लाल गलियारे का सच: रणनीति, विस्तार और पतन | भाग 4: राज्य की वापसी और बदलता समीकरण

माओवादी प्रभाव के लंबे दौर के बाद एक ऐसा समय आया जब राज्य ने अपनी रणनीति बदली और समन्वित कार्रवाई के साथ जमीनी स्तर पर उपस्थिति मजबूत की। सुरक्षा और विकास के संयुक्त प्रयासों ने कई क्षेत्रों में संतुलन बदल दिया।

The Narrative World    14-Apr-2026   
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एक समय ऐसा था जब माओवादी आतंक के कारण देश के कई हिस्सों में सरकार की उपस्थिति सवालों के घेरे में थी। दूरस्थ इलाकों में प्रशासन की पहुंच सीमित थी, सुरक्षा बलों की गतिविधियां बाधित थीं और कई क्षेत्रों में माओवादी प्रभाव लगातार बढ़ रहा था। लेकिन यही वह बिंदु भी था, जहां से स्थिति बदलनी शुरू हुई।
 
यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि यह उस रणनीतिक पुनर्विचार का परिणाम था, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि केवल आंशिक या असंगत प्रतिक्रिया से इस चुनौती का समाधान संभव नहीं है। जिस रणनीति के तहत माओवादी समूह धीरे-धीरे राज्य की उपस्थिति को कमजोर कर रहे थे, उसी के जवाब में राज्य ने अपनी उपस्थिति को व्यवस्थित और स्थायी रूप से मजबूत करने का निर्णय लिया।
 
यह बदलाव वर्ष 2014 के बाद दिखाई देना शुरू किया। सबसे पहले बदलाव रणनीति के स्तर पर की गई। पहले जहां विभिन्न राज्यों में अलग-अलग तरीके से कार्रवाई की जाती थी, वहीं बाद में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया गया। यह समझ विकसित हुई कि यह केवल एक राज्य या क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि एक व्यापक आंतरिक सुरक्षा चुनौती है, जिसके लिए एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है।
 
इस समन्वय का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि सुरक्षा अभियानों में निरंतरता आई। पहले जहां कई बार अभियान शुरू होकर बीच में रुक जाते थे, वहीं अब उन्हें योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाने लगा। सुरक्षा बलों की तैनाती केवल प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसे एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बनाया गया।
 
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जमीनी स्तर पर इसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा। बस्तर जैसे क्षेत्रों में, जहां कभी सुरक्षा बलों की आवाजाही भी सीमित थी, वहां धीरे-धीरे उनकी उपस्थिति बढ़ाई गई। नए कैंप स्थापित किए गए, जिससे दूरस्थ इलाकों तक पहुंच संभव हो सकी। इन कैंपों ने केवल सुरक्षा प्रदान नहीं की, बल्कि उन्होंने प्रशासनिक ढांचे को भी मजबूत करने में भूमिका निभाई।
 
इस प्रक्रिया को अक्सर “एरिया डोमिनेशन” की रणनीति के रूप में समझा जाता है। इसका उद्देश्य केवल किसी क्षेत्र में प्रवेश करना नहीं, बल्कि वहां निरंतर उपस्थिति बनाए रखना था। जब सुरक्षा बल किसी इलाके में स्थायी रूप से मौजूद रहते हैं, तो माओवादी समूहों के लिए वहां अपनी गतिविधियां जारी रखना कठिन हो जाता है। यही वह बदलाव था, जिसने धीरे-धीरे उनके प्रभाव क्षेत्र को सीमित करना शुरू किया।
 
 
खुफिया तंत्र को मजबूत करना भी इस रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। पहले जहां कई बार जानकारी समय पर उपलब्ध नहीं हो पाती थी, वहीं बाद में स्थानीय स्तर पर सूचनाओं के संग्रह और उनके विश्लेषण पर अधिक ध्यान दिया गया। इससे अभियानों की सटीकता बढ़ी और सुरक्षा बलों को बेहतर तैयारी के साथ कार्रवाई करने का अवसर मिला।
 
इस पूरी प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका भी बढ़ी। संचार साधनों में सुधार, निगरानी के बेहतर साधन और विभिन्न एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था ने इस अभियान को अधिक प्रभावी बनाया।
 
