
वर्ष 1542 का गोवा समुद्र के किनारे बसा हुआ एक सामान्य व्यापारिक नगर नहीं था। बाहर से देखने पर वह अब भी मसालों, घोड़ों, हाथी-दाँत, कपड़ों और समुद्री व्यापार की हलचल से भरा हुआ दिखाई देता था, लेकिन उसके भीतर एक धीमा परिवर्तन शुरू हो चुका था। बंदरगाह पर खड़े जहाज केवल व्यापारी माल लेकर नहीं आते थे; वे अपने साथ एक नई सत्ता, नई रिलीजियस दृष्टि और एक अलग सभ्यतागत मानसिकता भी लेकर आते थे।
दिन में अरब व्यापारी सौदे करते दिखाई देते, स्थानीय हिंदू व्यापारी गोदामों में माल की निगरानी करते, मछुआरे समुद्र से लौटते और मंदिरों की घंटियाँ दूर तक सुनाई देतीं। लेकिन उसी नगर की दूसरी परत में यूरोपीय चर्च, पुर्तगाली सैनिक और मिशनरी नेटवर्क अपनी जगह बना रहे थे। गोवा अब केवल गोवा नहीं रह गया था। वह एशिया में "church-state experiment" की पहली बड़ी प्रयोगशाला बनता जा रहा था।

गोवा सदियों से समुद्री संपर्कों का नगर था। अरबों, फारसियों और दक्षिण भारतीय व्यापारियों के जहाज़ यहाँ आते थे। मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं थे; वे सामाजिक जीवन के केंद्र थे। कई मंदिरों के पास अपनी भूमि थी, अपनी आर्थिक व्यवस्था थी और स्थानीय समाज में उनका गहरा प्रभाव था। त्योहारों के समय पूरा नगर जीवित हो उठता था। समुद्र और परंपरा यहाँ साथ-साथ चलते थे। लेकिन 1510 में Afonso de Albuquerque द्वारा गोवा पर कब्ज़ा किए जाने के बाद एक नया ढाँचा धीरे-धीरे आकार लेने लगा।
पुर्तगालियों ने गोवा को केवल एक व्यापारिक चौकी की तरह नहीं देखा। उनके लिए यह एशिया में स्थायी सत्ता स्थापित करने का आधार था। यूरोप में सदियों से विकसित church-state alliance अब समुद्र पार भारत तक पहुँच चुका था। पुर्तगाली सत्ता समझती थी कि केवल सैनिक नियंत्रण पर्याप्त नहीं होगा। किसी समाज पर स्थायी प्रभाव स्थापित करने के लिए उसकी सांस्कृतिक और धार्मिक संरचनाओं के भीतर प्रवेश करना आवश्यक होता है। यही वह स्थान था जहाँ मिशनरीज़ की भूमिका शुरू होती थी।

फ्रांसिस ज़ेवियर जब गोवा पहुँचा, तब तक शहर में चर्च की उपस्थिति दिखाई देने लगी थी। लेकिन यह अभी प्रारंभिक अवस्था थी। यूरोपीय चर्च संरचना को भारत की वास्तविकता समझने में समय लग रहा था। भारतीय समाज यूरोप जैसा नहीं था। यहाँ धर्म केवल चर्च जैसी केंद्रीकृत संस्था का विषय नहीं था। वह जीवन के हर हिस्से में उपस्थित था; परिवार, भोजन, उत्सव, व्यापार, संगीत, लोककथाएँ और सामाजिक संबंध, सबके भीतर था।
यही कारण था कि Jesuit मिशनरीज़ जल्दी ही समझ गए कि भारत में कन्वर्ज़न केवल व्यक्तिगत आस्था परिवर्तन का प्रश्न नहीं होगा। यदि किसी व्यक्ति का नाम बदल भी दिया जाए, तब भी उसकी स्मृतियाँ, उसके त्योहार और उसके सांस्कृतिक संबंध उसे पुराने संसार से जोड़े रखेंगे। यही वह बिंदु था जहाँ से Jesuit रणनीति गहरी होने लगी।

गोवा की गलियों में उस समय दो संसार साथ-साथ दिखाई देते थे। एक पुराना संसार था; मंदिरों, समुद्री व्यापार और स्थानीय समुदायों का संसार। दूसरा नया संसार था; चर्चों, यूरोपीय प्रशासनिक भवनों और पुर्तगाली सैनिक चौकियों का संसार। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया था। और शायद इसी कारण वह अधिक प्रभावशाली था। साम्राज्य हमेशा केवल युद्धों से नहीं बदलते। कई बार वे धीरे-धीरे भाषा, शिक्षा, कानून और धार्मिक संरचनाओं के माध्यम से समाज की आत्मा में प्रवेश करते हैं।
फ्रांसिस ज़ेवियर ने जल्दी ही समझ लिया कि यदि चर्च को भारत में स्थायी आधार बनाना है, तो उसे स्थानीय ढाँचा तैयार करना होगा। केवल यूरोपीय पादरियों के सहारे विशाल भारतीय समाज तक पहुँचना संभव नहीं था। इसी सोच के भीतर से College of St. Paul की स्थापना हुई। बाद के वर्षों में चर्च इतिहासकारों ने इसे शिक्षा के क्षेत्र में महान उपलब्धि की तरह प्रस्तुत किया, लेकिन 16वीं शताब्दी के गोवा में इसका वास्तविक अर्थ कहीं अधिक गहरा था। यह एशिया में Jesuit institutional expansion का पहला बड़ा केंद्र था।

