
बस्तर को लेकर देश के एक हिस्से की पत्रकारिता अब लगातार एक खतरनाक दिशा में जाती दिखाई दे रही है। यह पत्रकारिता बस्तर को समझने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसे पहले से तय वैचारिक एजेंडे में फिट करने की कोशिश करती है। यहां के जनजातीय समाज की सांस्कृतिक संरचना, ग्रामसभा की भूमिका, पांचवीं अनुसूची के अधिकार, पारंपरिक व्यवस्था और कन्वर्ज़न से पैदा हुए सामाजिक तनाव को समझने के बजाय एक ऐसा भावनात्मक आख्यान गढ़ा जा रहा है, जिसमें हर बार “पीड़ित ईसाई”, “हिंसक जनजाति”, “असहाय महिलाएं”, “चुप प्रशासन” और “अमानवीय परंपरा” का नैरेटिव दिखाई देता है।
दैनिक भास्कर में प्रकाशित हालिया रिपोर्ट इसी पैटर्न का नया उदाहरण है। यह पहली बार नहीं है। इससे पहले भी बस्तर से जुड़ी रिपोर्ट में इसी तरह की भावनात्मक और एकपक्षीय प्रस्तुति दिखाई दे चुकी है। लेकिन इस बार जिस तरह से पूरी घटना को "सिनेमैटिक हॉरर" की तरह प्रस्तुत किया गया, उसने यह प्रश्न और गंभीर बना दिया है कि क्या वास्तव में यह पत्रकारिता है, या फिर बस्तर के जनजातीय समाज के विरुद्ध एक वैचारिक नैरेटिव?

रिपोर्ट की शुरुआत ही इस तरह की गई कि पढ़ने वाले का मनोवैज्ञानिक निष्कर्ष पहले ही तय हो जाए। “भीड़ कब्र खोद रही थी”, “सड़ी हुई लाश घसीटी जा रही थी”, “कफन के चीथड़े”, “डरे हुए बच्चे”, “भागता हुआ परिवार”, इस तरह की भाषा किसी तथ्यात्मक ग्राउंड रिपोर्ट की नहीं, बल्कि एक पहले से तय लाइन की तरह दिखाई देती है। रिपोर्ट पढ़ते ही पाठक के मन में एक छवि बना दी जाती है कि बस्तर का जनजातीय समाज हिंसक, असभ्य और अमानवीय है। इसके बाद रिपोर्ट में चाहे जो तथ्य आएं, पाठक पहले ही भावनात्मक रूप से यही सोचने लग जाता है।
लेकिन जब इस पूरे मामले की वास्तविक ग्राउंड रिपोर्टिंग देखी गई, गांव के लोगों, स्थानीय प्रशासन, सामाजिक प्रतिनिधियों और क्षेत्रीय संदर्भों को समझा गया, तब तस्वीर पूरी तरह अलग दिखाई देती है। वास्तविक विवाद केवल “ईसाई होने” का नहीं था। मामला सामुदायिक सहमति, ग्रामसभा अधिकार, पारंपरिक अंतिम संस्कार व्यवस्था, निजी भूमि पर दफन और बाहरी हस्तक्षेप से जुड़ा हुआ था। लेकिन इन सभी पहलुओं को दैनिक भास्कर के पत्रकार नीरज झा ने अपनी रिपोर्ट से लगभग गायब कर दिया गया।

सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर ग्रामसभा की भूमिका को पूरी तरह अदृश्य क्यों कर दिया गया? यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां स्थानीय जनजातीय समुदायों को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक व्यवस्था को संरक्षित करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। गांवों में अंतिम संस्कार स्थल केवल जमीन का टुकड़ा नहीं होते। वे सामुदायिक और धार्मिक परंपरा से जुड़े हुए स्थान होते हैं। लेकिन रिपोर्ट में ऐसा दिखाया गया, मानो जनजाति समाज बिना किसी कारण केवल धार्मिक घृणा के आधार पर हिंसक हो गया हो।
यही इस पूरी रिपोर्ट का सबसे बड़ा बौद्धिक छल है। संघर्ष को उसके वास्तविक सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ से काट देना और फिर उसे “उत्पीड़न” के फ्रेम में फिट कर देना।
इसके उलट, जनजातीय परंपराओं को जिस भाषा में प्रस्तुत किया गया, वह और भी चिंताजनक है। जनजाति समाज की अंतिम संस्कार परंपराओं का वर्णन इस तरह किया गया कि पढ़ने वाले के मन में उनके प्रति घृणा और असभ्यता की भावना पैदा हो। “दारू गिराते हैं”, “जानवर खाते हैं”, “अजीब रस्में करते हैं”, यह केवल विवरण नहीं है, यह मन में ऐसी नकारात्मक दृष्टिकोण डालने की कोशिश है, जिसमें जनजाति समाज असभ्य लगे। इसमें एक तरफ “सभ्य, पीड़ित ईसाई” की छवि बनाई जाती है और दूसरी तरफ “हिंसक, पिछड़ा जनजाति समाज” की। यह वही औपनिवेशिक मानवशास्त्र शैली की रूपरेखा है, जिसका उपयोग दशकों तक जनजातीय समाजों को “सभ्य” करने के नाम पर किया जाता रहा।

सबसे गंभीर बात यह है कि दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में भीम आर्मी के हस्तक्षेप और संगठित लामबंदी की भूमिका को लगभग छिपा दिया गया है। जबकि स्थानीय स्तर पर यह स्पष्ट रूप से लगातार सामने आया है कि घटना के दौरान बाहरी समूहों और संगठनों की सक्रियता बढ़ी हुई थी। कुछ क्षेत्रों में संगठित भीड़, समन्वित उपस्थिति और बाहरी प्रभाव की चर्चा ग्रामीणों द्वारा की गई। लेकिन रिपोर्ट में यह पूरा हिस्सा गायब है। क्यों? क्योंकि यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि संघर्ष केवल “धार्मिक उत्पीड़न” नहीं, बल्कि बाहरी हस्तक्षेप और सामाजिक तनाव से जुड़ा हुआ था, तो पूरी भावनात्मक कहानी कमजोर पड़ जाती।
पूरे लेख में सबसे दिलचस्प चीज यह है कि रिपोर्टर खुद को भी कहानी का पात्र बना देता है। “भीड़ ने घेर लिया”, “धर्म पूछा”, “जल्दी निकलने को कहा”, “मार सकते थे”, यह सब एक विशेष मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करता है। इससे पाठक को यह महसूस कराया जाता है कि पत्रकार “सच दिखाने” गया था और एक “कट्टर जनजाति समाज” ने उसे रोकने की कोशिश की। यह तकनीक खोजी पत्रकारिता कम और सिनेमैटिक मॉरल पोज़िशनिंग ज्यादा लगती है।

दरअसल, यह केवल एक रिपोर्ट नहीं है। यह एक बड़ा नैरेटिव प्रोजेक्ट दिखाई देता है, जिसमें बस्तर के जनजातीय समाज को धीरे-धीरे एक ऐसे समुदाय की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जो “असहिष्णु”, “हिंसक” और “अमानवीय” है, जबकि कन्वर्ज़न और बाहरी वैचारिक हस्तक्षेप को “अधिकार” और “मानवीय स्वतंत्रता” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यह संयोग नहीं है कि ऐसी रिपोर्ट में हमेशा ग्रामसभा, पांचवीं अनुसूची, पारंपरिक अधिकार, सामुदायिक सहमति, सांस्कृतिक स्वायत्तता और कन्वर्ज़न से पैदा हुए तनाव जैसे कुछ विषय गायब रहते हैं। इन सबको हटाने के बाद कहानी बहुत सरल हो जाती है: “पीड़ित ईसाई बनाम हिंसक जनजाति।” यही नैरेटिव सबसे खतरनाक है। क्योंकि यह केवल एक घटना की रिपोर्टिंग नहीं करती, बल्कि पूरे जनजातीय समाज की छवि को बदलने का काम करती है।

आज बस्तर की लड़ाई केवल जंगलों की नहीं है। यह नैरेटिव की लड़ाई भी है। एक तरफ वे लोग हैं जो जनजातीय समाज की परंपराओं, सांस्कृतिक अधिकारों और ग्रामसभा की वैधता को बचाने की बात करते हैं। दूसरी तरफ वे वैचारिक मंच हैं, जो हर संघर्ष को “सभ्य पीड़ित बनाम हिंसक जनजाति” में बदल देना चाहते हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या भारत का जनजातीय समाज केवल तब तक “प्रगतिशील” माना जाएगा, जब तक वह अपनी पारंपरिक संरचना छोड़ दे? क्या उसकी सांस्कृतिक असहमति को हमेशा “कट्टरता” कहा जाएगा? और क्या हर बार कन्वर्ज़न से पैदा हुए सामाजिक संघर्ष को केवल “उत्पीड़न” की कहानी बनाकर प्रस्तुत किया जाएगा?
बस्तर को समझना आसान नहीं है। लेकिन उसे वैचारिक प्रयोगशाला बनाना बहुत आसान है। दुर्भाग्य यही है कि आज पत्रकारिता के नाम पर यही किया जा रहा है।