दुनिया को सेक्युलरिज्म का ज्ञान देने वाले अमेरिका का सच: अब "रिलीजियस वॉर" की नौटंकी पर उतरे ट्रंप

ईरान युद्ध के बीच ओवल ऑफिस में हुई एक ईसाई प्रार्थना सभा ने अमेरिका की सेक्यूलर छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रंप के लिए की गई प्रार्थनाओं और अमेरिकी सेना में युद्ध को “दैवीय मिशन” बताने के आरोपों ने एक नई बहस छेड़ दी है।

The Narrative World    07-Mar-2026   
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वॉशिंगटन से हाल ही में सामने आए एक दृश्य ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नई चर्चा शुरू कर दी है। व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में आयोजित एक प्रार्थना सभा में कई ईसाई पादरी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चारों ओर खड़े होकर उनके लिए प्रार्थना करते दिखाई दिए। पादरियों ने ट्रंप पर हाथ रखकर ईश्वर से उन्हें शक्ति देने की प्रार्थना की ताकि वे अमेरिका का नेतृत्व कर सकें और युद्ध के कठिन निर्णय ले सकें। यह दृश्य ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ चुका है और मध्य पूर्व का वातावरण पहले से अधिक संवेदनशील बना हुआ है।
 
यदि यह केवल एक रिलीजियस आयोजन होता तो शायद यह चर्चा का विषय नहीं बनता। लेकिन जिस समय यह प्रार्थना सभा आयोजित हुई और जिस तरह की रिपोर्टें अमेरिकी सेना के भीतर से सामने आई हैं, उन्होंने इस घटनाक्रम को व्यापक राजनीतिक और वैचारिक बहस में बदल दिया है। सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका, जो स्वयं को लंबे समय से सेक्यूलर लोकतंत्र का प्रतीक बताता रहा है, अब अपनी ही घोषित अवधारणा से दूर जाता दिखाई दे रहा है?
 
अमेरिकी संविधान की बुनियाद में कथित तौर पर चर्च और राज्य के बीच स्पष्ट दूरी का सिद्धांत मौजूद है। संविधान के पहले संशोधन में यह सुनिश्चित किया गया था कि राज्य किसी एक रिलीजन को बढ़ावा नहीं देगा और नागरिकों की रिलीजियस स्वतंत्रता सुरक्षित रहेगी। इसी सिद्धांत को अमेरिकी लोकतंत्र की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।
 
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फिर भी इतिहास बताता है कि अमेरिका में चर्च और राजनीति का संबंध कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी तक रिलीजियस विचारधारा का प्रभाव अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में बना रहा। शीत युद्ध के दौर में अमेरिका ने स्वयं को केवल एक लोकतांत्रिक शक्ति ही नहीं बल्कि एक नैतिक और रिलीजियस सभ्यता के प्रतिनिधि के रूप में भी प्रस्तुत किया। इसके बावजूद औपचारिक रूप से अमेरिकी राज्य ने हमेशा यह दावा किया कि उसकी नीतियां चर्च से संचालित नहीं होतीं। यही कारण है कि अमेरिका अक्सर दुनिया के अन्य देशों को सेक्यूलर मूल्यों का पाठ पढ़ाता रहा है और कई बार रिलीजियस कट्टरता के आरोपों के आधार पर देशों पर प्रतिबंध या राजनीतिक दबाव भी डालता रहा है।
 
इसी संदर्भ में ओवल ऑफिस की प्रार्थना सभा ने कई लोगों को चौंकाया है। वीडियो में ईसाई पादरी ट्रंप के चारों ओर खड़े होकर उन्हें "ईश्वर का संरक्षण" प्राप्त नेता बताते दिखाई देते हैं। यह दृश्य उस समय सामने आया जब अमेरिका ईरान के साथ बढ़ते सैन्य तनाव के बीच खड़ा है। लोगों का कहना है कि यदि किसी लोकतांत्रिक देश के सर्वोच्च कार्यालय में युद्ध के बीच इस तरह की रिलीजियस भाषा का इस्तेमाल किया जाता है तो यह केवल व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं रह जाता, यह उस राजनीतिक संदेश का हिस्सा बन जाता है जिसमें युद्ध को नैतिक या दैवीय औचित्य देने की कोशिश दिखाई देती है।
 
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इस बहस को और गहरा करने वाली एक और रिपोर्ट सामने आई है। अमेरिकी सैन्य व्यवस्था में रिलीजियस स्वतंत्रता की निगरानी करने वाली संस्था Military Religious Freedom Foundation ने दावा किया है कि ईरान से जुड़े सैन्य अभियानों के बाद उसे 200 से अधिक अमेरिकी सैनिकों से शिकायतें मिली हैं। इन शिकायतों में कहा गया है कि कुछ वरिष्ठ अधिकारी सैनिकों को संबोधित करते हुए इस संघर्ष को ईश्वर की योजना के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। कुछ सैनिकों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें यह बताया गया कि वे एक दैवीय मिशन का हिस्सा हैं और उनका युद्ध केवल रणनीतिक नहीं बल्कि रिलीजियस अर्थ भी रखता है।
यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह अमेरिकी सैन्य परंपरा के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है। अमेरिकी सेना कथित रूप से सेक्यूलर ढांचे पर आधारित है और उसमें किसी विशेष रिलीजियस विचारधारा को बढ़ावा देना नियमों के खिलाफ माना जाता है।
 
डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति में रिलीजियस समूहों की भूमिका पहले से महत्वपूर्ण रही है। विशेष रूप से अमेरिकी इवेंजेलिकल ईसाई समुदाय ने ट्रंप को लगातार समर्थन दिया है। इस समुदाय के कई नेता ट्रंप को ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं जो अमेरिका की पारंपरिक ईसाई पहचान की रक्षा कर सकता है। इसी पृष्ठभूमि में ओवल ऑफिस की प्रार्थना सभा को कई विश्लेषक केवल रिलीजियस आयोजन के रूप में नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देख रहे हैं। उनके अनुसार यह उस गठबंधन का सार्वजनिक प्रदर्शन है जो ट्रंप और ईसाई समूहों के बीच लंबे समय से बना हुआ है।
 
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ट्रंप प्रशासन ने कई मौकों पर रिलीजियस प्रतीकों का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक वैधता मजबूत करने के लिए किया है, लेकिन जब किसी नेता को सार्वजनिक रूप से ईश्वर की योजना का हिस्सा बताया जाता है तो यह केवल श्रद्धा का प्रदर्शन नहीं रहता। यह एक ऐसी राजनीतिक कथा का हिस्सा बन जाता है जिसमें नेता को विशेष ऐतिहासिक या दैवीय भूमिका में प्रस्तुत किया जाता है।
 
 
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका लंबे समय से स्वयं को वैश्विक सेक्यूलर नैतिक व्यवस्था का संरक्षक बताता रहा है। वह कई देशों की आलोचना करता रहा है कि वहां रिलीजन और राजनीति का खतरनाक मेल दिखाई देता है। मध्य पूर्व, एशिया और अफ्रीका के कई देशों पर अमेरिका ने रिलीजियस कट्टरता के आरोप लगाए हैं और कई बार उसी आधार पर राजनीतिक दबाव या आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं।
 
लेकिन जब अमेरिका के भीतर ही सत्ता और चर्च के बीच ऐसी निकटता दिखाई देती है तो यह उसकी नैतिक विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है। यदि अमेरिका वास्तव में सेक्यूलर मूल्यों का समर्थक है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपने राजनीतिक व्यवहार में भी उसी सिद्धांत का पालन करे।
 
 
ईरान लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि पश्चिम उसके खिलाफ केवल राजनीतिक या रणनीतिक नहीं बल्कि वैचारिक संघर्ष चला रहा है। यदि अमेरिका के भीतर से ऐसी खबरें सामने आती हैं कि युद्ध को रिलीजियस भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है तो यह ईरान के उस तर्क को मजबूती दे सकती हैं। मध्य पूर्व का इतिहास बताता है कि जब किसी संघर्ष को रिलीजियस पहचान के साथ जोड़ दिया जाता है तो उसका प्रभाव बहुत व्यापक हो जाता है। वह केवल सैन्य संघर्ष नहीं रह जाता बल्कि विश्वास और पहचान के टकराव के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगता है।
 
अमेरिका का लोकतांत्रिक ढांचा कथित तौर पर सेक्यूलर संस्थाओं पर आधारित है। लेकिन यह घटनाक्रम एक बड़े प्रश्न को सामने लाता है कि क्या अमेरिका में सत्ता के लिए रिलीजियस प्रतीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। और यदि ऐसा है तो क्या यह प्रवृत्ति उन सिद्धांतों को कमजोर कर सकती है जिन पर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था आधारित है।
 
 
ओवल ऑफिस की प्रार्थना सभा का दृश्य केवल एक रिलीजियस प्रक्रिया का चित्र नहीं था। उसने अमेरिका की उस छवि पर भी सवाल खड़े किए हैं जो स्वयं को सेक्यूलर लोकतंत्र का उदाहरण बताती रही है। जब युद्ध के समय राजनीतिक नेतृत्व को दैवीय मिशन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो यह केवल आस्था का मामला नहीं रहता। यह सत्ता और चर्च के उस संबंध की याद दिलाता है जिसे आधुनिक लोकतंत्रों ने लंबे संघर्ष के बाद सीमित करने की कोशिश की थी।
 
ईरान के साथ तनाव के बीच यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में नैतिकता और शक्ति के बीच संतुलन कितना नाजुक होता है। यदि रिलीजन को युद्ध की भाषा में शामिल किया जाता है तो उसका प्रभाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को भी प्रभावित करता है।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार