चीन पर चुप्पी, भारत पर सवाल: अरुणाचल की सियांग परियोजना पर 'प्रोपेगेंडा' का खेल?

अरुणाचल की सियांग परियोजना को लेकर सामने आई रिपोर्ट कई सवाल खड़े करती है। क्या यह वास्तव में जनजातीय विरोध की पूरी तस्वीर है या एक चयनित नैरेटिव? चीन के मेगा डैम, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास के पहलुओं को नजरअंदाज कर क्या एकतरफा कहानी गढ़ी जा रही है?

The Narrative World    17-Apr-2026   
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अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में प्रस्तावित अपर सियांग बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर हाल में एक तथाकथित "फैक्ट-फाइंडिंग टीम" की रिपोर्ट सामने आई है। प्रोपेगेंडा मीडिया समूह 'द वायर' द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अरुणाचल का जनजातीय समुदाय इस परियोजना के विरुद्ध व्यापक विरोध कर रहा है और इसे अपनी जमीन, संस्कृति और पहचान के लिए खतरा मानता है। पहली नजर में यह एक संवेदनशील और गंभीर चिंता लगती है। लेकिन जब इस पूरे नैरेटिव को थोड़ा गहराई से देखा जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि कहानी उतनी सीधी नहीं है, जितनी बताई जा रही है।
 
सबसे पहला सवाल यहीं उठता है कि यह "फैक्ट-फाइंडिंग" वास्तव में क्या खोज रही है। क्या यह पूरी सच्चाई सामने ला रही है, या केवल एक खास पक्ष को सामने रख रही है? क्योंकि जिस रिपोर्ट में जनजातीय विरोध को विस्तार से बताया गया है, उसी रिपोर्ट में उस सबसे बड़े संदर्भ का लगभग कोई उल्लेख नहीं है, जिसने इस परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बना दिया है।
 
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सियांग नदी वही नदी है, जिसे चीन में यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है। चीन इस नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक, लगभग 66 गीगावाट का मेगा डैम बना रहा है। यह केवल एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कदम है, जो भविष्य में जल प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता देता है।
 
ऐसे में भारत द्वारा सियांग पर अपनी परियोजना को आगे बढ़ाना केवल विकास का मामला नहीं, बल्कि जल सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है। लेकिन "फैक्ट-फाइंडिंग" रिपोर्ट में इस पूरे संदर्भ का उल्लेख लगभग नदारद है। यह चुप्पी अपने आप में बहुत कुछ कहती है।
 
मुख्यमंत्री पेमा खांडू का दावा है कि 70 प्रतिशत से अधिक ग्रामीणों ने इस परियोजना के अध्ययन का समर्थन किया है। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई विरोध नहीं है, बल्कि यह संकेत देता है कि जमीन पर स्थिति पूरी तरह एकतरफा नहीं है। लेकिन रिपोर्ट में केवल विरोध को ही केंद्र में रखा गया है। यह चयनात्मक प्रस्तुति है, और यही चयन इस पूरे नैरेटिव को एक दिशा देता है।
 
 
दरअसल यह पैटर्न नया नहीं है। भारत में जब भी कोई बड़ी विकास परियोजना सामने आती है, तो लगभग एक जैसा ढांचा दिखाई देता है। पहले स्थानीय चिंताओं को उठाया जाता है, जो कई बार वास्तविक भी होती हैं। लेकिन इसके बाद इन चिंताओं को एक बड़े नैरेटिव में ढाल दिया जाता है, जहां विकास को "विनाश" और राज्य को "दमनकारी" के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अंततः यह पूरा मामला एक संघर्ष के रूप में सामने आता है, जिसमें विरोध करने वालों को एकमात्र सही पक्ष के रूप में दिखाया जाता है।
 
नर्मदा नदी के सरदार सरोवर बांध के समय भी यही हुआ था। वर्षों तक विरोध, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अभियान और विकास परियोजना को लगातार संदेह के घेरे में रखना। आज वही ढांचा सियांग में भी दिखता है। अंतर केवल इतना है कि इस बार मामला एक संवेदनशील सीमा राज्य से जुड़ा है।
 
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इस मामले की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 20 से अधिक गांव पूरी तरह डूब सकते हैं और 50 से अधिक प्रभावित होंगे। यह चिंता वास्तविक हो सकती है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल इसी पहलू को सामने रखकर पूरी परियोजना को खारिज कर देना उचित है? क्या पुनर्वास, मुआवजा और वैकल्पिक विकास की संभावनाओं पर भी समान गंभीरता से चर्चा हो रही है?
 
इसी तरह रिपोर्ट में 1000 से अधिक अर्धसैनिक बलों की तैनाती को "विरोध दबाने" के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह क्षेत्र एक रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील सीमा क्षेत्र है, जहां सुरक्षा उपस्थिति केवल किसी एक परियोजना से जुड़ी नहीं होती। जब संदर्भ हटाया जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है।
 
 
यहां एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिसे समझना जरूरी है। माओवादी और वामपंथी आंदोलनों का इतिहास बताता है कि सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दों को अक्सर बड़े राजनीतिक नैरेटिव में बदला जाता है। "पहचान", "संस्कृति" और "अधिकार" जैसे शब्द केवल भावनात्मक नहीं होते, बल्कि राजनीतिक उपकरण भी बन जाते हैं। जब हर विकास परियोजना को इसी फ्रेम में देखा जाने लगे, तो यह संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न होता है।
 
सियांग के मामले में भी यही सवाल उठता है। क्या यह वास्तव में केवल एक स्थानीय विरोध है, या फिर एक व्यापक वैचारिक ढांचे का हिस्सा है, जो हर बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को एक ही नजरिये से देखता है?
 
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"फैक्ट-फाइंडिंग" टीम की रिपोर्ट में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं और इसे समाज में विभाजन पैदा करने का प्रयास बताया गया है। लेकिन क्या इसके समर्थन में कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत किया गया है? या यह केवल एक आशंका के रूप में सामने रखा गया है, जिसे तथ्य का रूप दे दिया गया है? यही वह बिंदु है, जहां विश्वसनीयता का सवाल उठता है।
 
 
अगर कोई रिपोर्ट केवल उन तथ्यों को चुनती है, जो उसके निष्कर्ष को मजबूत करते हैं, और बाकी संदर्भों को नजरअंदाज कर देती है, तो वह रिपोर्ट "फैक्ट-फाइंडिंग" कम और "नैरेटिव-बिल्डिंग" ज्यादा लगती है। और यही इस पूरे विवाद का केंद्र है।
 
इसका मतलब यह नहीं है कि सभी विरोध गलत हैं या सभी चिंताएं निराधार हैं। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि इस पूरे मुद्दे को जिस तरह पेश किया जा रहा है, उसमें रिपोर्ट कम और प्रोपेगेंडा अधिक है।
 
सियांग परियोजना केवल एक बांध नहीं है। यह ऊर्जा, जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और सबसे महत्वपूर्ण, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ एक बड़ा निर्णय है। ऐसे में इसे केवल "जनजातीय बनाम राज्य" के फ्रेम में सीमित कर देना न तो पूरी सच्चाई है और न ही जिम्मेदार विमर्श।
 
अंततः यह सवाल उठता है कि क्या हम हर विकास परियोजना को एक तयशुदा वैचारिक चश्मे से देखते रहेंगे, या फिर उसे उसके पूरे संदर्भ में समझने की कोशिश करेंगे। क्योंकि सच्चाई हमेशा एक पक्ष में नहीं होती, लेकिन उसे एक पक्ष में सीमित करना निश्चित रूप से एक रणनीति होती है।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार