अमेरिका और इजराइल के
दावों के अनुसार उनके हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए। अमेरिकी प्रशासन ने इस अभियान को ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ नाम दिया है। इजराइली प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक बयानों में संकेत दिया कि हमलों का लक्ष्य ईरान की शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व संरचना को ख़त्म करना था। कुछ घंटों बाद ईरानी सरकारी मीडिया ने खामेनेई की मौत की पुष्टि करते हुए उन्हें ‘शहीद’ बताया और राष्ट्रीय शोक की घोषणा की। यदि यह पुष्टि अंतिम रूप से स्थापित होती है, तो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार ईरान का सर्वोच्च पद रिक्त हुआ है।
तेहरान स्थित खामेनेई के कार्यालय परिसर पर हमले के बाद जारी सैटेलाइट तस्वीरों में व्यापक क्षति दिखाई दे रही है। अमेरिकी रक्षा सूत्रों ने कहा कि अभियान का उद्देश्य केवल सैन्य ठिकानों को निशाना बनाना नहीं था, बल्कि कमांड और कंट्रोल संरचना को निष्क्रिय करना भी था। इजराइल ने सामरिक विवरण सार्वजनिक नहीं किए, लेकिन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि ईरान की आक्रामक क्षमताओं को गंभीर झटका दिया गया है।
हालाँकि अभी घटनाक्रम की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय पुष्टि सीमित है। संयुक्त राष्ट्र ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। लेकिन तेहरान से जारी आधिकारिक शोक संदेश और राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा संकेत देती है कि ईरान की सत्ता ने खामेनेई की मृत्यु को स्वीकार कर लिया है। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में सर्वोच्च नेता संवैधानिक रूप से सबसे शक्तिशाली पद है। राष्ट्रपति और संसद निर्वाचित संस्थाएं हैं, लेकिन अंतिम अधिकार धार्मिक नेतृत्व के पासही केंद्रित रहता है।
ईरान के संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत सर्वोच्च नेता खामेनेई के निधन की स्थिति में एक अस्थायी परिषद शासन संभालती है। इसमें राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल का एक प्रतिनिधि शामिल होता है। इसके बाद 88 सदस्यीय असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स नया सर्वोच्च नेता चुनती है। यह प्रक्रिया गोपनीय होती है और धार्मिक योग्यता तथा राजनीतिक समर्थन के आधार पर निर्णय लिया जाता है। 1989 में आयतुल्ला रुहोल्ला खुमैनी के निधन के बाद खामेनेई का चयन इसी प्रक्रिया से हुआ था।
संभावित उत्तराधिकारियों को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। न्यायपालिका प्रमुख गुलाम हुसैन मोहसेनी एजई, खुमैनी परिवार से जुड़े हसन खुमैनी और खामेनेई के पुत्र मोजतबा खामेनेई के नाम चर्चा में हैं। अली लारीजानी का भी उल्लेख हो रहा है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में सक्रिय रहे हैं और परमाणु वार्ताओं में भूमिका निभा चुके हैं। हालांकि अंतिम निर्णय असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के भीतर ही होगा और सार्वजनिक अटकलें अक्सर वास्तविक परिणामों से भिन्न साबित होती हैं।
इस संकट में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की भूमिका अहम मानी जा रही है। यह केवल सैन्य बल नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक ढांचे का भी प्रमुख स्तंभ है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने सरकारी प्रसारण में कहा कि देश ने पहले से ही संभावित परिस्थितियों के लिए तैयारी की हुई थी।
तनाव का एक महत्वपूर्ण आयाम होर्मुज जलडमरूमध्य है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत वहन करता है। ऊर्जा विश्लेषण फर्म केपलर के अनुसार जनवरी और फरवरी 2026 में भारत ने अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग आधा हिस्सा इसी मार्ग से आयात किया। यदि इस मार्ग में व्यवधान आता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज वृद्धि संभव है। वर्तमान में कीमतें लगभग 66 डॉलर प्रति बैरल हैं, जबकि विश्लेषकों का अनुमान है कि बाधा की स्थिति में यह 120 से 150 डॉलर तक पहुंच सकती हैं। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार असुरक्षा की स्थिति में तेल टैंकरों को नौसैनिक सुरक्षा के साथ चलना पड़ सकता है, जिससे आपूर्ति की गति प्रभावित होगी।
भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। ईंधन की कीमतों में वृद्धि से परिवहन लागत बढ़ेगी और महंगाई पर दबाव पड़ेगा। शेयर बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। परंपरागत रूप से ऐसे समय में सोने की मांग बढ़ती है, जिससे कीमतों में उछाल की संभावना रहती है।
अमेरिका की रणनीति को लेकर भी बहस जारी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इसे न्याय का क्षण बताया और कहा कि ईरान के लोगों को अपना भविष्य तय करने का अवसर मिलना चाहिए। हालांकि पूर्व अमेरिकी विदेश नीति अधिकारी फिलिप एच गॉर्डन का कहना है कि बिना जमीनी सैनिकों के सत्ता परिवर्तन की कल्पना जटिल और जोखिमपूर्ण है। इराक और अफगानिस्तान के अनुभव बताते हैं कि शासन परिवर्तन के बाद स्थिरता स्थापित करना कठिन होता है।
इजराइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है। यदि ईरान प्रत्यक्ष सैन्य प्रतिक्रिया के बजाय प्रॉक्सी समूहों के माध्यम से जवाब देता है, तो लेबनान, गाजा और लाल सागर क्षेत्र में तनाव बढ़ सकता है।
क्षेत्रीय प्रतिक्रिया भी उभरने लगी है। कराची में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए हैं। पश्चिम एशिया के कई शहरों में आक्रोश देखा गया है। यह संकेत है कि संघर्ष का प्रभाव सीमाओं से परे जा सकता है।
ईरान के भीतर राजनीतिक परिदृश्य जटिल बना हुआ है। हाल के वर्षों में आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक असंतोष के बावजूद कोई संगठित विपक्ष उभर नहीं पाया है। निर्वासन में रह रहे रजा पहलवी ने खामेनेई की मौत को इस्लामी शासन के अंत की शुरुआत बताया है, लेकिन उनके पास मजबूत आंतरिक ढांचा नहीं है। आईआरजीसी और धार्मिक प्रतिष्ठान की संस्थागत शक्ति को देखते हुए तत्काल सत्ता परिवर्तन की संभावना सीमित मानी जा रही है।