छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सलवाद ख़त्म होने की कगार पर है। इस बीच बचे हुए माओवादी 28 जुलाई से 3 अगस्त तक मनाए जाने वाले तथाकथित 'शहीदी सप्ताह' के दौरान हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश रच रहे हैं। लेकिन इस बार बस्तर पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की सतर्कता और सख्त कार्रवाई ने नक्सलियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया है।
पिछले 19 महीनों में 425 नक्सलियों को ढेर करने वाली बस्तर पुलिस ने इस बार भी नक्सल शहीदी सप्ताह को देखते हुए अलर्ट मोड अपनाया है। हाल ही में दंतेवाड़ा जिले के मालेवाही क्षेत्र में नक्सलियों द्वारा बनाए गए तीन स्मारकों को ध्वस्त कर दिया गया, जिससे आतंक के प्रचार तंत्र को करारा झटका लगा है।
नक्सलियों का यह तथाकथित शहीदी सप्ताह 1972 में माओवादी विचारक चारु मजूमदार की पुलिस हिरासत में मृत्यु की याद में मनाया जाता है। इस दौरान नक्सली अपने मारे गए साथियों को 'शहीद' का दर्जा देकर स्मारक बनाते हैं, बैनर-पोस्टर लगाते हैं, और ग्रामीणों को भड़काने के लिए जनसभाएं आयोजित करते हैं। लेकिन इन गतिविधियों का असल मकसद हिंसा को बढ़ावा देना और सुरक्षाबलों को निशाना बनाना है।
बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी. ने बताया कि नक्सली इस सप्ताह के दौरान जान-माल को नुकसान पहुंचाने की साजिश रचते हैं। उन्होंने कहा, "हमारी टीमें पूरी तरह मुस्तैद हैं। सघन गश्त और सर्च ऑपरेशन के जरिए नक्सलियों के हर मंसूबे को नाकाम किया जाएगा।
पिछले कुछ वर्षों में बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा बलों ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। 2024 में 237 नक्सलियों को मार गिराया गया, जबकि 2025 में अब तक 225 नक्सली ढेर किए जा चुके हैं, जिनमें से अधिकांश बस्तर क्षेत्र से हैं। इनमें शीर्ष नक्सली नेता नंबला केशव राव उर्फ बसवा राजू भी शामिल था, जिसकी मृत्यु नक्सली संगठन के लिए बड़ा झटका थी।
हाल ही में 26 जुलाई को दंतेवाड़ा के मालेवाही क्षेत्र में सीआरपीएफ की 195वीं बटालियन और जिला बल ने एक सर्च ऑपरेशन के दौरान नक्सलियों के तीन स्मारकों को ध्वस्त किया। ये स्मारक मारे गए नक्सलियों आनंद सुदर्शन करटम, रामसू कोर्राम, जयमन और सनिता के नाम पर बनाए गए थे।
स्मारकों को कुल्हाड़ी और सब्बल से तोड़ा गया, जिससे नक्सलियों के प्रचार तंत्र को गहरा नुकसान पहुंचा। इस ऑपरेशन के दौरान ग्रामीणों से संपर्क कर नक्सलियों की गतिविधियों की जानकारी ली गई। ग्रामीणों ने पुलिस और प्रशासन पर भरोसा जताते हुए क्षेत्र में विकास कार्यों को तेज करने की मांग की।
नक्सलियों का शहीदी सप्ताह केवल प्रचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह उनकी हिंसक मानसिकता का खुला प्रदर्शन है। वे सड़कों को अवरुद्ध करते हैं, सुरक्षाबलों पर हमले की योजना बनाते हैं, और ग्रामीणों को डराने-धमकाने की कोशिश करते हैं। लेकिन बस्तर में बदलाव की हवा बह रही है।
सरकार की 'नियद नेल्ला नार' जैसी योजनाओं और पुनर्वास नीतियों के कारण पिछले 15 महीनों में 1521 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, जिनमें सैकड़ों महिला नक्सली शामिल हैं। ये महिलाएं, जो कभी गांवों में आतंक का पर्याय थीं, अब समाज की मुख्यधारा में लौट रही हैं। बस्तर में नए सुरक्षा कैंपों की स्थापना, सड़कों का निर्माण, स्कूल और अस्पतालों का विस्तार जैसे कदमों ने नक्सलियों की पकड़ को कमजोर किया है।
केंद्र और राज्य सरकार ने 31 मार्च 2026 तक बस्तर को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, "नक्सलवाद मानवता के खिलाफ एक अपराध है। इसे जड़ से खत्म करने के लिए हमारी सेनाएं पूरी ताकत से जुटी हैं।" इस दिशा में सीआरपीएफ की 91 बटालियनें, जिनमें 10 कोबरा बटालियनें शामिल हैं, बस्तर के जंगलों में नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ रही हैं।
नक्सलियों की हिंसक गतिविधियों का सबसे बड़ा शिकार बस्तर के जनजातीय समुदाय हैं। नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) से कई निर्दोष ग्रामीण अपनी जान गंवा चुके हैं।
मार्च 2025 में बीजापुर के उसूर गांव में सुशीला सोढ़ी की आईईडी विस्फोट में मृत्यु हो गई, जबकि सरस्वती ओयाम गंभीर रूप से घायल हुईं। ये घटनाएं नक्सलियों के क्रूर चेहरे को उजागर करती हैं, जो ग्रामीणों को ढाल बनाकर अपनी हिंसा को अंजाम देते हैं।
बस्तर की धरती, जो पिछले चार दशकों से नक्सली आतंक का गढ़ थी, अब शांति और विकास की ओर बढ़ रही है। सरकार की नीतियों, सुरक्षा बलों की सतर्कता और ग्रामीणों के बढ़ते भरोसे ने नक्सलियों को बैकफुट पर ला दिया है। बीजापुर में हाल ही में हुई मुठभेड़ में चार नक्सलियों को मार गिराया गया, जिन पर कुल 17 लाख रुपये का इनाम था। यह दिखाता है कि नक्सलियों का नेटवर्क अब कमजोर पड़ रहा है।
नक्सलवाद एक ऐसी बीमारी है, जो बस्तर के विकास को दशकों से बाधित करती रही है। यह न तो जनजातियों के हित में है और न ही देश के। नक्सलियों का तथाकथित शहीदी सप्ताह हिंसा और आतंक का पर्याय है, जिसे किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
बस्तर पुलिस और सीआरपीएफ की सख्त कार्रवाई ने यह साफ कर दिया है कि आतंक के इस खेल का अंत अब करीब है। ग्रामीणों का बढ़ता विश्वास और सरकार की विकास योजनाएं बस्तर को एक नई पहचान दे रही हैं, शांति, समृद्धि और उम्मीद की पहचान।