
16वीं शताब्दी का यूरोप बाहर से जितना विजयी दिखाई देता था, भीतर से उतना ही असुरक्षित था। समुद्रों पर उसके जहाज आगे बढ़ रहे थे, नए भूभाग खोजे जा रहे थे, व्यापारिक मार्ग खुल रहे थे, लेकिन उसी समय यूरोप की धार्मिक आत्मा एक गहरे संकट से गुजर रही थी। रोमन कैथोलिक चर्च, जिसने सदियों तक स्वयं को सम्पूर्ण सत्य का एकमात्र संरक्षक माना था, अब चुनौती के घेरे में था।
चर्च के भीतर फैला भ्रष्टाचार, भोग-विलास का व्यापार, राजनीतिक हस्तक्षेप और रिलीजियस सत्ता का केंद्रीकरण यूरोप के बड़े हिस्से में असंतोष पैदा कर चुका था। मार्टिन लूथर के विद्रोह ने उस असंतोष को आवाज़ दे दी। प्रोटेस्टेंट आंदोलन केवल एक रिलीजियस मतभेद नहीं था; वह चर्च की सर्वोच्चता के विरुद्ध विद्रोह था। यूरोप का रिलीजियस मानचित्र बदल रहा था और रोम पहली बार स्वयं को रक्षात्मक स्थिति में महसूस कर रहा था।

इसी संकट के बीच चर्च को एक ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस हुई जो केवल प्रार्थना न करे, बल्कि संघर्ष करे; जो केवल चर्च में बैठकर तपस्या न करे, बल्कि संसार के भीतर उतरकर चर्च के प्रभाव को पुनर्स्थापित करे। चर्च को ऐसे लोगों की आवश्यकता थी जो सैनिकों की तरह अनुशासित हों, राजनयिकों की तरह चतुर हों, शिक्षकों की तरह प्रभावशाली हों और मिशनरियों की तरह धैर्यवान हों। इसी आवश्यकता से Society of Jesus का जन्म हुआ, वह संगठन जिसे दुनिया आगे चलकर Jesuits के नाम से जानने लगी।
जब इग्नेशियस लोयोला ने इस संगठन की नींव रखी, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि आने वाले कुछ दशकों में Jesuits दुनिया के सबसे प्रभावशाली रिलीजियस नेटवर्क में बदल जाएंगे। इग्नेशियस लोयोला स्वयं सैनिक जीवन से आया था। युद्धभूमि ने उसे अनुशासन, आदेश और संरचना की भाषा सिखाई थी। बाद में रिलीजियस जीवन अपनाने के बावजूद उसने अपने संगठन को चर्चवासी शांति के आधार पर नहीं, बल्कि सैनिक मानसिकता के आधार पर बनाया। यही कारण था कि Jesuits बाकी रिलीजियस संगठनों से अलग दिखाई देते थे। वे केवल धर्मोपदेशक नहीं थे; वे चर्च की रणनीति के प्रशिक्षित अधिकारी थे।

Jesuit प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल धार्मिक ज्ञान देना नहीं था। उसका वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा को संगठनात्मक इच्छा में विलीन कर देना था। एक Jesuit से अपेक्षा की जाती थी कि वह अपने वरिष्ठ के आदेश को बिना प्रश्न स्वीकार करे। चर्च साहित्य में इसे “पूर्ण आज्ञापालन” कहा गया। लेकिन यह आज्ञापालन केवल अनुशासन नहीं था; यह मानसिक पुनर्गठन था। Jesuit को इस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता था कि वह स्वयं को चर्च की इच्छा का विस्तार समझे। उसकी व्यक्तिगत राय, उसका निजी निर्णय और उसकी व्यक्तिगत पहचान संगठन से पीछे हो जाए। यही कारण था कि बाद के वर्षों में यूरोप के कई लेखकों ने Jesuits की तुलना सैनिकों से की। अंतर केवल इतना था कि उनके हाथों में तलवार नहीं, चर्च का सिद्धांत था।
यूरोप के पुराने चर्चों में रहने वाले पादरी संसार से दूर रहते थे। Jesuits संसार के भीतर प्रवेश करते थे। वे राजाओं के दरबारों में जाते थे। वे विश्वविद्यालयों में पढ़ाते थे। वे व्यापारिक बंदरगाहों तक पहुँचते थे। वे साम्राज्यों के साथ चलते थे। यदि चर्च मध्यकालीन यूरोप की रिलीजियस शक्ति था, तो Jesuits उसकी गतिशील राजनीतिक और वैचारिक शक्ति बनते जा रहे थे। उनका लक्ष्य केवल चर्चों का निर्माण करना नहीं था; उनका लक्ष्य समाजों की मानसिक संरचना तक पहुँचना था।

यही कारण था कि Jesuits ने शिक्षा को असाधारण महत्व दिया। वे समझ चुके थे कि तलवार भय पैदा कर सकती है, लेकिन स्थायी प्रभाव शिक्षा से आता है। यदि किसी समाज की नई पीढ़ी चर्च समर्थित शिक्षा व्यवस्था के भीतर आ जाए, तो धीरे-धीरे उसकी ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक दृष्टि और धार्मिक समझ को प्रभावित किया जा सकता है।
यह भी पढ़ें - ज़ेवियर, चर्च और कन्वर्ज़न का इतिहास (भाग 1) — Saint का साम्राज्य
Jesuit विद्यालय और महाविद्यालय केवल शिक्षण संस्थान नहीं थे। वे प्रभाव केंद्र थे। यूरोप में उन्होंने अभिजात वर्ग वर्गों के बच्चों को शिक्षा दी। एशिया और लैटिन अमेरिका में उन्होंने स्थानीय समाजों के भीतर प्रवेश का माध्यम बनाया।
लेकिन Jesuits की वास्तविक शक्ति केवल शिक्षा में नहीं थी। उनकी वास्तविक शक्ति उनकी संरचना में थी। Society of Jesus दुनिया के पहले truly global religious networks में से एक थी। उसके सदस्य एशिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका के बीच लगातार यात्रा कर रहे थे। 
वे केवल रिलीजियस रिपोर्ट नहीं भेजते थे; वे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सूचनाएँ भी भेजते थे। किसी क्षेत्र में कौन-सा समुदाय प्रभावशाली है, कहाँ राजनीतिक अस्थिरता है, कौन-सा शासक चर्च के प्रति सहानुभूति रखता है, किन समूहों पर दबाव डालकर कन्वर्ज़न बढ़ाया जा सकता है, Jesuit रिपोर्ट इन सबका विवरण रखती थीं। यह केवल मिशन नहीं था; यह एक विस्तृत सभ्यतागत इंटेलीजेंस प्रणाली जैसा था।
यही कारण था कि यूरोप के भीतर भी Jesuits को लेकर भय और संदेह पैदा होने लगा। फ्रांस के दार्शनिक Blaise Pascal ने उन पर आरोप लगाया कि वे “end justifies the means” अर्थात उद्देश्य की प्राप्ति के लिए किसी भी साधन को उचित मानते हैं। यूरोप के कई हिस्सों में Jesuits पर राजनीति में हस्तक्षेप, राजाओं को प्रभावित करने और गुप्त शक्ति नेटवर्क बनाने के आरोप लगे। फ्रांसीसी लेखक Étienne Pasquier ने Jesuits की आलोचना करते हुए कहा था कि वे स्वयं को “Society of Jesus” कहते हैं, लेकिन उनके व्यवहार में शक्ति और नियंत्रण की राजनीति छिपी हुई है।

बाद के वर्षों में यूरोप के कई देशों ने Jesuits को संदेह की दृष्टि से देखा। कुछ स्थानों पर उन्हें निष्कासित तक किया गया। अंततः 1773 में Pope Clement XIV को Society of Jesus को अस्थायी रूप से समाप्त करना पड़ा। लेकिन चर्च यह अच्छी तरह समझता था कि Jesuits उसकी सबसे प्रभावी शक्ति हैं। यही कारण था कि कुछ दशकों बाद उन्हें पुनः स्थापित कर दिया गया।
Jesuits का वैश्विक विस्तार उसी समय हुआ जब यूरोपीय समुद्री साम्राज्य फैल रहे थे। पुर्तगाल और स्पेन केवल व्यापारिक राष्ट्र नहीं थे; वे स्वयं को कैथोलिक शक्ति के वाहक मानते थे। समुद्र उनके लिए केवल आर्थिक मार्ग नहीं थे। वे चर्च विस्तार के मार्ग भी थे। जहाँ पुर्तगाली जहाज़ जाते, वहाँ चर्च पहुँचता। जहाँ व्यापारिक चौकी बनती, वहाँ मिशन स्थापित होता। बंदरगाहों के साथ चर्च, चर्चों के साथ मिशनरीज़ और मिशनरीज़ के साथ कन्वर्ज़न अभियान आगे बढ़ते थे।

भारत में Jesuits का प्रवेश भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा था। गोवा पर 1510 में पुर्तगाली कब्ज़े के बाद यह स्पष्ट हो चुका था कि भारत केवल व्यापारिक लाभ का क्षेत्र नहीं रहेगा। गोवा को एशिया में कैथोलिक विस्तार के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा था। चर्च और पुर्तगाली सत्ता दोनों समझते थे कि यदि भारत के पश्चिमी तट पर स्थायी धार्मिक आधार बना लिया जाए, तो आगे दक्षिण और पूर्व की ओर विस्तार संभव होगा।
1542 में जब फ्रांसिस ज़ेवियर गोवा पहुँचा, तब वह अकेला मिशनरी नहीं था। वह पूरे Jesuit vision का प्रतिनिधि बनकर आया था। उसका स्वागत किसी सामान्य पादरी की तरह नहीं हुआ। उसे “Royal Inspector of Missions” बनाया गया। उसे सीधे पुर्तगाल के राजा से संपर्क करने का अधिकार दिया गया। पोप ने उसे Apostolic Nuncio का दर्जा दिया। यह दिखाता है कि चर्च और साम्राज्य दोनों उसे एक strategic figure के रूप में देख रहे थे।

गोवा उस समय तेजी से बदल रहा था। पुराने मंदिरों, स्थानीय व्यापारिक संरचनाओं और समुद्री संस्कृति के बीच अब यूरोपीय सत्ता का नया ढाँचा उभर रहा था। बंदरगाहों पर पुर्तगाली सैनिक थे। प्रशासन में चर्च समर्थित अधिकारी थे। समुद्र में पुर्तगाली जहाज़ों का भय था। और इसी वातावरण में Jesuit मिशन अपनी जड़ें जमा रहा था।