हालांकि, केवल सुरक्षा उपायों के आधार पर इस चुनौती का समाधान संभव नहीं था। यह भी स्पष्ट हुआ कि जिन क्षेत्रों में माओवादी प्रभाव मजबूत रहा है, वहां विकास की कमी एक बड़ा कारण रही है। इसलिए रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह किया गया कि सुरक्षा और विकास को एक साथ आगे बढ़ाया जाए।
 
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सड़क निर्माण, संचार नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा जैसी सुविधाओं को प्राथमिकता दी गई। जहां पहले सड़कें नहीं थीं, वहां नए मार्ग बनाए गए। जहां संचार व्यवस्था कमजोर थी, वहां मोबाइल नेटवर्क और अन्य सुविधाएं पहुंचाई गईं। यह केवल विकास परियोजनाएं नहीं थीं, बल्कि वे राज्य की उपस्थिति का प्रतीक भी बन गईं।
 
इसका असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। जहां पहले लोग बाहर जाने से डरते थे, वहां अब आवागमन बढ़ने लगा। बाजार सक्रिय हुए, स्थानीय अर्थव्यवस्था में गति आई और लोगों का जीवन सामान्य होने लगा।
 
 
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि स्थानीय समाज के साथ संवाद बढ़ाया गया। पहले जहां भय और अविश्वास का माहौल था, वहां अब धीरे-धीरे विश्वास बनने लगा। सुरक्षा बलों और प्रशासन ने केवल कार्रवाई तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने लोगों के साथ संपर्क स्थापित करने पर भी ध्यान दिया।
 
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इस पूरी प्रक्रिया का परिणाम यह हुआ कि माओवादी समूहों का प्रभाव धीरे-धीरे सिमटने लगा। जिन क्षेत्रों में उनका नियंत्रण मजबूत था, वहां उनकी गतिविधियां सीमित होने लगीं। कई स्थानों पर उनके शीर्ष नेतृत्व को भी नुकसान पहुंचा, जिससे उनके संगठनात्मक ढांचे पर असर पड़ा।
 
साथ ही, आत्मसमर्पण के मामलों में भी वृद्धि देखी गई। यह केवल सुरक्षा दबाव का परिणाम नहीं था, बल्कि यह उस बदलते वातावरण का संकेत भी था, जहां माओवादी विचारधारा का प्रभाव कम होने लगा था और लोग मुख्यधारा की ओर लौटने लगे थे।
 
हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि यह चुनौती पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। कई क्षेत्रों में अभी भी माओवादी गतिविधियां जारी हैं और समय-समय पर घटनाएं सामने आती रहती हैं। लेकिन यह भी उतना ही स्पष्ट है कि उनकी क्षमता और प्रभाव में पहले की तुलना में कमी आई है।
 
 
यह परिवर्तन केवल एक रणनीति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है जिसमें सुरक्षा, विकास और प्रशासन तीनों को एक साथ जोड़ा गया।
 
यदि इस पूरे घटनाक्रम को व्यापक दृष्टि से देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि जहां पहले राज्य की प्रतिक्रिया असंगत और सीमित थी, वहीं अब वह अधिक संगठित और उद्देश्यपूर्ण हो गई है। यही वह अंतर है, जिसने इस संघर्ष की दिशा को बदलने में भूमिका निभाई।
 
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अंततः, यह कहा जा सकता है कि यह केवल जवाबी कार्रवाई नहीं थी, बल्कि एक रणनीतिक पुनर्निर्माण था। राज्य ने न केवल अपनी उपस्थिति को मजबूत किया, बल्कि उसने उस मॉडल को भी बदला, जिसके तहत इस चुनौती का सामना किया जा रहा था।
 
यही कारण है कि आज स्थिति पहले की तुलना में अलग दिखाई देती है। जहां एक समय माओवादी प्रभाव लगातार बढ़ रहा था, वहीं अब वह सिमटता हुआ नजर आता है। और शायद यही इस पूरे परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण संकेत है, जब राज्य ने पीछे हटना बंद किया, तभी माओवादी पीछे हटने लगे।

शुभम उपाध्याय

संपादक, स्तंभकार, टिप्पणीकार