अभियानों, नए कैंपों और विकास कार्यों के बीच बस्तर के इस दुर्गम इलाके में लौटती सामाजिक जीवन की झलक पढ़िए इस रिपोर्ट में।

The Narrative World    05-Mar-2026   
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दशकों तक नक्सली हिंसा का दंश झेल रहे अबूझमाड़ में इस वर्ष होली का दृश्य अलग था। जहां कभी बंदूक और बारूदी सुरंगों का भय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर छाया रहता था, वहीं इस बार रंग और उत्सव में डूबा दिखाई दिया। ग्रामीण, बच्चे और सुरक्षाबल एक साथ होली के रंगों में शामिल हुए। यह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं था, बल्कि उस बदलाव का संकेत भी था जो हाल के वर्षों में बस्तर के सबसे दुर्गम इलाकों में धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है।
 
केंद्र और राज्य सरकार की संयुक्त रणनीति के तहत चल रहे सुरक्षा अभियानों, नए सुरक्षा कैंपों की स्थापना और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार ने अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों में सामाजिक जीवन को फिर से गति देना शुरू किया है। लंबे समय तक नक्सलियों के प्रभाव में रहे इस इलाके में होली का खुला उत्सव इस बात का संकेत माना जा रहा है कि लाल आतंक की पकड़ कमजोर पड़ रही है।
 
अबूझमाड़ का नाम लंबे समय तक नक्सलियों के सबसे सुरक्षित ठिकानों में लिया जाता रहा है। घने जंगल, दुर्गम पहाड़ियां और प्रशासनिक पहुंच की कमी ने इस क्षेत्र को वर्षों तक नक्सली गतिविधियों का केंद्र बनाए रखा। यहां न केवल हथियारबंद दस्ते सक्रिय रहते थे बल्कि माओवादियों की फर्ज़ी जन अदालतें, जबरन वसूली और हिंसक दंड जैसी घटनाएं भी सामने आती रही हैं।
 
माओवादी आतंक के कारण स्थानीय ग्रामीणों के लिए त्योहारों और सामुदायिक आयोजनों का सार्वजनिक रूप से आयोजन करना लगभग असंभव था। कई गांवों में त्योहार मनाने तक पर अनौपचारिक प्रतिबंध जैसा माहौल रहता था। नक्सली प्रभाव वाले क्षेत्रों में पारंपरिक उत्सवों को अक्सर हतोत्साहित किया जाता था, जिसके कारण लंबे समय तक सामान्य सामाजिक जनजीवन बाधित रहा।
 
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकार ने बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद से निपटने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। इसमें सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने के साथ साथ नए कैंपों की स्थापना, सड़क और संचार नेटवर्क का विस्तार तथा आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को मजबूत करना शामिल है।
 
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में भी इसी रणनीति के तहत लगातार सुरक्षा कैंप स्थापित किए जा रहे हैं। जनवरी 2026 में जटवर गांव में एक नया सुरक्षा और जनसुविधा कैंप स्थापित किया गया, जिसका उद्देश्य नक्सल विरोधी अभियानों के साथ साथ सड़क निर्माण और अन्य विकास कार्यों को सुरक्षा प्रदान करना है। इन कैंपों की मौजूदगी से आसपास के गांवों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार जैसी सुविधाओं की पहुंच भी धीरे-धीरे बढ़ रही है।
 
स्थानीय प्रशासन का कहना है कि पिछले कुछ समय में नारायणपुर जिले के कई इलाकों में सुरक्षा बलों की स्थायी मौजूदगी बढ़ी है। इससे ग्रामीणों में सुरक्षा का भरोसा बना है और सार्वजनिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी बढ़ी है। जिन गांवों में पहले सामुदायिक आयोजन मुश्किल थे, वहां अब त्योहार और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होने लगे हैं।
 
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अबूझमाड़ का कुतुल गांव लंबे समय तक नक्सली प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। यहां तक पहुंचना भी कभी प्रशासन और सुरक्षा बलों के लिए चुनौती था। इस वर्ष होली के अवसर पर गांव में ढोल नगाड़ों की आवाज, बच्चों की हंसी और रंग गुलाल के बीच ग्रामीणों ने उत्सव मनाया।
 
गांव के रामकृष्ण मिशन आश्रम के विद्यार्थी हाथों में गुलाल लेकर घर-घर पहुंचे और बुजुर्गों से आशीर्वाद लिया। ग्रामीणों के अनुसार पहले नक्सली प्रभाव के कारण कोई भी त्योहार खुलकर नहीं मनाया जाता था और गांव में लगातार भय का माहौल बना रहता था। सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित होने और सड़क निर्माण जैसे कार्यों के बाद हालात में बदलाव दिखाई देने लगा है।
 
स्थानीय शिक्षकों का कहना है कि कुछ वर्ष पहले तक गांव की रातें सन्नाटे और भय में गुजरती थीं। अब लोग सामान्य जीवन की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं। बच्चों का स्कूल जाना, ग्रामीणों का सामूहिक कार्यक्रमों में शामिल होना और त्योहारों का आयोजन इस बदलाव के संकेत हैं।
 
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बस्तर शांति समिति के सदस्य जयराम दास का कहना है कि बस्तर में जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह केवल सुरक्षा अभियानों का परिणाम नहीं बल्कि समाज के भीतर लौटते विश्वास का संकेत है। उनके अनुसार जिन गांवों में कभी नक्सलियों के भय से लोग खुले तौर पर अपना पर्व तक नहीं मना पाते थे, वहीं आज होली जैसे उत्सव सामूहिक रूप से मनाए जा रहे हैं। जयराम दास कहते हैं कि जब गांवों में बच्चे बेखौफ खेलते हैं और लोग रंगों के साथ त्योहार मनाते हैं, तो यह बताता है कि बस्तर धीरे-धीरे हिंसा की छाया से बाहर निकलकर शांति और सामान्य जीवन की ओर बढ़ रहा है।
 
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश से नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा निर्धारित की है। उन्होंने कई अवसरों पर कहा है कि माओवाद ने समाज को में हिंसा और विनाश को बढ़ावा दिया है। सुरक्षा बलों की कार्रवाई, खुफिया समन्वय और राज्यों के बीच बेहतर सहयोग के कारण नक्सली नेटवर्क कमजोर हुआ है।
 
 
सुरक्षा विश्लेषकों के अनुसार पिछले दो वर्षों में नक्सलियों की संख्या और उनके प्रभाव क्षेत्र दोनों में कमी आई है। एक समय देश के कई राज्यों में फैले रेड कॉरिडोर का दायरा अब सिमटकर कुछ सीमित क्षेत्रों तक रह गया है।
 
नक्सलवाद के खिलाफ कार्रवाई के साथ साथ आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति भी सरकार की रणनीति का हिस्सा है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता, आवास और रोजगार प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है ताकि वे सामान्य जीवन में लौट सकें।
 
मुख्यधारा में लौटे कई पूर्व नक्सलियों का कहना है कि संगठन के भीतर रहते हुए त्योहारों या पारिवारिक जीवन के लिए कोई स्थान नहीं होता था। हिंसक गतिविधियों के बीच सामान्य सामाजिक जीवन लगभग समाप्त हो जाता था। मुख्यधारा में लौटने के बाद वे पहली बार अपने परिवारों के साथ त्योहार मनाने का अनुभव कर रहे हैं।
 
 
बस्तर क्षेत्र में बदलाव के संकेत अन्य पहलों में भी दिखाई दे रहे हैं। कुतुल गांव में मनाई गई होली को स्थानीय लोग इसी बदलाव का प्रतीक मान रहे हैं। दशकों तक हिंसा और भय के साए में रहने वाले इस इलाके में जब बच्चे बेखौफ होकर रंगों के साथ खेलते नजर आते हैं, तो यह संकेत मिलता है कि हालात धीरे धीरे बदल रहे हैं।
 
विशेषज्ञों का मानना है कि नक्सलवाद के खिलाफ संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन बस्तर के कई हिस्सों में जो सामाजिक और प्रशासनिक बदलाव दिखाई दे रहे हैं, वे आने वाले समय की दिशा तय कर सकते हैं। कुतुल की यह होली उसी बदलते परिदृश्य की एक झलक मानी जा रही है।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार