अर्बन नक्सलिज्म को केवल नारों, पोस्टरों और बहसों तक सीमित मानना वास्तविकता को अधूरा देखना है।
माओवादी संगठन के स्वयं के दस्तावेज संकेत देते हैं कि शहरी रणनीति का लक्ष्य केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि संस्थागत प्रभाव हासिल करना है।
माओवादियों के
Urban Perspective नामक लीक दस्तावेज में दर्ज
“Fractional Work” की अवधारणा इसी रणनीति का केंद्र है। दरअसल यही वो दस्तावेज है, जो बताता है कि शहरी संस्थाओं के भीतर रहकर दीर्घकालिक प्रभाव कैसे बनाया जाता है।
Urban Perspective स्पष्ट करता है कि शहरों में काम करने की पद्धति ग्रामीण और वन्य क्षेत्रों के सशस्त्र नक्सलवाद से अलग होगी। इसी में रेखांकित किया गया है कि शहरी क्षेत्र में माओवादी संगठन की खुली पहचान के साथ सामने आना व्यावहारिक नहीं है।
इसलिए एक वैकल्पिक तरीका अपनाने की बात कही गई है। इसी संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पंक्ति दर्ज है, “Fractional work is carried on within mass organisations.” इसका अर्थ है जनसंगठनों के भीतर रहकर काम करना। इससे संगठन बाहर से तो स्वतंत्र दिखाई देगा, लेकिन उसकी दिशा भीतर से प्रभावित की जा सकती है।
यह रणनीति आकस्मिक नहीं है। डॉक्युमेंट के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में माओवादी संगठन को भूमिगत रहकर काम करना चाहिए और सार्वजनिक मंचों पर सीधे पार्टी बैनर के साथ उपस्थित नहीं होना चाहिए। इसलिए “फ्रैक्शन” के रूप में कार्य करने की सलाह दी गई है। यानी किसी मौजूदा मंच, ट्रेड यूनियन, छात्र संगठन या सांस्कृतिक समूह के भीतर विचारधारात्मक प्रभाव बनाना और धीरे धीरे नेतृत्व की दिशा को प्रभावित करना, यही इसका उद्देश्य है।
Urban Perspective इस कार्य को सीमित दायरे तक नहीं रखता। इसमें विभिन्न क्षेत्रों का उल्लेख है, जहां इस प्रकार की पैठ बनाई जा सकती है। ट्रेड यूनियन, छात्र संगठन, महिला मंच, युवा समूह, बस्ती समितियां, सांस्कृतिक मंच, खेल संगठन, यहां तक कि पुस्तकालय और सामाजिक मंच भी इसमें शामिल हैं। यह सूची बताती है कि इनकी रणनीति बहुस्तरीय है और सामाजिक जीवन के विभिन्न हिस्सों में उपस्थिति दर्ज कराने का लक्ष्य रखती है।
माओवादियों का यह दस्तावेज यह भी सलाह देता है कि नए क्षेत्रों में काम करते समय अत्यधिक क्रांतिकारी (माओवादियों की अपनी उग्र) भाषा से बचा जाए। माओवादी-वामपंथी साहित्य खुले में वितरित न किया जाए और पहचान को अनावश्यक रूप से उजागर न किया जाए। उनकी सावधानी भी यह संकेत देती है कि शहरी रणनीति का केंद्र प्रत्यक्ष टकराव नहीं, बल्कि क्रमिक प्रभाव का निर्माण करना है। वास्तव में उनका लक्ष्य त्वरित नियंत्रण नहीं है, बल्कि समय के साथ वैचारिक दिशा बदलना है।
देखा जाए तो, Urban Perspective शहरी और ग्रामीण मोर्चों को अलग नहीं देखता। वह स्पष्ट करता है कि शहरी काम व्यापक “people’s war” की रणनीति का ही हिस्सा है। यानी शहरों में तैयार किया गया नेटवर्क ग्रामीण (वन्य) मोर्चे को वैचारिक, कानूनी और सामाजिक समर्थन दे सकता है। इसीलिए जब किसी माओवादी कार्रवाई के बाद शहरी क्षेत्रों में बयान, विरोध या अभियान सामने आते हैं, तो इस संदर्भ को ध्यान में रखना आवश्यक है।
बस्तर जैसे क्षेत्रों में
माओवादी हिंसा का प्रभाव प्रत्यक्ष और गंभीर रहा है। गांवों में भय का वातावरण, विकास कार्यों में बाधा और युवाओं की जबरन भर्ती जैसे मुद्दे सामने आते रहे हैं। लेकिन शहरी विमर्श में अक्सर नैरेटिव बदल दिया जाता है। शहरों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर अधिक जोर दिया जाता है, जबकि माओवादी हिंसा के प्रश्नपीछे छूट जाते हैं।
Urban Perspective इसी नैरेटिव निर्माण को रणनीतिक महत्व देता है।
जब किसी संगठन का दस्तावेज स्वयं यह कहता हो कि जनसंगठनों के भीतर रहकर काम किया जाए और माओवादी संगठन पहचान को छिपाकर प्रभाव बनाया जाए, तो उस रणनीति की जांच आवश्यक हो जाती है। Fractional Work की अवधारणा यही प्रश्न उठाती है कि कौन सा मंच स्वतंत्र है और कहां वैचारिक हस्तक्षेप की संभावना मौजूद है।
शहरी परिदृश्य में यह भी देखा गया है कि कुछ मंचों पर विमर्श एकतरफा दिशा में झुक जाता है। जब हर मुद्दे पर राज्य को आक्रामक और सुरक्षा बलों को दोषी ठहराया जाए और माओवदी हिंसक समूहों को प्रतिरोध का प्रतीक बताया जाए, तो संतुलन का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। माओवदियों के दस्तावेज की भाषा यह संकेत देती है कि ऐसा झुकाव योजनाबद्ध भी हो सकता है।
Urban Perspective में दर्ज “Fractional Work” की अवधारणा यह संकेत देती है कि शहरी माओवाद हमेशा प्रत्यक्ष रूप में नहीं दिखता। संस्थाएं बाहर से यथावत रह सकती हैं, लेकिन उनके भीतर निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।