मध्यप्रदेश की
राजनीति में इन दिनों जनजातीय पहचान और धर्म को लेकर एक नया विवाद उभर आया है। अनूपपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने जनजातीय समाज के लिए जनगणना में अलग धर्म कोड की
मांग उठाई और समुदाय से राष्ट्रपति को 50 लाख आवेदन भेजने की अपील की है।
यह विवाद केवल एक राजनीतिक बयान का मामला नहीं है। असल प्रश्न यह है कि क्या जनजातीय समाज को सनातन सांस्कृतिक परंपरा से अलग बताने की कोशिश उनके अधिकारों की रक्षा करती है या फिर यह वही पुरानी राजनीति है जिसमें समाज को पहचान के आधार पर विभाजित कर राजनीतिक लाभ लिया जाता है?
अनूपपुर में आयोजित एक सम्मेलन में बोलते हुए कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि जनजातीय समाज को अन्य धर्मों के अंतर्गत गिना जाता रहा तो उनकी विशिष्ट पहचान समाप्त हो जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जनजातीय समाज अपनी अलग पहचान खो देगा तो भविष्य में आरक्षण, वन अधिकार और अन्य संवैधानिक संरक्षण भी खतरे में पड़ सकते हैं।
लेकिन इस दावे की संवैधानिक और कानूनी वास्तविकता कुछ और है। भारत के संविधान में कहीं भी ऐसा प्रावधान नहीं है कि यदि कोई जनजातीय नागरिक स्वयं को हिंदू के रूप में दर्ज करता है तो उसके अनुसूचित जनजाति अधिकार समाप्त हो जाते हैं।
अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले अधिकार संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची तथा अनुसूचित जनजाति सूची के माध्यम से सुनिश्चित किए गए हैं। इन प्रावधानों के तहत उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण और वन अधिकार जैसे संरक्षण प्राप्त हैं। इन अधिकारों का किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान से कोई संबंध नहीं है। इसलिए यह कहना कि जनगणना में हिंदू लिखने से जनजातीय अधिकार समाप्त हो सकते हैं, संवैधानिक दृष्टि से तथ्यात्मक आधार नहीं रखता।
इतिहास और सांस्कृतिक अध्ययन के संदर्भ में भी जनजातीय समाज को भारत की व्यापक सनातन परंपरा से अलग करके देखना कठिन है। देश का जनजातीय समुदाय प्रकृति पूजा के साथ साथ शिव, शक्ति, देवी और ग्राम देवताओं की आराधना करते हैं। उनके पर्व, अनुष्ठान और जीवन पद्धति भारतीय संस्कृति की उस निरंतर परंपरा का हिस्सा हैं जिसमें प्रकृति और लोकदेवताओं का विशेष महत्व रहा है।
भारतीय सनातन सभ्यता का विकास केवल नगरों और राजधानियों में नहीं हुआ। जंगलों और पहाड़ों में बसे समुदायों ने भी इस सभ्यता को आकार दिया है। जनजातीय समाज की परंपराएं और लोक आस्थाएं उसी सांस्कृतिक धारा का विस्तार हैं जिसे भारतीय परंपरा ने सदियों से सनातन सभ्यता के रूप में पहचाना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहचान आधारित राजनीति अक्सर सामाजिक विभाजन को गहरा करती है। जब किसी समुदाय को व्यापक सांस्कृतिक परंपरा से अलग दिखाने की कोशिश की जाती है, तो उसका प्रभाव केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रहता। यह समाज की एकता और ऐतिहासिक संबंधों को भी प्रभावित करता है। कांग्रेस यहाँ यही करने की कोशिश कर रही है।
मध्यप्रदेश जैसे राज्य में यह बहस और भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहां जनजातीय आबादी राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्रदेश की बड़ी संख्या में विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं और जनजातीय क्षेत्र राजनीतिक दृष्टि से निर्णायक माने जाते हैं। ऐसे में अलग धर्म कोड की मांग को केवल सांस्कृतिक प्रश्न के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह सीधे कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति से भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है।