इस कॉलेज में केवल रिलीजियस शिक्षा नहीं दी जाती थी। यहाँ एक नया मिशनरी क्लास तैयार किया जा रहा था। स्थानीय युवाओं को Latin prayers, catechism, church doctrine और missionary discipline सिखाया जाता था। उन्हें केवल धार्मिक व्यक्ति नहीं बनाया जा रहा था; उन्हें church authority का विस्तार बनने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा था।
Jesuits की सबसे बड़ी शक्ति यही थी कि वे तत्काल परिणामों से अधिक दीर्घकालिक संरचनाओं पर काम करते थे। वे जानते थे कि यदि किसी समाज की अगली पीढ़ी को church-controlled education के भीतर लाया जा सके, तो आने वाले दशकों में वही समाज अलग दिशा में बढ़ने लगेगा। St. Paul College इसी दीर्घकालिक सोच का हिस्सा था।
सुबह के समय जब गोवा की गलियों में स्थानीय बाज़ार खुलते, उसी समय कॉलेज के भीतर युवा छात्रों को चर्च का अनुशासन सिखाया जाता। घंटियों की आवाज़ के साथ यीशु की प्रार्थनाएँ शुरू होतीं। यूरोप से आए पादरी उन्हें “सच्ची आस्था” की शिक्षा देते। कई छात्रों के लिए यह केवल शिक्षा का अवसर था। कई गरीब परिवारों के लिए चर्च की संस्थाएँ आर्थिक सुरक्षा का माध्यम भी बनने लगे थे। लेकिन इन संस्थानों के भीतर धीरे-धीरे एक नई पहचान गढ़ी जा रही थी, एक ऐसी पहचान जो स्थानीय सभ्यतागत स्मृति से अधिक चर्च के प्रति श्रद्धा पर आधारित हो।

Jesuits यह समझ चुके थे कि केवल बपतिस्मा पर्याप्त नहीं है। यदि कन्वर्ट व्यक्ति अपने पुराने सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण से पूरी तरह अलग न हो, तो चर्च का प्रभाव अधूरा रहेगा। यही कारण था कि उनके पत्रों में बार-बार “प्राचीन परम्पराओं” और “मूर्ति अथवा प्रतिमाओं” के प्रति चिंता दिखाई देती है।
फ्रांसिस ज़ेवियर स्वयं लिखता है कि कई नए कन्वर्ट्स अभी भी घरों में पुराने देवताओं की पूजा करते हैं। चर्च की प्रथाओं को स्वीकार करने के बाद भी वे स्थानीय त्योहारों और पारिवारिक परंपराओं से जुड़े हुए हैं। Jesuit दृष्टि के लिए यह अस्वीकार्य था, क्योंकि उनके लिए कन्वर्ज़न केवल नाम बदलना नहीं था; वह अस्तित्व का बदलना था। यहीं से गोवा के भीतर एक अदृश्य तनाव जन्म लेने लगा।

स्थानीय समाज पहली बार ऐसी शक्ति का सामना कर रहा था जो केवल राजनीतिक शासन नहीं चाहती थी। वह समाज की धार्मिक दिशा को भी बदलना चाहती थी। भारत के पुराने राजवंश बदलते थे, लेकिन समाज की मूल सांस्कृतिक संरचना अक्सर बनी रहती थी। पुर्तगाली-Jesuit मॉडल अलग था। यहाँ चर्च, प्रशासन और समुद्री शक्ति एक-दूसरे के पूरक बनते जा रहे थे।
गोवा के बंदरगाह पर उस समय आने वाले यूरोपीय जहाज़ों को देखने वाले स्थानीय लोगों के लिए शायद यह केवल विदेशी व्यापार का विस्तार था। लेकिन उन जहाज़ों के साथ यूरोपीय विचार भी आ रहे थे। यूरोप की वह मानसिकता, जो स्वयं को “सभ्य” और बाकी समाजों को “बुतपरस्त” या “मूर्तिपूजक” समझती थी, धीरे-धीरे प्रशासनिक और धार्मिक व्यवहार का हिस्सा बन रही थी। चर्च की भाषा में बार-बार “saving souls” शब्द आता था।
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पहली दृष्टि में यह करुणा का भाव प्रतीत होता है, लेकिन उसके भीतर एक गहरी वैचारिक संरचना छिपी हुई थी। इसका अर्थ यह था कि चर्च स्वयं को सत्य का अंतिम स्रोत मानता था और बाकी समाजों की धार्मिक परंपराओं को अधूरा या गलत समझता था।
जब कोई शक्ति स्वयं को सम्पूर्ण सत्य का स्वामी मान लेती है, तब दूसरे समाजों की परंपराएँ उसके लिए सम्मान का विषय नहीं रह जातीं। वे “समस्या” बन जाती हैं। गोवा में यही प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी।
फ्रांसिस ज़ेवियर के पत्रों में यह असहजता स्पष्ट दिखाई देती है कि कई स्थानीय लोग बपतिस्मा के बाद भी अपने पुराने देवताओं से पूरी तरह अलग नहीं हो रहे थे। वह बार-बार इस बात पर जोर देता है कि कन्वर्ट्स को पुराने धार्मिक प्रतीकों से दूर किया जाए। उसके लिए यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं था; यह अधिकार का प्रश्न था। यदि नए कन्वर्ट्स अपने पुराने सामाजिक ढाँचे से जुड़े रहे, तो चर्च का नियंत्रण अधूरा रहेगा।

