नक्सलवाद का पतन: 'किशन दा' की अंतिम यात्रा ने खोली हकीकत

बंदूक के साये में टिके समर्थन की सच्चाई तब सामने आई जब किशन दा की विदाई में कोई साथ खड़ा नहीं दिखा।

The Narrative World    30-Apr-2026
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किसी भी विचार, संघर्ष या राजनीतिक आंदोलन की अंतिम और सबसे प्रामाणिक परीक्षा इस बात से नहीं होती कि उसके घोषणापत्र कितने शानदार हैं या उसके नेताओं ने कितने दशक भूमिगत रहकर बिताए हैं। उसकी असली कसौटी यह होती है कि जब उस आंदोलन का कोई शीर्ष चेहरा अपनी अंतिम यात्रा पर निकलता है, तो उसके पीछे कितने आम लोगों के कदम स्वतःस्फूर्त होकर चलते हैं।
 
साठ साल तक जिस व्यक्ति ने 'सशस्त्र क्रांति' के नाम पर जंगलों की खाक छानी, और जिस माओवादी विचारधारा ने 'जनता की सत्ता' स्थापित करने का दावा किया, उस सीपीआई (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य प्रशांत बोस उर्फ 'किसान दा' का अस्पताल में निधन और उनकी अंतिम यात्रा में पसरा वह डरावना सन्नाटा, दरअसल भारतीय वामपंथी उग्रवाद के ताबूत में ठुकी वह आखिरी कील है, जिसे कोई भी बौद्धिक हथौड़ा अब बाहर नहीं निकाल सकता।
 
झारखंड जैसे राज्य में, जिसे दशकों तक माओवादियों ने अपना अघोषित मुक्तांचल माना, वहां उनके शीर्ष नेता को कंधा देने के लिए चार आम जनजातियों या ग्रामीणों का भी न जुटना केवल एक मौत का सन्नाटा नहीं है, बल्कि यह उस खोखलेपन का सबसे मुखर और क्रूर ऐलान है, जिसे क्रांति के नाम पर इस देश के हाशिए के लोगों पर थोपा गया था।
 
यह दृश्य उन तमाम दावों की धज्जियाँ उड़ा देता है, जिनमें कहा जाता है कि माओवादियों की जड़ें जनता के बीच बहुत गहरी हैं। सच्चाई यह है कि ये जड़ें विचारधारा या जन-प्रेम के पानी से नहीं, बल्कि बंदूक की नली से टपकने वाले खौफ से सींची गई थीं। जब तक हाथ में AK-47 रही, तब तक गाँव वालों ने फरमान माने, लेकिन जैसे ही नेता गिरफ्तार हुआ और बंदूक का साया हटा, जनता ने अपने दरवाज़े पूरी तरह बंद कर लिए।
 
लेकिन इस जमीनी यथार्थ और वैचारिक पतन के ठीक समानांतर एक और खौफनाक खेल चल रहा है, जो इस मृतप्राय आंदोलन को कृत्रिम साँसें देने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ झारखंड में किशन दा का जनाज़ा बिना कंधों के श्मशान पहुँचता है, तो दूसरी तरफ सीपीआई (माओवादी) के ही एक अन्य वयोवृद्ध नेता, पूर्व पोलित ब्यूरो सदस्य प्रभात कुमार उर्फ 'मास्टरजी', 88 वर्ष की उम्र में यूट्यूब चैनलों पर बैठकर भयंकर वैचारिक प्रलाप करते हैं।
 
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वे बड़े दंभ के साथ दावा करते हैं कि देश में आज भी उनके 13 लाख गुरिल्ला सैनिक सक्रिय हैं, और आत्मसमर्पण करने वाले नेता पार्टी के लिए महज 'कार्बन डाइऑक्साइड' थे, जिनके निकलने से संगठन और शुद्ध हो गया है।
 
प्रभात कुमार के ये बयान पहली नज़र में किसी अति-उत्साही बुजुर्ग की वैचारिक ज़िद या मानसिक अस्पष्टता लग सकते हैं, जो ज़मीनी हक़ीक़त से पूरी तरह कट चुका है। जब संगठन के पास गिने-चुने कैडर बचे हैं और पूरे के पूरे राज्य कमेटियाँ बिखर चुकी हैं, तब 13 लाख की फौज का दावा हास्यास्पद लगता है।
 
