चार दशक तक आर्थिक समृद्धि का सपना बेचने वाली
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) अब आर्थिक संकट, बेरोजगारी और जनसंख्या गिरावट के बीच जनता को राष्ट्रवाद और ताइवान के मुद्दे के सहारे अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश कर रही है। बीजिंग में यह बदलाव तब दिख रहा है जब चीन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है और लोगों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है।
करीब 40 वर्षों तक CCP ने चीनी नागरिकों से एक सीधा समझौता किया। पार्टी ने कहा कि राजनीति में सवाल मत पूछो, सत्ता हमारे हाथ में रहने दो और बदले में हम तुम्हें समृद्धि देंगे। इस दौरान चीन की आय और जीवन स्तर में सुधार हुआ। लेकिन इसकी वजह केंद्रीय योजना नहीं थी। चीन ने पश्चिमी पूंजी, तकनीक और बाजारों के लिए अपने दरवाजे खोले, जिससे विकास को गति मिली। इसके बावजूद CCP ने पूरा श्रेय खुद ले लिया।
आर्थिक विकास के साथ ही पार्टी ने आलोचकों को जेल भेजा, असहमति को दबाया और कई समुदायों पर दमन जारी रखा। फिर भी बढ़ती आय ने बड़ी आबादी को संतुष्ट रखा। अब वही आधार कमजोर पड़ रहा है।
आर्थिक मॉडल की सांस फूलने लगी
चीन की अर्थव्यवस्था आज कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। कीमतों में लगातार गिरावट ने देश को दीर्घकालिक अपस्फीति की स्थिति में पहुंचा दिया है। मकानों की कीमतों में भारी गिरावट आई है। अनुमान बताते हैं कि संपत्ति बाजार के संकट ने परिवारों की लगभग 18 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति मिटा दी।
युवाओं की स्थिति और भी खराब है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में 16.3% युवा बेरोजगार थे। कई रिपोर्टों और आकलनों में दावा किया गया है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक हो सकता है। रोजगार की कमी ने युवाओं में निराशा बढ़ाई है।
जनसंख्या संकट भी गहराता जा रहा है। 2025 में जन्म दर 17 प्रतिशत गिरकर 79.2 लाख रह गई, जो 1949 के बाद सबसे कम स्तर है। दूसरी ओर बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ रही है। इससे भविष्य में आर्थिक बोझ और बढ़ने की आशंका है।
हार्बिन और डालियान जैसे शहरों के नागरिक खुले तौर पर कह रहे हैं कि उनकी आय घटी है, संपत्ति का मूल्य कम हुआ है और भविष्य को लेकर सुरक्षा की भावना कमजोर पड़ी है। कई लोग मानते हैं कि कर्जमुक्त रहना ही अब बड़ी उपलब्धि बन गया है।
समृद्धि नहीं मिली तो राष्ट्रवाद का सहारा
जब आर्थिक सफलता का वादा कमजोर पड़ने लगा तो CCP ने नया रास्ता चुना। राष्ट्रपति शी जिनपिंग अब जनता के सामने समृद्धि की जगह राष्ट्रीय गौरव का संदेश रख रहे हैं। पार्टी यह दावा कर रही है कि चीन अब अमेरिका के बराबर खड़ा है और देश का "राष्ट्रीय पुनरुत्थान" निकट है।
आर्थिक चुनौतियों के बीच शी जिनपिंग का जोर अब समृद्धि से अधिक राष्ट्रवाद पर दिखाई देता है। अंतरिक्ष मिशन, विमानवाहक पोत और सैन्य शक्ति का बढ़ता प्रदर्शन इसी दिशा का संकेत देता है। ऐसा लगता है कि राष्ट्रीय गौरव के इस नैरेटिव के माध्यम से आर्थिक समस्याओं से उपजे असंतोष को संतुलित करने का प्रयास किया जा रहा है।
जर्मनी स्थित शोध संस्थान मर्केटर इंस्टीट्यूट फॉर चाइना स्टडीज भी कहता है कि शी के दौर में पार्टी ने जीवन स्तर सुधारने की रणनीति से हटकर राष्ट्रवाद, देशभक्ति और सैन्य तैयारी को अपनी वैधता का नया आधार बना लिया है।
देशभक्ति या डर?
