तेलंगाना के सिद्धिपेट जिले के तिगलाकुंटापल्ली गांव में पिछले वर्ष अक्टूबर में हुई एक अंतिम संस्कार की सभा अब
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच के दायरे में है। यह सभा प्रतिबंधित संगठन
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के केंद्रीय समिति सदस्य कट्टा रामचंद्र रेड्डी उर्फ राजू दादा के अंतिम संस्कार के अवसर पर आयोजित की गई थी। रामचंद्र रेड्डी सितंबर में
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ क्षेत्र में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था। उस समय यह घटना एक माओवादी आतंकी की मौत के बाद आयोजित श्रद्धांजलि सभा के रूप में सामने आई थी। लेकिन महीनों बाद जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कार्यक्रम में शामिल कई लोगों को नोटिस जारी किए, तो यह स्पष्ट हुआ कि मामला केवल अंतिम संस्कार में उपस्थिति का नहीं बल्कि उस व्यापक शहरी नेटवर्क का है जिसे सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से माओवादी समर्थन तंत्र के रूप में चिह्नित करती रही हैं।
जांच एजेंसियों का मानना है कि इस कार्यक्रम में शामिल लोग केवल सामाजिक कारणों से वहां मौजूद नहीं थे। वे ऐसे लोग हैं जिनकी पहचान लंबे समय से उस शहरी समर्थन ढांचे से जुड़ी रही है जिसे अक्सर
अर्बन नक्सल नेटवर्क कहा जाता है। इस नेटवर्क की भूमिका सीधे सशस्त्र गतिविधियों में भाग लेने की नहीं होती, बल्कि शहरों में वैचारिक समर्थन तैयार करने, संपर्क बनाए रखने और संगठन के लिए अनुकूल माहौल बनाने की होती है। यही कारण है कि फरवरी में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने कार्यक्रम में शामिल कम से कम दस लोगों को पूछताछ के लिए नोटिस जारी किए। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जिन्होंने उस सभा में भाषण दिए थे।
इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि रामचंद्र रेड्डी संगठन में किस भूमिका में था। वह माओवादी संगठन की केंद्रीय समिति का सदस्य था और लंबे समय से संगठन के शहरी संपर्क तंत्र से जुड़ा हुआ माना जाता था। सुरक्षा एजेंसियों की विभिन्न जांच रिपोर्टों में यह उल्लेख मिलता रहा है कि माओवादी संगठन ने वर्षों से शहरों में एक वैचारिक और संपर्क आधारित संरचना खड़ी की है। यह ढांचा सीधे हथियारबंद गतिविधियों में शामिल नहीं होता, लेकिन संगठन के लिए वैचारिक समर्थन, संपर्क और प्रचार के स्तर पर काम करता है। रामचंद्र रेड्डी को इसी शहरी संपर्क नेटवर्क के समन्वय से जुड़ा एक महत्वपूर्ण चेहरा माना जाता रहा है।
अक्टूबर में आयोजित अंतिम संस्कार सभा का महत्व इसी संदर्भ में बढ़ जाता है। जिस व्यक्ति को संगठन की रणनीतिक संरचना से जोड़ा जाता रहा हो, उसके अंतिम संस्कार में विभिन्न क्षेत्रों से लोगों का एकत्र होना केवल व्यक्तिगत संबंधों का मामला नहीं माना जाता। यह उस नेटवर्क की मौजूदगी की ओर संकेत करता है जो शहरों में बैठकर संगठन की विचारधारा को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा जारी नोटिसों से यह भी सामने आया है कि कार्यक्रम में शामिल लोगों की पृष्ठभूमि विविध है। सूत्रों के अनुसार इनमें कुछ लोग मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों से जुड़े रहे हैं, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस से संबंध रखने वाले लोग भी शामिल बताए जाते हैं। इनमें एक जिला स्तर का नेता, एक पूर्व सरपंच, एक अधिवक्ता, एक लेखक और कुछ छात्र नेता शामिल हैं। यह विविधता इस बात की ओर इशारा करती है कि माओवादी विचारधारा को शहरों में अलग अलग सामाजिक समूहों के बीच सहानुभूति दिलाने की कोशिश लंबे समय से की जाती रही है।

कार्यक्रम में दिए गए भाषण भी इस मामले को केवल एक श्रद्धांजलि सभा के दायरे से बाहर ले जाते हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी के अनुसार एक कथित माओवादी विचारक गाडे इनैया को इसी कार्यक्रम में दिए गए भाषण के आधार पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया था। एजेंसी का आरोप है कि उन्होंने सभा में उपस्थित लोगों को प्रतिबंधित संगठन के समर्थन के लिए प्रेरित किया और माओवादी आतंक जारी रखने की बात कही। यह आरोप इस संभावना को मजबूत करता है कि कार्यक्रम को केवल शोक सभा के रूप में नहीं बल्कि वैचारिक अभिव्यक्ति के मंच के रूप में भी इस्तेमाल किया गया।
इस सभा में कुछ वक्ताओं ने माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू की आलोचना भी की थी, जिन्होंने अक्टूबर में आत्मसमर्पण किया था। सतही तौर पर इसे संगठन के भीतर मतभेद के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी आलोचनाएं कई बार संगठन के प्रति वैचारिक निष्ठा को प्रदर्शित करने का तरीका भी होती हैं। आत्मसमर्पण करने वाले नेताओं की आलोचना अक्सर उस विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने के रूप में प्रस्तुत की जाती है।
माओवादी आंदोलन की रणनीति पर अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ लंबे समय से यह बताते रहे हैं कि संगठन की ताकत केवल जंगलों में मौजूद सशस्त्र दस्तों तक सीमित नहीं है। उसकी एक महत्वपूर्ण शक्ति उस शहरी समर्थन तंत्र में भी है जो वैचारिक और बौद्धिक स्तर पर उसे सहारा देता है। यही कारण है कि पिछले वर्षों में सुरक्षा एजेंसियों ने शहरी नेटवर्क की भूमिका को अधिक गंभीरता से देखना शुरू किया है। विभिन्न जांचों में यह पाया गया है कि ऐसे नेटवर्क कभी-कभी विश्वविद्यालय परिसरों, सांस्कृतिक समूहों और वैचारिक मंचों के माध्यम से भी सक्रिय रहते हैं।
इस संदर्भ में राजनीतिक दलों की भूमिका को लेकर भी समय समय पर चर्चा होती रही है। अधिकांश राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से माओवादी हिंसा का विरोध करते हैं, लेकिन कुछ घटनाएं इस विषय पर सवाल भी खड़े करती हैं। उदाहरण के तौर पर तेलंगाना की राजनीति में एक घटना का अक्सर उल्लेख किया जाता है, जब एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व माओवादी कार्यकर्ता रही सीतक्का एक माओवादी कमांडर शंकर के घर श्रद्धांजली देने पहुंची थीं, जब वह छत्तीसगढ़ में एक मुठभेड़ में मारा गया था। उस समय इस घटना को लेकर कई राजनीतिक और सुरक्षा हलकों में बहस हुई थी।
लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी व्यक्ति को अपने अतीत से आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन जब माओवादी आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों के प्रति सार्वजनिक सहानुभूति दिखाई देती है, तो यह सवाल उठता है कि क्या समाज के कुछ हिस्सों में अब भी उस हिंसक विचारधारा के प्रति नरम दृष्टिकोण मौजूद है?
रामचंद्र रेड्डी के अंतिम संस्कार के बाद सामने आया यह प्रकरण इसी व्यापक संदर्भ को उजागर करता है। यह केवल कुछ व्यक्तियों की उपस्थिति का मामला नहीं है, बल्कि उस नेटवर्क की झलक है जिसने लंबे समय से शहरों में माओवादी विचारधारा को जीवित रखने की कोशिश की है। जब जांच एजेंसियां ऐसे मामलों की जांच करती हैं तो उनका उद्देश्य केवल कानून लागू करना नहीं बल्कि उस संरचना को समझना भी होता है जिसके सहारे यह संगठन अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करता है।
भारत में माओवादी हिंसा ने दशकों तक कई राज्यों को प्रभावित किया है। इस आतंक में नागरिकों और सुरक्षा बलों के अनेक जवानों की जान गई है। ऐसे में जब किसी कार्यक्रम के माध्यम से उस विचारधारा के प्रति वैचारिक समर्थन सामने आता है, तो उसे केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होता।
तेलंगाना की यह घटना एक बड़े प्रश्न की ओर ध्यान दिलाती है कि शहरों में मौजूद वैचारिक नेटवर्क को किस तरह समझा जाए। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि यदि ऐसे नेटवर्क को केवल सामाजिक सक्रियता के नाम पर अनदेखा किया जाता है तो इससे हिंसक आंदोलन को अप्रत्यक्ष वैचारिक समर्थन मिल सकता है।
रामचंद्र रेड्डी की मौत के बाद सामने आया यह घटनाक्रम इस बात की याद दिलाता है कि माओवादी आंदोलन का संघर्ष केवल जंगलों में नहीं बल्कि विचारधारा के स्तर पर भी चलता है। और यही वह क्षेत्र है जहां शहरों में मौजूद समर्थन तंत्र की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।