लेकिन इस प्रलाप के पीछे का खतरा बहुत गहरा है और इसका पाखंड भी उतना ही बड़ा है। साल 2020 में जेल से रिहा होने के बाद से प्रभात कुमार जंगलों में नहीं हैं; वे अपने गाँव में खुले तौर पर एक सुरक्षित और कानूनी जीवन बिता रहे हैं।
 
जो नेता खुद अपने घर की चारदीवारी के भीतर सुरक्षित बैठकर यूट्यूब पर इंटरव्यू दे रहा है, वही जंगलों में पुलिस की गोलियाँ झेल रहे या आत्मसमर्पण कर रहे जनजाति युवाओं को 'गंदगी' और 'कार्बन डाइऑक्साइड' बता रहा है।
 
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यह विडंबना ही है कि मास्टरजी का यह खोखला दंभ उन 'शहरी नक्सलियों' (अर्बन नक्सल) के लिए एक अचूक 'संजीवनी बूटी' का काम करता है, जो वातानुकूलित कमरों, महानगरों के कॉफी हाउसों, विश्वविद्यालयों के सेमिनार हॉलों और मानवाधिकार के नाम पर चलने वाले विदेशी फंडेड NGO के दफ्तरों में बैठकर व्यवस्था के खिलाफ अपना खूनी नैरेटिव गढ़ते हैं।
 
अपने गाँव के सुरक्षित माहौल में जीवन काट रहे प्रभात कुमार जैसे नेता इस बात को भली-भाँति समझते हैं कि जंगलों के सैन्य मोर्चे पर उनकी हार हो चुकी है। इसलिए वे अब अपना पूरा ज़ोर 'विमर्श के युद्ध' (नैरेटिव वॉरफेयर) पर लगा रहे हैं।
 
जब मास्टरजी 'ऑपरेशन कगार' को कॉर्पोरेट साज़िश बताते हैं, अडानी-अंबानी के नाम पर जनजातियों के विस्थापन का डर दिखाते हैं, और ड्रोन या AI के इस्तेमाल को अमेरिकी साम्राज्यवाद से जोड़ते हैं, तो वे असल में उस सफेदपोश जमात को वह 'कच्चा माल' (Raw Material) मुहैया करा रहे होते हैं, जिसकी उन्हें अपनी बौद्धिक दुकानें चलाने के लिए सख्त ज़रूरत होती है।
 
 
इन्हीं बयानों को आधार बनाकर ये शहरी बौद्धिक विदेशी पत्रिकाओं में लेख लिखते हैं, न्यायपालिका में जनहित याचिकाएँ (PIL) दाखिल करते हैं और विश्वविद्यालयों के तार्किक रूप से अपरिपक्व लेकिन ऊर्जावान छात्रों का ब्रेनवॉश करते हैं।
 
इन शहरी पैरोकारों और माओवादी नेतृत्व का यह गठजोड़ कितनी क्रूर 'शव-राजनीति' (नेक्रो-पॉलिटिक्स) पर टिका है, यह किशन दा की मौत के बाद पूरी तरह से नंगा हो गया है। जैसे ही किशन दा की मौत हुई, इसी अर्बन नक्सल जमात ने छाती पीटना शुरू कर दिया। वे इसे 'हिरासत में हुई हत्या' बता रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि जेल में उन्हें मेडिकल सुविधा नहीं दी गई।
 
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लेकिन एक सीधा-सा सवाल, जो इन बौद्धिक गिद्धों से पूछा जाना चाहिए, यह है कि जब प्रशांत बोस वर्षों से जेल में अपनी ढलती उम्र और बीमारियों के साथ संघर्ष कर रहे थे, तब यह जमात कहाँ थी? तब इनके मानवाधिकार के झंडे कहाँ थे? तब इन्होंने उनके समुचित इलाज के लिए कोई राष्ट्रीय स्तर का जन-आंदोलन क्यों नहीं खड़ा किया?
 
इस सवाल का जवाब यही है कि एक बीमार और कमजोर होता जीवित कॉमरेड उनके किसी काम का नहीं होता। इन शहरी पैरोकारों को अपने प्रोपेगैंडा को धार देने और अपनी विदेशी फंडिंग को न्यायोचित ठहराने के लिए 'जीवित नेताओं' की नहीं, बल्कि 'शहीदों' की ज़रूरत होती है। एक मृत माओवादी नेता इनके लिए सबसे बेहतरीन हथियार बन जाता है।
 
प्रभात कुमार जैसे नेता अपने गाँव के सुरक्षित कमरे से वैचारिक सनक के तीर छोड़ते हैं, और ये शहरी नक्सल उन तीरों को मानवाधिकार और मानवाधिकार-हनन के लेप में लपेटकर समाज के सीने में उतार देते हैं।
 
ये बड़ी चालाकी से किशन दा की मौत का इस्तेमाल राज्य के खिलाफ अपने एजेंडे को मज़बूत करने के लिए कर रहे हैं, ताकि उनकी अपनी वैचारिक और संगठनात्मक नाकामी पर पर्दा पड़ा रहे। यह वही वर्ग है, जो जंगलों में लड़ने वाले जनजाति युवाओं को क्रांति का ईंधन समझता है और उन्हें मरने के लिए उकसाता है, जबकि इनके अपने बच्चे विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे होते हैं या कॉरपोरेट घरानों में सुरक्षित नौकरियाँ कर रहे होते हैं।
 
 
यह शहरी वामपंथी विमर्श कितनी चतुराई से तथ्यों को तोड़ता-मरोड़ता है, इसका कोई सानी नहीं है। जब पुलिस की गोलियों से कोई ग्रामीण मारा जाता है, तो ये उसे राज्य का आतंक बताते हैं, और जब इनका अपना नेता बीमारी से मरता है, तो उसे भी व्यवस्था की साज़िश घोषित कर देते हैं।
 
लेकिन ये कभी इस बात का जवाब नहीं देते कि अगर प्रभात कुमार के दावों में रत्ती भर भी सच्चाई है, अगर संगठन में इतनी ही जान और गुरिल्ला सैनिक बाकी हैं, तो झारखंड जैसे राज्य में उनके अपने संगठन या उससे जुड़े जन-संगठनों ने किशन दा के लिए एक शोक सभा तक आयोजित करने की हिम्मत क्यों नहीं जुटाई?
 
सच्चाई यह है कि ज़मीन पर कोई जन-संगठन बचा ही नहीं है। जो कुछ बचा है, वह केवल सोशल मीडिया, डिजिटल पोर्टल्स और सेमिनारों में गढ़ा गया एक आभासी नैरेटिव है, जिसे ये शहरी बौद्धिक प्रभात कुमार जैसे नेताओं के भड़काऊ बयानों की खुराक देकर ज़िंदा रखे हुए हैं।
 
 
यह बहुत ही दुखद यथार्थ है कि जिस वैचारिक दर्शन ने कभी शोषण-मुक्त समाज का सपना दिखाया था, वह आज केवल एक परजीवी व्यवस्था बनकर रह गया है। प्रभात कुमार का सुरक्षित बैठकर दिया गया प्रलाप और किसान दा की एकाकी मौत, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक यथार्थ को नकारने की सनक है, तो दूसरा उसी सनक का खौफनाक परिणाम है।
 
राज्य और समाज को अब इस दोहरे खतरे को पहचानना होगा। जंगलों में हथियार उठाने वालों से निपटना शायद उतना मुश्किल नहीं है, जितना मुश्किल उन सफेदपोश चेहरों को बेनकाब करना है, जो लोकतंत्र के हर अधिकार का उपभोग करते हुए प्रभात कुमार जैसे नेताओं के वैचारिक ज़हर को समाज की नसों में इंजेक्ट कर रहे हैं।
 
 
किशन दा की मौत पर बहाए जा रहे मगरमच्छ के आँसू और मास्टरजी के बेतुके दावे, दरअसल क्रांति का कोई शंखनाद नहीं, बल्कि अपने छिनते हुए बौद्धिक साम्राज्य को बचाने की एक हताश और आखिरी कोशिश हैं।
 
जब तक समाज इस शव-विमर्श और इसके पीछे खड़े शहरी परजीवियों के असली चेहरे को पूरी नग्नता के साथ नहीं समझेगा, तब तक शांति और लोकतंत्र के खिलाफ रचे जा रहे इस भ्रमजाल को पूरी तरह तोड़ा नहीं जा सकेगा।
 
लेख

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संजय सिंह ठाकुर
नक्सल विषय के अध्येता, नागपुर