धीरे-धीरे गोवा का दृश्य बदलने लगा। चर्चों के आसपास नए ईसाई बस्तियाँ उभरने लगे। प्रशासनिक पदों में चर्च का प्रभाव बढ़ा। पुर्तगाली कानून स्थानीय परंपराओं के ऊपर रखा जाने लगा। शहर के भीतर यूरोपीय वास्तुकला दिखाई देने लगी। कुछ स्थानों पर पुराने सामाजिक केंद्रों की जगह चर्च-संबंधित संरचनाएँ विकसित होने लगीं। परिवर्तन अभी धीमा था, लेकिन उसकी दिशा स्पष्ट थी। और यही वह समय था जब Jesuit नेटवर्क ने गोवा से बाहर देखने की शुरुआत की।
दक्षिण भारत के तटीय क्षेत्रों, विशेषकर Parava मछुआरों के बीच चर्च की गतिविधि बढ़ने लगी। पुर्तगाली समुद्री शक्ति ने इन क्षेत्रों में सुरक्षा प्रणाली विकसित किया। बदले में बपतिस्मा की प्रक्रिया तेज हुई। लेकिन यह केवल धार्मिक घटना नहीं थी। यह "तटीय नियंत्रण रणनीति" भी थी। यदि समुद्री समुदाय चर्च के प्रभाव में आ जाएँ, तो समुद्री व्यापार और तटीय सत्ता दोनों पर प्रभाव बढ़ाया जा सकता था।
फ्रांसिस ज़ेवियर इन अभियानों में सक्रिय भूमिका निभा रहा था। उसके पत्रों में हड़बड़ी दिखाई देती है; अधिक कन्वर्ट्स, अधिक चर्च, अधिक मिशनरी उपस्थिति को लेकर वह तेज गति चाह रहा था। लेकिन उसके शब्दों के पीछे केवल रिलजियस उत्साह नहीं था। वहाँ एक सभ्यतागत निश्चितता भी थी, यह विश्वास था कि भारतीय धार्मिक परंपराएँ “गलत” हैं और उन्हें बदलना चाहिए।

यही Jesuit मिशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी। वे केवल संवाद नहीं कर रहे थे। वे बदलाव की प्रक्रिया चला रहे थे। और यह बदलाव केवल मंदिर बनाम चर्च का संघर्ष नहीं था। यह स्मृतियों का संघर्ष था। त्योहारों का संघर्ष था। शिक्षा का संघर्ष था। भविष्य की दिशा का संघर्ष था।
1540 के दशक का गोवा अभी उस अंतिम अवस्था तक नहीं पहुँचा था, जिसे बाद के वर्षों में Goa Inquisition के रूप में जाना जाएगा। अभी दमन की संरचना पूरी तरह विकसित नहीं हुई थी। अभी मंदिरों के विरुद्ध बड़े अभियान अपनी चरम अवस्था में नहीं पहुँचे थे। लेकिन आधारशिला रखी जा चुकी थीं। Jesuit संस्थाएँ बन चुके थे। "चर्च-प्रशासन गठबंधन" मजबूत हो रहा था। और कन्वर्ज़न को केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्गठन की प्रक्रिया की तरह देखा जाने लगा था।
समुद्र के किनारे खड़ा गोवा बाहर से अब भी व्यापारिक नगर दिखाई देता था। जहाज़ आते थे, बाज़ार चलते थे, त्योहार मनाए जाते थे। लेकिन शहर की गहराई में एक नया ढाँचा जन्म ले चुका था। धीरे-धीरे। चुपचाप। और आने वाले वर्षों में वही ढाँचा गोवा के इतिहास को हमेशा के लिए बदलने वाला था।
संदर्भ
* Sita Ram Goel, Francis Xavier SJ – The Man And His Mission
* Joseph Wicki, Documenta Indica, Vol. I
* History of Christianity in India, Vol. I
* C.R. Boxer, studies on Portuguese Goa and missionary expansion