चीन में दिखाई देने वाला राष्ट्रवाद कई बार वास्तविक गर्व से अधिक भय का परिणाम नजर आता है। लोगों के बीच यह धारणा बनी हुई है कि सार्वजनिक रूप से पार्टी के समर्थन का प्रदर्शन करना सुरक्षित है, ताकि वे संदेह के घेरे में आने से बच सकें।
CCP ने इस मानसिकता को मजबूत करने के लिए शिक्षा व्यवस्था का भी इस्तेमाल किया। तियानआनमेन नरसंहार के बाद शुरू हुए "देशभक्ति शिक्षा अभियान" ने स्कूलों में यह संदेश फैलाया कि विदेशी शक्तियों ने चीन का अपमान किया था और केवल कम्युनिस्ट पार्टी ने देश को बचाया।
आज यही प्रचार उपभोक्ता बाजार में भी दिखाई देता है। घरेलू ब्रांडों को बढ़ावा दिया जा रहा है जबकि विदेशी कंपनियों के खिलाफ राष्ट्रवादी अभियान चलाए जाते हैं। नाइकी, एचएंडएम और डोल्से एंड गब्बाना जैसी कंपनियां इसका असर झेल चुकी हैं।
जनता का व्यवहार प्रचार से अलग
CCP भले ही पश्चिम विरोधी संदेश देती हो, लेकिन व्यवहार में कई चीनी नागरिक और अधिकारी अलग रास्ता चुनते हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने बच्चों को अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप भेजना चाहते हैं। संपन्न परिवार विदेशों में संपत्ति खरीद रहे हैं और पूंजी बाहर भेज रहे हैं।
लोकतंत्र समर्थक टिप्पणीकार चेन पोकोंग
कहते हैं कि कई लोग सार्वजनिक रूप से राष्ट्रवादी नारे लगाते हैं, लेकिन उनके कदम कुछ और कहानी बताते हैं। वे पश्चिमी देशों की शिक्षा, न्याय व्यवस्था और संपत्ति सुरक्षा पर भरोसा करते हैं।
विदेशी निवेशकों का रुख भी बदल गया है। 2021 में 344 अरब डॉलर तक पहुंचा शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 2024 में घटकर लगभग 4.5 अरब डॉलर रह गया। विदेशी कंपनियां चीन में बढ़ती निगरानी, छापों और कठोर कानूनों से चिंतित हैं।
ताइवान को बना दिया नया राजनीतिक हथियार
आर्थिक उपलब्धियों की कमी को छिपाने के लिए CCP ने ताइवान के मुद्दे को और आक्रामक रूप से उठाना शुरू कर दिया है। शी जिनपिंग बार-बार कहते हैं कि ताइवान का चीन में विलय राष्ट्रीय पुनरुत्थान का आवश्यक हिस्सा है।
हालांकि, इस रणनीति में एक बड़ा खतरा भी छिपा है। जब शीर्ष नेतृत्व तक केवल अच्छी खबरें पहुंचती हों और असहमति को दबा दिया जाता हो, तब गलत निर्णय लेने की संभावना बढ़ जाती है। सेना में लगातार चल रहे शुद्धिकरण अभियान भी इसी समस्या की ओर संकेत करते हैं। हाल के वर्षों में सैकड़ों वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को हटाया गया है या वे सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए हैं।
ताइवान को लेकर सैन्य टकराव की स्थिति में चीन की सेना की एकजुटता और आदेशों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता भी परीक्षा में होगी। सेना के भीतर बढ़ता भय, अविश्वास और लगातार चल रहे शुद्धिकरण अभियान संकेत देते हैं कि आंतरिक स्तर पर सब कुछ उतना स्थिर नहीं है, जितना बाहर से दिखाई देता है।
संकट के दौर में बढ़ता खतरा
चीन आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है, जनसंख्या घट रही है और विदेशी निवेश कम हो रहा है। ऐसे समय में CCP आर्थिक सुधारों की बजाय राष्ट्रवाद को राजनीतिक औजार बना रही है।
यही वजह है कि बीजिंग ने "अमीर बनो" वाले पुराने प्रचार को पीछे छोड़ दिया है। अब पार्टी जनता को बेहतर भविष्य का नहीं, बल्कि महान राष्ट्र बनने का सपना दिखा रही है। लेकिन खाली जेब और घटती संभावनाओं के बीच यह नया नैरेटिव कितने समय तक टिकेगा, यही चीन के भविष्य का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।